भारतकोश
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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय २७] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भस्मा कान्ता तथा वृष्टिर्द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी।<br>सैह्ना वैकारिका जाता कर्ममोटी तथापरा ॥ २२७<br>महामोहा महामाया गान्धारी पुष्पमालिनी ।<br>शब्दापी च महाघोषा षोडशैव तथान्तिमे ॥ २२८महाबला, खर्परा, भस्मा, कान्ता, वृष्टि, द्विभुजा ब्रह्मरूपिणी, सैह्ना, वैकारिका, जाता, कर्ममोटी, महामोहा, महामाया, पुष्पमाला धारण करनेवाली गान्धारी, शब्दापी, महाघोषा—ये सोलह शक्तियाँ दूसरे आवरणमें बतायी गयी हैं॥ २२७—२२८॥
सर्वाश्च द्विभुजा देव्यो बालभास्करसन्निभाः।<br>पद्मशङ्खधराः शान्ता रक्तस्रग्वस्त्रभूषणाः ॥ २२९<br>सर्वाभरणसम्पूर्णा मुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।<br>मुक्ताफलमयैर्दिव्यै रत्नचित्रैर्मनोरमैः ॥ २३०<br>विभूषिता गौरवर्णा ध्येया देव्यः पृथक्पृथक् ।<br>एवं सहस्त्रकलशं ताम्रजं मृन्मयं तु वा ॥ २३१ये सभी देवियाँ दो भुजाओंसे युक्त, बालसूर्यके समान प्रभावानी, [हाथोंमें] कमल तथा शंख धारण करनेवाली, शान्तस्वभाव, रक्तवर्णकी माला तथा वस्त्रसे विभूषित, समस्त आभूषणोंसे परिपूर्ण, मोतियोंसे जटिल दिव्य मुकुट आदिसे अलंकृत, भाँति-भाँतिके अद्भुत तथा मनोरम रत्नोंसे विभूषित और गौरवर्णवाली हैं। इन देवियोंका पृथक्-पृथक् ध्यान करना चाहिये॥ २२९-२३० १/२ ॥
पूर्वोक्तलक्षणैर्युक्तं रुद्रक्षेत्रे प्रतिष्ठितम् ।<br>भवाद्यैर्विष्णुना प्रोक्तैर्नाम्नां चैव सहस्त्रकैः ॥ २३२<br>सम्पूज्य विन्यसेदग्रे सेचयेद्वाणविग्रहम्।<br>अभिषिच्य च विज्ञाप्य सेचयेत्पृथिवीपतिम् ॥ २३३<br>एवं सहस्त्रकलशं सर्वसिद्धिफलप्रदम् ।<br>चत्वारिंशन्महाव्यूहं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ २३४इस प्रकार ताँबे अथवा मिट्टीके बने तथा पूर्वकथित लक्षणोंसे युक्त हजार कलशोंको रुद्रक्षेत्रमें प्रतिष्ठित करे। विष्णुके द्वारा कहे हुए 'भव' आदि हजार नामोंसे [प्रत्येक कलशमें] पूजन करके सम्मुख बाणविग्रह (बाणलिङ्ग) स्थापित करके अभिषेक करना चाहिये। अभिषेक-प्रार्थना करके पृथिवीपतिक अभिषेकन करना चाहिये। इस प्रकार चालीस महाव्यूहोंवाला तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न यह हजार कलशोंसे अभिषेचन सभी सिद्धियोंको देनेवाला है॥ २३१-२३४॥
सर्वेषां कलशं प्रोक्तं पूर्ववद्धेमनिर्मितम् ।<br>सर्वे गन्धाम्बुसम्पूर्णपञ्चरत्नसमन्विताः ॥ २३५<br>तथा कनकसंयुक्ता देवस्य घृतपूरिताः ।<br>क्षीरेण वाथ दध्ना वा पञ्चगव्येन वा पुनः ॥ २३६<br>ब्रह्मकूर्चेन वा मध्यमभिषेको विधीयते ।<br>रुद्राध्यायेन रुद्रस्य नृपतेः शृणु सत्तम ॥ २३७<br>अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।<br>सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ २३८<br>मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेदभिषेचितम्।<br>होमं च मन्त्रेणानेन अघोरेणाघहारिणा ॥ २३९सभी कलशोंके मध्यमें पूर्वोक्त प्रमाणका स्वर्णनिर्मित कलश बताया गया है। सभी कलश सुगन्धित जलसे परिपूर्ण तथा पंचरत्नोंसे समन्वित होने चाहिये। रुद्रदेवके कलश स्वर्णयुक्त तथा घृतपूरित होने चाहिये। गायके दूध, दही, पंचगव्य अथवा ब्रह्मकूर्चसे रुद्रका मध्य-अभिषेक किया जाता है। हे सत्तम! रुद्रका अभिषेक रुद्राध्यायसे किया जाता है; अब राजाके अभिषेकके विषयमें सुनिये। 'अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥'—इस मन्त्रके द्वारा मूर्धाभिषिक्त राजाका अभिसेचन करना चाहिये और इसी पापनाशक अघोर मन्त्रसे होम भी करना चाहिये॥ २३५-२३९॥
