भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

६५४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्त्रायाग्निशिखाभाय इति दिक्षु प्रविन्‍्यसेत्।<br>नेत्रेभ्यश्चेति चैशान्यां पिङ्गलेभ्यः प्रविन्‍्यसेत्॥ १४<br>शिवं सदाशिवं देवं महेश्वरमतः परम्।<br>रुद्रं विष्णुं विरिञ्चिं च सृष्टिन्यायेन भावयेत्॥ १५कवचाय नमः—इस मन्त्रसे वायव्यकोणके दलमें न्यास करना चाहिये। अग्निशिखाभाय अस्त्राय नमः—इस मन्त्रसे [ऊर्ध्व आदि] दिशाओंमें न्यास करना चाहिये और पिङ्गलेभ्यो नेत्रेभ्यो नमः—इस मन्त्रसे ईशान दिशामें न्यास करना चाहिये। तदनन्तर शिव सदाशिव देव महेश्वर रुद्र, विष्णु और विरिंचि (ब्रह्मा)-की सृष्टिके सृजन, पालन और संहारके क्रमसे भावना करनी चाहिये॥ १२–१५॥
शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे।<br>शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ १६<br>वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे।<br>कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ १७<br>निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च।<br>मन्त्रैरेतैर्महाभूतविग्रहं च सदाशिवम्॥ १८<br>ईशानमुकुटं देवं पुरुषास्यं पुरातनम्।<br>अघोरहृदयं हृष्टं वामगुह्यं महेश्वरम्॥ १९<br>सद्यमूर्तिं स्मरेद्देवं सदसद्व्यक्तिकारणम्।<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजमष्टत्रिंशत्कलामयम्॥ २०शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे। शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे। कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च—इन [पाँच] मन्त्रोंसे ईशानरूप मुकुट, तत्पुरुषरूप मुख, अघोररूप हृदय, वामदेवरूप गुह्यदेश तथा सद्योजात switch/रूप सम्पूर्ण विग्रहवाले, सत्-असत्‌की अभिव्यक्तिके कारणभूत, पुरातन, प्रसन्न तथा आकाश आदि पंचमहाभूतके विग्रहवाले महेश्वर सदाशिवका स्मरण करना चाहिये, जो पाँच मुख तथा दस भुजाओंसे सुशोभित और अड़तीस कलाओंवाले हैं।
सद्यमष्टप्रकारेण प्रभिद्य च कलामयम्।<br>वामं त्रयोदशविधैर्विभिद्य विततं प्रभुम्॥ २१<br>अघोरमष्टधा कृत्वा कलारूपेण संस्थितम्।<br>पुरुषं च चतुर्धा वै विभज्य च कलामयम्॥ २२<br>ईशानं पञ्चधा कृत्वा पञ्चमूर्त्या व्यवस्थितम्।<br>हंसंसेति मन्त्रेण शिवभक्त्या समन्वितम्॥ २३कलामय सद्योजातका आठ प्रकारसे विभाग करके, महाप्रभु वामदेवका तेरह भेदोंसे विभाग करके, कलारूपमें स्थित अघोरका आठ प्रकारसे विभाग करके, कलामय तत्पुरुषका चार प्रकारसे विभाग करके और पाँच मूर्तियोंमें व्यवस्थित ईशानका पाँच प्रकारसे विभाग करके उनका ध्यान करना चाहिये।
ओङ्कारमात्रमोङ्कारमकारं समरूपिणम्।<br>आ ई ऊ ए तथा अम्बानुक्रमेणात्मरूपिणम्॥ २४<br>प्रधानसहितं देवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्।<br>अणोरणीयां समजं महतोऽपि महत्तम्॥ २५<br>उर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमुमापतिम्।<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्राक्षं सनातनम्॥ २६<br>सहस्रहस्तचरणं नादान्तं नादविग्रहम्।<br>खद्योतसदृशाकारं चन्द्ररेखाकृतिं प्रभुम्॥ २७<br>द्वादशान्ते ध्रुवोर्मध्ये तालुमध्ये गले क्रमात्।<br>हृद्देशेऽवस्थितं देवं स्वानन्दममृतं शिवम्॥ २८हंसहंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्—इस हंसगायत्रीमन्त्रसे शिवभक्तिसे युक्त, ब्रह्मरूप, प्रणवरूप, अकाररूप, ब्रह्मतुल्यरूपवाले, आ-ई-ऊ-ए अर्थात् क्रमसे देवी-गणेश-सूर्य-विष्णुस्वरूप, प्रकृतियुक्त, उत्पत्ति-प्रलयसे रहित, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, महान्‌से भी महान्, ऊर्ध्वरेता, विरूपाक्ष, उमापति, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार हाथ तथा चरणोंवाले, सनातन, नादान्त (प्रणवरूप), नादप्रतिपाद्य विग्रहवाले, सूर्यके समान आकारवाले, चन्द्ररेखासे युक्त विग्रहवाले, मूर्धा-भ्रूमध्य-तालुमध्य-कण्ठ तथा हृदयमें क्रमसे विराजमान, अपने आनन्दमें मग्न, अमृतस्वरूप,