श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २१] शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विद्युद्वलयसङ्काशं विद्युत्कोटिसमप्रभम्।<br>श्यामं रक्तं कलाकारं शक्तित्रयकृतासनम्॥ २९<br><br>सदाशिवं स्मरेद्देवं तत्त्वत्रयसमन्वितम्।<br>विद्यामूर्तिमयं देवं पूजयेच्च यथाक्रमात्॥ ३० | कल्याणकारी, विद्युद्वलयसदृश, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभाववाले, श्यामरक्त वर्णवाले, गम्भीर आकारवाले, शक्तित्रय (तीनों शक्तियों)-पर विराजमान तीन तत्त्वोंसे युक्त तथा विद्यामूर्ति-स्वरूप भगवान् सदाशिव ईशानका इस प्रकार स्मरण करना चाहिये और यथाक्रमसे उनका पूजन करना चाहिये॥ १६-३०॥ |
| लोकपालांस्तथास्त्रेण पूर्वाद्यान् पूजयेत्पृथक्।<br>चरुं च विधिनासाद्य शिवाय विनिवेदयेत्॥ ३१<br><br>अर्धं शिवाय दत्त्वैव शेषार्धेन तु होमयेत्।<br>अघोरेणाथ शिष्याय दापयेद्भुक्तमुक्तमम्॥ ३२ | तत्पश्चात् पूर्व आदि दिशाओंसे सम्बन्धित [इन्द्र आदि] लोकपालोंका अस्त्रमन्त्रसे अलग-अलग पूजन करना चाहिये। इसके बाद विधिपूर्वक चरु बनाकर उसका आधा भाग शिवको अर्पित करना चाहिये। शिवको निवेदित करनेके बाद शेष चरुके आधे भागसे हवन कर देना चाहिये। तदनन्तर बचे हुए उत्तम चरुको अघोर मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके भक्षण करनेके लिये शिष्यको दिलाना चाहिये॥ ३१-३२॥ |
| उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा पुरुषं विधिना यजेत्।<br>पञ्चगव्यं ततः प्राश्य ईशानेनाभिमन्त्रितम्॥ ३३<br><br>वामदेवेन भस्माङ्गे भस्मनोद्धूलयेत्क्रमात्।<br>कर्णयोश्च जपेद्देवीं गायत्रीं रुद्रदेवताम्॥ ३४<br><br>ससूत्रं सपिधानं च वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम्।<br>तत्पूर्वं हेमरत्नाद्यैर्वासितं वै हिरण्मयम्॥ ३५<br><br>कलशान् विन्यसेत्पञ्च पञ्चभिर्ब्रह्मभिस्ततः।<br>होमं च चरुणा कुर्याद्यथाविभवविस्तरम्॥ ३६ | चरुका भक्षण करनेके अनन्तर आचमन करके शुद्ध होकर शिष्यको विधिपूर्वक तत्पुरुषका यजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ईशान मन्त्रसे अभिमन्त्रित किये गये पंचगव्यका प्राशन करके वामदेवमन्त्रसे सर्वांगमें भस्म धारण करना चाहिये, गुरुको शिष्यके दोनों कानोंमें रुद्रदैवत्य गायत्री (रुद्रगायत्री)-का जप करना चाहिये। होमके पूर्व सूत्रयुक्त, आच्छादनयुक्त, दो वस्त्रोंसे घिरा हुआ तथा हेमरत्नोंसे अधिवासित जो सुवर्णमय अधिवासनमण्डल है, उसमें पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे पाँच कलशोंका स्थापन करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार चरुसे होम करना चाहिये॥ ३३-३६॥ |
| शिष्यं च वासयेद्भक्तं दक्षिणे मण्डलस्य तु।<br>दर्भशय्यांसमारूढं शिवध्यानपरायणम्॥ ३७<br><br>अघोरेण यथान्याय्राष्टोत्तरशतं पुनः।<br>घृतेन हुत्वा दुःस्वप्नं प्रभाते शोधयेन्मलम्॥ ३८<br><br>एवं चोपोषितं शिष्यं स्नातं भूषितविग्रहम्।<br>नववस्त्रोत्तरीयं च सोष्णीषं कृतमङ्गलम्॥ ३९<br><br>दुकूलाद्येन वस्त्रेण नेत्रं बद्ध्वा प्रवेशयेत्।<br>सुवर्णपुष्पसम्मिश्रं यथाविभवविस्तरम्॥ ४०<br><br>ईशानेन च मन्त्रेण कुर्यात्पुष्पाञ्जलिं प्रभोः।<br>प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा रुद्राध्यायेन वा पुनः॥ ४१ | इसके बाद शिवध्यानपरायण भक्त शिष्यको मण्डलके दक्षिण भागमें कुशकी शैय्यापर शयन कराना चाहिये। पुनः प्रातःकाल होनेपर अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक घृतकी एक सौ आठ आहुति देकर दुःस्वप्नरूप मलका शोधन करे। इस प्रकार व्रती शिष्यको स्नान कराकर उसके शरीरको भूषित करके, उसे नवीन वस्त्र, उत्तरीय तथा पगड़ी धारण कराकर और उससे समस्त मंगलकृत्य सम्पन्न कराकर दुपट्टा आदिसे उसके नेत्रको बाँधकर उसे मण्डलमें प्रवेश कराये। शिष्य अपने धनसामर्थ्यके अनुसार सुवर्णयुक्त पुष्प अंजलिमें लेकर ईशानमन्त्रसे |