भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूजासम्प्रोक्षणं विद्धि ताडनं हरणं तथा।<br>संहतस्य च संयोगं विक्षेपं च यथाक्रमम्॥ ६७<br><br>अर्चना च तथा गर्भधारणं जननं पुनः।<br>अधिकारो भवेद्भानोर्लयश्चैव विशेषतः॥ ६८मन्त्रोंके द्वारा यथाविधि अर्थका विचार करके स्तवन करना चाहिये॥ ६४–६६॥<br>पूजासम्प्रोक्षण, ताड़न, हरण, अत्यन्त शुद्ध मनका संयोग, यथाक्रम विक्षेप, अर्चना, गर्भधारण (वागीशीके गर्भमें स्थापन), पुनर्जन्मन, भानुका अधिकार अर्थात् तत्सदृश ज्ञानका निवारक रूप और विशेषरूपसे अविद्याका नाश होता है—ऐसा जानिये॥ ६७–६८॥
उत्तमाद्यं तथान्त्येन योनिबीजेन सुव्रत।<br>उद्धारे प्रोक्षणे चैव ताडने च महामुने॥ ६९<br><br>अघोरेण फडन्तेन संसृतिश्च न संशयः।<br>प्रतितत्त्वं क्रमो ह्येष योगमार्गेण सुव्रत॥ ७०हे सुव्रत! हे महामुने! उद्धार, प्रोक्षण तथा ताड़नमें प्रारम्भमें उत्तम ईशानमन्त्र और इसके अन्तमें योनिबीजके साथ मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये और अन्तमें 'फट्'–से युक्त अघोरमन्त्रके द्वारा संसृति होती है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! प्रत्येक तत्त्वके लिये योगमार्गके द्वारा यही क्रम निर्धारित है॥ ६९–७०॥
मुष्टिना चैव यावच्च तावत्कालं नयेत्क्रमात्।<br>विषुवेण तु योगेन निवृत्त्यादि शिवान्तिकम्॥ ७१<br><br>एकत्र समतां याति नान्यथा तु पृथक् पृथक्।<br>नासाग्रे द्वादशान्तेन पृष्ठेन सह योगिनाम्॥ ७२<br><br>क्षन्तव्यमिति विप्रेन्द्र देवदेवस्य शासनम्।जबतक मुष्टिसदृश प्राणायाममें स्थित रहे, उतने कालको विषुवयोगके द्वारा क्रमसे निवृत्तिकलासे लेकर शिवाकलापर्यन्त व्यतीत करे। साधक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टिको स्थिर करके योगियोंके चरमावयवभूत मन्त्रसे द्वादशान्त (परम तत्त्व शिव)–के साथ समताको प्राप्त होता है; पृथक्-पृथक् स्थानोंपर दृष्टि रखनेसे नहीं। हे विप्रेन्द्र! दीक्षितको सुख-दुःख आदि द्वन्द्वसमूहोंको सहना चाहिये—ऐसा देवदेव शिवका आदेश है॥ ७१–७२ १/२॥
हेमराजतताम्राद्यैर्विधिना कल्पितेन च॥ ७३<br><br>सकूर्चेन सवस्त्रेण तन्तुना वेष्टितेन च।<br>तीर्थाम्बुपूरितेनैव रत्नगर्भेण सुव्रत॥ ७४<br><br>संहितामन्त्रितेनैव रुद्राध्यायस्तुतेन च।<br>सेचयेच्च ततः शिष्यं शिवभक्तं च धार्मिकम्॥ ७५हे सुव्रत! सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबे आदि धातुओंसे निर्मित, कूर्चयुक्त, वस्त्र तथा तन्तुसे वेष्टित, तीर्थजलसे परिपूर्ण, रत्नप्रक्षिप्त, संहिता मन्त्रसे अभिमन्त्रित, रुद्राध्यायसे स्तुत कलशके जलसे पवमान आदि मन्त्रोंके द्वारा धार्मिक शिवभक्त शिष्यका अभिषेक करना चाहिये॥ ७३–७५॥
सोऽपि शिष्यः शिवस्याग्रे गुरोरग्रे च सादरम्।<br>वह्नेश्च दीक्षां कुर्वीत दीक्षितश्च तथाचरेत्॥ ७६<br><br>वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि वा।<br>न त्वनभ्यर्च्य भुञ्जीयाद्भगवन्तं सदाशिवम्॥ ७७वह [अभिषिक्त] शिष्य भी शिव, गुरु तथा अग्निके समक्ष आदरपूर्वक दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होकर बताये जानेवाले नियमोंका पालन करे। चाहे प्राण चला जाय अथवा सिर कट जाय, किंतु भगवान् सदाशिवका पूजन किये बिना भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करनी चाहिये और यथाविधि शिवपूजन करना चाहिये। तीनों कालोंमें