प्रागाद्यं देवकुण्डे वा स्थण्डिले वा घृतादिभिः ।<br>समिदाज्यचरुं लाजशालिनीवारतण्डुलैः ॥ २४०देवकुण्डमें अथवा स्थण्डिलमें घृतसे सिक्त लाजा, शालि, नीवार तथा तण्डुलसहित समिधा और चरुकी एक
७०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टोत्तरशतं हुत्वा राजानमधिवासयेत्।<br>पुण्याहं स्वस्ति रुद्राय कौतुकं हेमनिर्मितम् ॥ २४१<br>भसितं च मृणालेन बन्धयेद्दक्षिणे करे।<br>त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ २४२<br>उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।<br>मन्त्रेणानेन राजानं सेचयेद्वाथ होमयेत्॥ २४३सौ आठ आहुति देकर पूर्वाभिमुख राजाका अधिवासन करना चाहिये। तदनन्तर रुद्रके लिये पुण्याहवाचन तथा स्वस्तिवाचन करके भस्म तथा मृणालसहित स्वर्णनिर्मित कंकण राजाके दाहिने हाथमें बाँधना चाहिये। इसके बाद ‘त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥’—इस मन्त्रसे राजाका अभिषेक करना चाहिये और इसके बाद हवन करना चाहिये॥ २४०–२४३॥
सर्वद्रव्याभिषेकं च होमद्रव्यैर्यथाक्रमम्।<br>प्रागाद्यं ब्रह्मभिः प्रोक्तं सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम्॥ २४४<br>तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।<br>तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ २४५<br>स्वाहान्तं पुरुषेणैवं प्राक्कुण्डं होमयेद्द्विजः।<br>अघोरेण च याम्ये च होमयेत्कृष्णवाससा॥ २४६<br>वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय<br>नमो रुद्राय नमः।<br>इत्याद्युक्तक्रमेणैव जुहुयात्पश्चिमे नरः॥ २४७<br>सद्येन पश्चिमे होमः सर्वद्रव्यैर्यथाक्रमम्।<br>सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः॥ २४८<br>भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः।<br>स्वाहान्तं जुहुयादग्नौ मन्त्रेणानेन बुद्धिमान्॥ २४९क्रमानुसार लाजा आदि होमद्रव्योंसे सर्वद्रव्याभिषेक करना चाहिये। प्राक् आदिके क्रमसे पंचब्रह्म मन्त्रोंके द्वारा सभी द्रव्योंसे हवन करना बताया गया है। ‘तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्’—इस तत्पुरुषमन्त्रके अन्तमें स्वाहा जोड़कर द्विजको पूर्व दिशाके कुण्डमें हवन करना चाहिये। कृष्णवस्त्रधारी आचार्यको अघोरमन्त्रसे दक्षिण दिशामें हवन करना चाहिये। इसी प्रकार मनुष्यको चाहिये कि ‘वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः’—इस मन्त्रसे उक्त क्रमके अनुसार पश्चिम कुण्डमें हवन करे। यथाक्रम सद्योजात मन्त्रसे समस्त द्रव्योंसे उसके पार्श्ववर्ती उत्तर दिशामें होम किया जाना चाहिये; ‘सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः। भवे भवेनाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः स्वाहा’—इस मन्त्रके द्वारा बुद्धिमान्को अग्निमें आहुति डालनी चाहिये॥ २४४–२४९॥
