भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 658
६५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
केवलं प्रणवेनाथ शिवध्यानपरायणः।<br>ध्यात्वा तु देवदेवेशमीशाने सङ्क्षिपेत्स्वयम्॥ ४२<br><br>यस्मिन् मन्त्रे पतेत्पुष्पं तन्मन्त्रस्तस्य सिध्यति।<br>शिवाम्भसा तु संस्पृश्य अघोरेण च भस्मना॥ ४३प्रभुको पुष्पांजलि अर्पित करे और पुनः रुद्राध्याय अथवा केवल प्रणवका उच्चारण करता हुआ शिवके ध्यानमें लीन होकर मण्डलकी तीन प्रदक्षिणा करके देवदेवेशका ध्यान करके पुष्पको ईशान दिशामें स्वयं प्रक्षिप्त कर दे। पुष्प जिस मन्त्रपर गिरे, वही मन्त्र उसके लिये सिद्ध हो जाता है। तदनन्तर मंगल जल तथा अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मसे शिष्यका स्पर्श करके शिष्यके सिरपर अपना हाथ रखकर गुरुको गन्ध आदि उपचारोंसे शिष्यका पूजन करना चाहिये॥ ३७-४३ १/२ ॥
शिष्यमूर्धनि विन्यस्य गन्धाद्यैः शिष्यमर्चयेत्।<br>वारुणं परमं श्रेष्ठं द्वारं वै सर्ववर्णिनाम्॥ ४४<br><br>क्षत्रियाणां विशेषेण द्वारं वै पश्चिमं स्मृतम्।<br>नेत्रावरणमुन्मुच्य मण्डलं दर्शयेत्ततः॥ ४५<br><br>कुशासने तु संस्थाप्य दक्षिणामूर्तिमास्थितः।<br>तत्त्वशुद्धिं ततः कुर्यात्पञ्चतत्त्वप्रकारतः॥ ४६<br><br>निवृत्त्या रुद्रपर्यन्तमण्डमण्डोद्भव आत्मज।<br>प्रतिष्ठया तदूर्ध्वं च यावदव्यक्तगोचरम्॥ ४७<br><br>विश्वेश्वरान्तं वै विद्या कलामात्रेण सुव्रत।<br>तदूर्ध्वमार्गं संशोध्य शिवभक्त्या शिवं नयेत्॥ ४८<br><br>समर्च नाय तत्त्वस्य तस्य भोगेश्वरस्य वै।<br>तत्त्वत्रयप्रभेदेन चतुर्भिरुत वा तथा॥ ४९<br><br>होमयेद्ब्रह्ममन्त्रेण शान्त्यतीतं सदाशिवम्।<br>सद्यादिभिस्तु शान्त्यन्तं चतुर्भिः कलया पृथक्॥ ५०<br><br>शान्त्यतीतं मुनिश्रेष्ठ ईशानेनाथवा पुनः।<br>प्रत्येकमष्टोत्तरशतं दिशाहोमं तु कारयेत्॥ ५१वरुणसम्बन्धी पश्चिम द्वार प्रवेशके लिये सभी वर्णोंके लिये श्रेष्ठ है और यह विशेष रूपसे क्षत्रियोंके लिये अत्युत्तम कहा गया है। प्रवेशके अनन्तर शिष्यके नेत्रका वस्त्रावरण हटाकर उसे मण्डल दिखाना चाहिये। इसके बाद शिष्यको कुशासनपर बैठाकर दक्षिणामूर्ति शिवका आश्रय लेकर पंचतत्त्वप्रकारसे तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये। हे सनत्कुमार! हे सुव्रत! क्रमसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंसे लेकर अहंकारपर्यन्त अण्डकी निवृत्तिसे, उस अहंकारसे भी ऊपर अव्यक्तगोचर प्रकृतिपर्यन्त स्थितिके द्वारा तथा ज्ञानकलासे पुरुषतकका ज्ञान करके उससे भी ऊपर परम शिवकी प्राप्तिके मार्गको शिवभक्तिके द्वारा आवरणरहित करके शिष्यको तुरीय शिवतक पहुँचा दे। तत्पश्चात् उन योगेश्वर तत्त्वरूप शिवके समर्चनके लिये प्रकृति, पुरुष, ईश्वर—इन तत्त्वत्रय अथवा अहंकार आदि चार तत्त्वोंके क्रमसे शान्त्यतीत कलामें स्थित सदाशिवके निमित्त ईशानमन्त्रसे होम कर दे, साथ ही पृथक् गणनासे सद्योजात आदि चार मन्त्रोंके द्वारा शान्त्यन्त शिवके लिये होम कर दे; हे मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद ईशानमन्त्रसे परम शिवको एक सौ आठ आहुति देकर ऋत्विजोंके द्वारा एक सौ आठ आहुतिसे दिग्देवताहोम कराना चाहिये॥ ४४-५१॥
ईशान्यां पञ्चमेनाथ प्रधानं परिगीयते।<br>समिदाज्यचरूल्लाँजान् सर्षपांश्च यवांस्तिलान्॥ ५२<br><br>द्रव्याणि सप्त होतव्यं स्वाहान्तं प्रणवादिकम्।<br>तेषां पूर्णाहुतिर्विप्र ईशानेन विधीयते॥ ५३<br><br>सहंसेन यथान्यायं प्रणवाद्येन सुव्रत।<br>अघोरेण च मन्त्रेण प्रायश्चित्तं विधीयते॥ ५४ईशान दिशामें पाँचवें ईशानमन्त्रसे किया गया याग प्रधान याग कहा जाता है। मन्त्रके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें स्वाहा लगाकर समिधा, घृत, चरु, लाजा (लावा), सरसों, यव, तिल—इन सात द्रव्योंका हवन करना चाहिये। हे विप्र! उनकी पूर्णाहुति ईशानमन्त्रसे की जाती है। हे सुव्रत! प्रणवयुक्त हंसगायत्रीमन्त्रसहित
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