श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय २१ ] | शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य | ६५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जयादिस्विष्टपर्यन्तमग्निकार्यं क्रमेण तु।<br>गुणसंख्याप्रकारेण प्रधानेन च योजयेत्॥ ५५<br><br>भूतानि ब्रह्मभिर्वापि मौनी बीजादिभिस्तथा।<br>अथ प्रधानमात्रेण प्राणापानौ नियम्य च॥ ५६<br><br>षष्ठेन भेदयेदात्मप्रणवान्तं कुलाकुलम्।<br>अन्योऽन्यमुपसंहृत्य ब्रह्माणं केशवं हरम्॥ ५७<br><br>रुद्रे रुद्रं तमिशाने शिवे देवं महेश्वरम्।<br>तस्मात्सृष्टिप्रकारेण भावयेद्भवनाशनम्॥ ५८<br><br>स्थाप्यात्मानममुं जीवं ताडनं द्वारदर्शनम्।<br>दीपनं ग्रहणं चैव बन्धनं पूजया सह॥ ५९<br><br>अमृतीकरणं चैव कारयेद्विधिपूर्वकम्।<br>षष्ठान्तं सद्यसंयुक्तं तृतीयेन समन्वितम्॥ ६०<br><br>फडन्तं संहृतिः प्रोक्ता पञ्चभूतप्रकारतः।<br>सद्याद्यषष्ठसहितं शिखान्तं सफडन्तकम्॥ ६१<br><br>ताडनं कथितं द्वारं तत्त्वानामपि योगिनः।<br>प्रधानं सम्पुटीकृत्य तृतीयेन च दीपनम्॥ ६२<br><br>आद्येन सम्पुटीकृत्य प्रधानं ग्रहणं स्मृतम्।<br>प्रधानं प्रथमेनैव सम्पुटीकृत्य पूर्ववत्॥ ६३<br><br>बन्धनं परिपूर्णेन प्लावनं चामृतेन च।<br>शान्त्यतीता ततः शान्तिर्विद्या नाम कलामला॥ ६४<br><br>प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च कलासङ्क्रमणं स्मृता।<br>तत्त्ववर्णकलायुक्तं भुवनेन यथाक्रमम्॥ ६५<br><br>मन्त्रैः पादैः स्तवं कुर्याद्विशोध्य च यथाविधि।<br>आद्येन योनिबीजेन कल्पयित्वा च पूर्ववत्॥ ६६ | अघोरमन्त्रसे विधिपूर्वक प्रायश्चित्त किया जाता है। जया, अभ्यातान आदिसे लेकर स्विष्टकृत्-होमपर्यन्त अग्निकार्यको तीन प्रकारसे पूर्वोक्त प्रधान होमके साथ युक्त कर देना चाहिये॥ ५२—५५॥<br><br>तत्पश्चात् गुरुको चाहिये कि मौन होकर बीजस्वरूप [सद्योजात आदि] वेदमन्त्रोंसे पृथ्वी आदि पंचमहाभूतोंका तथा केवल ईशानमन्त्रसे प्राण-अपान वायुका निरोध करके छठे 'नमो हिरण्यबाहवे०' इस मन्त्रसे आत्मवाचक प्रणवके अन्तरूप नादसमुदायसे व्याप्त ब्रह्मरन्ध्रका भेदन करे। तत्पश्चात् ब्रह्मा, केशव तथा रुद्रको अन्योन्य रूपसे उपसंहृत करके अर्थात् ब्रह्माको केशवमें, केशवको हरमें विलीन करके संहारमूर्ति हरको रुद्रमें, उन रुद्रको ईशानमें और उन महेश्वर ईशानको शिवमें उपसंहृत करके पुनः सृष्टिक्रमसे भवनाशक रुद्रका चिन्तन करे॥ ५६—५८॥<br><br>इसके बाद शिष्यके जीवको रुद्रमें स्थापित करके ताड़न, द्वारदर्शन, दीपन, ग्रहण, पूजासहित बन्धन और अमृतीकरण विधिपूर्वक कराना चाहिये। अघोरमन्त्रके आदिमें सद्योजातमन्त्र और अन्तमें षष्ठ मन्त्र—'नमो हिरण्यबाहवे०' तथा सबके अन्तमें 'फट्' शब्द प्रयुक्त करके पृथ्वी आदि पंचभूतोंके प्रकारसे संहृति कही गयी है। सद्योजात आदिमें, इसके बाद 'नमो हिरण्यबाहवे०' और पुनः अन्तमें 'शिखा' तथा 'फट्' लगा हुआ मन्त्र दीक्षायोगीके लिये ताड़न तथा तत्त्वोंका द्वारदर्शन कहा गया है; अघोरमन्त्रसे सम्पुटित करके प्रधान ईशानमन्त्रको 'दीपन' कहा गया है। सद्योजातमन्त्रसे सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको ग्रहण तथा उसी ग्रहणकी ही तरह सद्योजात मन्त्रसे सम्पुटित करके ईशानमन्त्रको बन्धन भी कहा गया है और समग्र त्रियम्बकमन्त्रसे प्लावन अर्थात् अमृतीकरण बताया गया है॥ ५९—६३ १/२॥<br><br>शान्त्यतीता, प्रतिष्ठा, अमला, विद्या, शान्ति तथा निवृत्ति—ये कलाएँ कही गयी हैं। इनका यथाक्रम परस्पर संक्रमण करके तत्त्व, वर्ण, कला, भुवन, मन्त्र और पद—इन षडध्वोंका शोधन करके और पुनः प्रणव तथा योनिबीज (ह्रीँ)-से सम्पुटित करके शिवप्रतिपादक |