आग्नेय्यां च विधानेन ऋचा रौद्रेण होमयेत्।<br>जातवेदसे सुनवाम सोममित्यादिना ततः।<br>नैर्ऋते पूर्ववद्द्रव्यैः सर्वैर्होमो विधीयते ॥ २५०<br>मन्त्रेणानेन दिव्येन सर्वसिद्धिकरेण च।<br>निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षसभेदन ॥ २५१<br>रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः।<br>यथेष्टं विधिना द्रव्यैर्मन्त्रेणानेन होमयेत् ॥ २५२<br>यम्यां हि विविधैर्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः।<br>ईशान्यामथ पूर्वोक्तैर्द्रव्यैर्होममथाचरेत् ॥ २५३<br>ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय।<br>शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ २५४तदनन्तर ‘यो रुद्रो यो अग्नौ०’—इस मन्त्रके साथ ‘जातवेदसे सुनवाम सोमम्०’ इत्यादि मन्त्रके द्वारा विधानपूर्वक अग्निकोणके कुण्डमें हवन करे। इसके बाद ‘निमि निशि दिश स्वाहा खड्ग राक्षसभेदन रुधिराज्यार्द्र नैर्ऋत्यै स्वाहा नमः स्वधा नमः’—इस सर्वसिद्धिकारक दिव्य मन्त्रके द्वारा नैर्ऋत्यकोणमें पूर्वकी भाँति सभी द्रव्योंसे होम किया जाता है। हे द्विजश्रेष्ठो! वायव्यकोणके कुण्डमें ईशानमन्त्रद्वारा विविध द्रव्योंसे हवन करे, हवनका मन्त्र है—‘ईशानाय कद्रुद्राय प्रचेतसे त्र्यम्बकाय शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।’ इसी प्रकार ईशानकोणके कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके ही

अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रधानं पूर्ववद्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः।<br>प्रतिद्रव्यं सहस्रेण जुहुयान्नृपसन्निधौ॥ २५५<br><br>स्वयं वा जुहुयादग्नौ भूपतिः शिववत्सलः।<br>ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां<br>ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु<br>सदाशिवोम्॥ २५६द्वारा पूर्वकथित द्रव्योंसे हवन करना चाहिये। हे द्विजश्रेष्ठो! प्रधान कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके द्वारा पूर्ववत् सभी द्रव्योंसे हवन करना चाहिये। [आचार्यको] प्रत्येक कुण्डमें एक-एक हजार आहुति राजाकी सन्निधिमें प्रदान करनी चाहिये; अथवा ‘ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम्’—इस मन्त्रसे शिवभक्तिपरायण राजा अग्निमें स्वयं आहुति प्रदान करे॥ २५०—२५६॥
प्रायश्चित्तमघोरेण शेषं सामान्यमाचरेत्।<br>कृताधिवासं राजानं शङ्खभेर्यादिनिस्वनैः॥ २५७<br><br>जयशब्दैर्वेदिव्यैर्वेदघोषैः सुशोभनैः।<br>सेचयेत्कूर्चतोयेन प्रोक्षयेद्वा नृपोत्तमम्॥ २५८<br><br>रुद्राध्यायेन विधिना रुद्रभस्माङ्गधारिणम्।<br>शङ्खचामरभेर्याद्यं छत्रं चन्द्रसमप्रभम्॥ २५९<br><br>शिविकां वैजयन्तीं च साधयेन्नृपतेः शुभाम्।<br>राज्याभिषेकयुक्ताय क्षत्रियायेश्वराय वा॥ २६०<br><br>नृपचिह्नानि नान्येषां क्षत्रियाणां विधीयते।<br>प्रमाणं चैव सर्वेषां द्वादशाङ्गुलमुच्यते॥ २६१<br><br>पलाशोदुम्बराश्वत्थवटाः पूर्वाद्दितः क्रमात्।<br>तोरणाद्यानि वै तत्र पट्टमात्रेण पट्टिकाः॥ २६२<br><br>अष्टमाङ्गुलसंयुक्तदर्भमालासमावृतम् ।<br>दिग्ध्वजाष्टकसंयुक्तं द्वारकुम्भैः सुशोभनम्॥ २६३<br><br>हेमतोरणकुम्भैश्च भूषितं स्नापयेन्नृपम्।<br>सर्वोपरि समासीनं शिवकुम्भेन सेचयेत्॥ २६४<br><br>तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि।<br>तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥ २६५<br><br>मन्त्रेणानेन विधिना वर्धन्या गौरिगीतया।