भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भस्मा कान्ता तथा वृष्टिर्द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी।<br>सैह्ना वैकारिका जाता कर्ममोटी तथापरा ॥ २२७<br>महामोहा महामाया गान्धारी पुष्पमालिनी ।<br>शब्दापी च महाघोषा षोडशैव तथान्तिमे ॥ २२८महाबला, खर्परा, भस्मा, कान्ता, वृष्टि, द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी, सैह्ना, वैकारिका, जाता, कर्ममोटी, महामोहा, महामाया, पुष्पमाला धारण करनेवाली गान्धारी, शब्दापी, महाघोषा—ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणमें बतायी गयी हैं॥ २२७—२२८॥
सर्वाश्च द्विभुजा देव्यो बालभास्करसन्निभाः।<br>पद्मशङ्खधराः शान्ता रक्तस्रग्वस्त्रभूषणाः ॥ २२९<br>सर्वाभरणसम्पूर्णा मुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।<br>मुक्ताफलमयैर्दिव्यै रत्नचित्रैर्मनोरमैः ॥ २३०<br>विभूषिता गौरवर्णा ध्येया देव्यः पृथक्पृथक् ।<br>एवं सहस्त्रकलशं ताम्रजं मृन्मयं तु वा ॥ २३१ये सभी देवियाँ दो भुजाओंसे युक्त, बालसूर्यके समान प्रभावानी, [हाथोंमें] कमल तथा शंख धारण करनेवाली, शान्तस्वभाव, रक्तवर्णकी माला तथा वस्त्रसे विभूषित, समस्त आभूषणोंसे परिपूर्ण, मोतियोंसे जटिल दिव्य मुकुट आदिसे अलंकृत, भाँति-भाँतिके अद्भुत तथा मनोरम रत्नोंसे विभूषित और गौरवर्णवाली हैं। इन देवियोंका पृथक्-पृथक् ध्यान करना चाहिये॥ २२९-२३० १/२ ॥
पूर्वोक्तलक्षणैर्युक्तं रुद्रक्षेत्रे प्रतिष्ठितम् ।<br>भवाद्यैर्विष्णुना प्रोक्तैर्नाम्नां चैव सहस्त्रकैः ॥ २३२<br>सम्पूज्य विन्यसेदग्रे सेचयेद्वाणविग्रहम्।<br>अभिषिच्य च विज्ञाप्य सेचयेत्पृथिवीपतिम् ॥ २३३<br>एवं सहस्त्रकलशं सर्वसिद्धिफलप्रदम् ।<br>चत्वारिंशन्महाव्यूहं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ २३४इस प्रकार ताँबे अथवा मिट्टीके बने तथा पूर्वकथित लक्षणोंसे युक्त हजार कलशोंको रुद्रक्षेत्रमें प्रतिष्ठित करे। विष्णुके द्वारा कहे हुए 'भव' आदि हजार नामोंसे [प्रत्येक कलशमें] पूजन करके सम्मुख बाणविग्रह (बाणलिङ्ग) स्थापित करके अभिषेक करना चाहिये। अभिषेक-प्रार्थना करके पृथिवीपतिक अभिषेकन करना चाहिये। इस प्रकार चालीस महाव्यूहोंवाला तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न यह हजार कलशोंसे अभिषेचन सभी सिद्धियोंको देनेवाला है॥ २३१-२३४॥
सर्वेषां कलशं प्रोक्तं पूर्ववद्धेमनिर्मितम् ।<br>सर्वे गन्धाम्बुसम्पूर्णपञ्चरत्नसमन्विताः ॥ २३५<br>तथा कनकसंयुक्ता देवस्य घृतपूरिताः ।<br>क्षीरेण वाथ दध्ना वा पञ्चगव्येन वा पुनः ॥ २३६<br>ब्रह्मकूर्चेन वा मध्यमभिषेको विधीयते ।<br>रुद्राध्यायेन रुद्रस्य नृपतेः शृणु सत्तम ॥ २३७<br>अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।<br>सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ २३८<br>मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेदभिषेचितम्।<br>होमं च मन्त्रेणानेन अघोरेणाघहारिणा ॥ २३९सभी कलशोंके मध्यमें पूर्वोक्त प्रमाणका स्वर्णनिर्मित कलश बताया गया है। सभी कलश सुगन्धित जलसे परिपूर्ण तथा पंचरत्नोंसे समन्वित होने चाहिये। रुद्रदेवके कलश स्वर्णयुक्त तथा घृतपूरित होने चाहिये। गायके दूध, दही, पंचगव्य अथवा ब्रह्मकूर्चसे रुद्रका मध्य-अभिषेक किया जाता है। हे सत्तम! रुद्रका अभिषेक रुद्राध्यायसे किया जाता है; अब राजाके अभिषेकके विषयमें सुनिये। 'अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥'—इस मन्त्रके द्वारा मूर्धाभिषिक्त राजाका अभिसेचन करना चाहिये और इसी पापनाशक अघोर मन्त्रसे होम भी करना चाहिये॥ २३५-२३९॥
प्रागाद्यं देवकुण्डे वा स्थण्डिले वा घृतादिभिः ।<br>समिदाज्यचरुं लाजशालिनीवारतण्डुलैः ॥ २४०देवकुण्डमें अथवा स्थण्डिलमें घृतसे सिक्त लाजा, शालि, नीवार तथा तण्डुलसहित समिधा और चरुकी एक