भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 706
७०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टोत्तरशतं हुत्वा राजानमधिवासयेत्।<br>पुण्याहं स्वस्ति रुद्राय कौतुकं हेमनिर्मितम् ॥ २४१<br>भसितं च मृणालेन बन्धयेद्दक्षिणे करे।<br>त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ २४२<br>उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।<br>मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेद्वाथ होमयेत्॥ २४३सौ आठ आहुति देकर पूर्वाभिमुख राजाका अधिवासन करना चाहिये। तदनन्तर रुद्रके लिये पुण्याहवाचन तथा स्वस्तिवाचन करके भस्म तथा मृणालसहित स्वर्णनिर्मित कंकण राजाके दाहिने हाथमें बाँधना चाहिये। इसके बाद ‘त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥’—इस मन्त्रसे राजाका अभिषेक करना चाहिये और इसके बाद हवन करना चाहिये॥ २४०–२४३॥
सर्वद्रव्याभिषेकं च होमद्रव्यैर्यथाक्रमम्।<br>प्रागाद्यं ब्रह्मभिः प्रोक्तं सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम्॥ २४४<br>तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।<br>तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ २४५<br>स्वाहान्तं पुरुषेणैवं प्राक्कुण्डं होमयेद्द्विजः।<br>अघोरेण च याम्ये च होमयेत्कृष्णवाससा॥ २४६<br>वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय<br>नमो रुद्राय नमः।<br>इत्याद्युक्तक्रमेणैव जुहुयात्पश्चिमे नरः॥ २४७<br>सद्येन पश्चिमे होमः सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम्।<br>सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः॥ २४८<br>भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः।<br>स्वाहान्तं जुहुयादग्नौ मन्त्रेणानेन बुद्धिमान्॥ २४९क्रमानुसार लाजा आदि होमद्रव्योंसे सर्वद्रव्याभिषेक करना चाहिये। प्राक् आदिके क्रमसे पंचब्रह्म मन्त्रोंके द्वारा सभी द्रव्योंसे हवन करना बताया गया है। ‘तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्’—इस तत्पुरुषमन्त्रके अन्तमें स्वाहा जोड़कर द्विजको पूर्व दिशाके कुण्डमें हवन करना चाहिये। कृष्णवस्त्रधारी आचार्यको अघोरमन्त्रसे दक्षिण दिशामें हवन करना चाहिये। इसी प्रकार मनुष्यको चाहिये कि ‘वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः’—इस मन्त्रसे उक्त क्रमके अनुसार पश्चिम कुण्डमें हवन करे। यथाक्रम सद्योजात मन्त्रसे समस्त द्रव्योंसे उसके पार्श्ववर्ती उत्तर दिशामें होम किया जाना चाहिये; ‘सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः। भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः स्वाहा’—इस मन्त्रके द्वारा बुद्धिमान्को अग्निमें आहुति डालनी चाहिये॥ २४४–२४९॥
आग्नेय्यां च विधानेन ऋचा रौद्रेण होमयेत्।<br>जातवेदसे सुनवाम सोममित्यादिना ततः।<br>नैर्ऋते पूर्ववद्द्रव्यैः सर्वैर्होमो विधीयते ॥ २५०<br>मन्त्रेणानेन दिव्येन सर्वसिद्धिकरेण च।<br>निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षसभेदन ॥ २५१<br>रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः।<br>यथेष्टं विधिना द्रव्यैर्मन्त्रेणानेन होमयेत् ॥ २५२<br>यम्यां हि विविधैर्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः।<br>ईशान्यामथ पूर्वोक्तैर्द्रव्यैर्होममथाचरेत् ॥ २५३<br>ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय।<br>शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ २५४तदनन्तर ‘यो रुद्रो यो अग्नौ०’—इस मन्त्रके साथ ‘जातवेदसे सुनवाम सोमम्०’ इत्यादि मन्त्रके द्वारा विधानपूर्वक अग्निकोणके कुण्डमें हवन करे। इसके बाद ‘निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षसभेदन रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः’—इस सर्वसिद्धिकारक दिव्य मन्त्रके द्वारा नैर्ऋत्यकोणमें पूर्वकी भाँति सभी द्रव्योंसे होम किया जाता है। हे द्विजश्रेष्ठो! वायव्यकोणके कुण्डमें ईशानमन्त्रद्वारा विविध द्रव्योंसे हवन करे, हवनका मन्त्र है—‘ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।’ इसी प्रकार ईशानकोणके कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके ही