<br>रुद्राध्यायेन वा सर्वमघोरायाथ वा पुनः॥ २६६<br><br>दिव्यैराभरणैः शुक्लैर्मुकुटाद्यैः सुकल्पितैः।<br>क्षौमवस्त्रैश्च राजानं तोषयेन्नियतं शनैः॥ २६७प्रायश्चित्त अघोरमन्त्रसे करना चाहिये तथा अवशिष्ट कर्म अन्य यागके समान करना चाहिये। शंख-भेरी आदिकी ध्वनि, जयकारकी ध्वनि तथा मंगलमय दिव्य वेद-ध्वनिके बीच रुद्राध्यायका पाठ करके अधिवासित राजाका कूर्च-जलसे अभिषेक करना चाहिये अथवा रुद्राक्ष एवं भस्म धारण किये हुए नृपश्रेष्ठका प्रोक्षण करना चाहिये। तत्पश्चात् आचार्यको चाहिये कि राजाके लिये शंख, चामर, भेरी, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् छत्र, पालकी, शुभ ध्वजा आदि साधन प्रस्तुत करे। राज्याभिषेकके योग्य क्षत्रियके लिये अथवा देवताके लिये ही ये सब राजचिह्न हैं; अन्य क्षत्रियोंके लिये अभिषेकका विधान नहीं है। पूर्वादिक्रमसे [चारों दिशाओंमें] पलाश, गूलर, पीपल और बरगदकी शाखाएँ बाँधनी चाहिये और [अभिषेक-मण्डपमें] तोरण आदि तथा रेशमके वस्त्रकी पट्टिका लगा देनी चाहिये। इसमें पलाश आदि सभीकी शाखाओंका प्रमाण बारह अंगुल बताया गया है। अभिषेक-मण्डपको आठ-आठ अंगुल प्रमाणवाले दर्भोंकी मालासे समावृत, आठों दिशाओंमें ध्वजासे अलंकृत, द्वारकुम्भोंसे सुशोभित तथा सुवर्णके तोरणमय कलशोंसे विभूषित करके राजाको स्नान कराना चाहिये। ‘तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥’—इस मन्त्रके द्वारा शिवकुम्भके जलसे, गौरीगायत्री मन्त्रके द्वारा वर्धनीके जलसे और रुद्राध्याय अथवा अघोरमन्त्रके द्वारा सभी कुम्भोंके जलसे सर्वोच्च आसनपर विराजमान राजाका अभिषेक करना चाहिये॥ २५७—२६६॥<br><br>तदनन्तर उत्तम प्रकारसे निर्मित किये गये उज्ज्वल
७०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| अष्टषष्टिपलेनैव हेम्ना कृत्वा सुदर्शनम्।<br>नवरत्नैरलङ्कृत्य दद्याद्वै दक्षिणां गुरोः॥ २६८<br><br>दशधेनु सवस्त्रं च दद्यात्क्षेत्रं सुशोभनम्।<br>शतद्रोणतिलं चैव शतद्रोणांश्च तण्डुलान्॥ २६९<br><br>शयनं वाहनं शय्यां सोपधानां प्रदापयेत्।<br>योगिनां चैव सर्वेषां त्रिंशत्पलमुदाहृतम्॥ २७०<br><br>अशेषांश्च तदर्धेन शिवभक्तांस्तदर्धतः।<br>महापूजां ततः कुर्यान्महादेवस्य वै नृपः॥ २७१ | मुकुट आदि दिव्य आभूषणों तथा रेशमी वस्त्रोंसे राजाको विभूषित करना चाहिये। राजाको चाहिये कि [इस अवसरपर] अड़सठ पल प्रमाणका एक सुदर्शन चक्र बनवाकर उसे नौ रत्नोंसे जटित कराकर गुरुको दक्षिणा प्रदान करे; साथ ही वस्त्रसहित दस गायें तथा उत्तम भूमि प्रदान करे। सौ द्रोण तिल, सौ द्रोण चावल, वाहन, विस्तर तथा तकियासहित शय्या भी [गुरुको] प्रदान करना चाहिये। योगियोंके लिये सुवर्णके तीस पलका दान बताया गया है और अन्य सामग्रियाँ आधी देनी चाहिये तथा शिवभक्तोंको उससे भी आधी प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर राजाको महादेवकी महापूजा करनी चाहिये॥ २६७-२७१॥ | | एवं समासतः प्रोक्तं जयसेचनमुत्तमम्।<br>एवं पुराभिषिक्तस्तु शक्रः शक्रत्वमागतः॥ २७२<br><br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो विष्णुर्विष्णुत्वमागतः।<br>अम्बिका चाम्बिकात्वं च सौभाग्यमतुलं तथा॥ २७३<br><br>सावित्री च तथा लक्ष्मीर्देवी कात्यायनी तथा।<br>नन्दिनाथ पुरा मृत्यु रुद्राध्यायेन वै जितः॥ २७४<br><br>अभिषिक्तोऽसुरः पूर्वं तारकाख्यो महाबलः।<br>विद्युन्माली हिरण्याक्षो विष्णुना वै विनिर्जितः॥ २७५<br><br>नृसिंहेन पुरा दैत्यो हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>स्कन्देन तारकाद्याश्च कौशिक्या च पुराम्बया॥ २७६<br><br>सुन्दोपसुन्दतनयौ जितौ दैत्येन्द्रपूजितौ।<br>वसुदेवसुदेवौ तु निहतौ कृतकृत्यया॥ २७७<br><br>स्नानयोगेन विधिना ब्रह्मणा निर्मितेन तु।<br>दैवासुरे दितिसुता जिता देवैरनिन्दिताः॥ २७८<br><br>स्नाप्यैव सर्वभूपैश्च तथान्यैरपि भूसुरैः।<br>प्राप्ताश्च सिद्धयो दिव्या नात्र कार्या विचारणा॥ २७९ | इस प्रकार मैंने उत्तम जयाभिषेकका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। पूर्वकालमें इसी प्रकारसे अभिषिक्त होकर इन्द्रने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। इसी प्रकार ब्रह्माको ब्रह्मत्व, विष्णुको विष्णुत्व तथा अम्बिकाको अम्बिकात्व प्राप्त हुआ था। सावित्री, भगवती लक्ष्मी तथा कात्यायनीने भी [इसी अभिषेकके प्रभावसे] अतुल सौभाग्य प्राप्त किया था। पूर्व कालमें रुद्राध्यायसे अभिषिक्त होकर नन्दीने मृत्युको भी जीत लिया था। इसी अभिषेकके प्रभावसे महाबली असुर तारक तथा विद्युन्माली देवताओंसे अजेय हो गये थे और भगवान् विष्णुने हिरण्याक्षको पराजित किया था। इसी प्रकार इसी स्नानयोगसे प्राचीनकालमें नृसिंहने दैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था, कार्तिकेयने तारक आदिका संहार किया था, अम्बा कौशिकीने बड़े-बड़े दैत्योंके द्वारा पूजित सुन्द-उपसुन्दके पुत्रोंको जीत लिया था और कृतकृत्याने वसुदेव तथा सुदेवका वध किया था। विधिपूर्वक ब्रह्माके द्वारा निर्मित इसी स्नानयोग (जयाभिषेक)-से देवासुर-संग्राममें देवताओंने प्रतापी दितिपुत्रोंको जीता था। सभी राजा तथा अन्य ब्राह्मणोंने भी अभिषिक्त होकर अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २७२-२७९॥ | | अहोऽभिषेकमाहात्म्यमहो शुद्धसुभाषितम्।<br>येनैवमभिषिक्तेन सिद्धैर्मृत्युर्जितस्त्विति॥ २८० | इस अभिषेकका ऐसा माहात्म्य! यह कैसा पवित्र सुभाषित है कि जिसके द्वारा अभिषिक्त होनेके कारण |

२८- स्वायम्भुव मनुके प्रति सनत्कुमारप्रोक्त षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन

अध्याय २८ ] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७०७


कल्पकोटिशतेनापि यत्पापं समुपार्जितम्।<br>स्नात्वैवं मुच्यते राजा सर्वपापैर्न संशयः॥ २८१<br><br>व्याधितो मुच्यते राजा क्षयकुष्ठादिभिः पुनः।<br>स नित्यं विजयी भूत्वा पुत्रपौत्रादिभिर्युतः॥ २८२<br><br>जनानुरागसम्पन्नो देवराज इवापरः।<br>मोदते पापहीनश्च प्रियया धर्मनिष्ठया॥ २८३<br><br>उद्देशमात्रं कथितं फलं परमशोभनम्।<br>नृपाणामुपकाराय स्वायम्भुव मनो मया॥ २८४सिद्धिको प्राप्त हुए लोगोंने मृत्युतकको जीत लिया। इस विधिसे स्नान करके कोई राजा करोड़ों कल्पोंमें भी जो पाप संचित किया गया हो, उन सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। क्षय-कुष्ठ आदि व्याधियोंसे राजा छुटकारा पा जाता है, वह विजयी होकर सदा पुत्र-पौत्र आदिसे सम्पन्न रहता है, प्रजाजनोंके अनुरागसे युक्त रहता है, दूसरे इन्द्रकी भाँति सुशोभित होता है तथा पापहीन रहते हुए अपनी धर्मनिष्ठ पत्नीके साथ आनन्द प्राप्त करता है। हे स्वायम्भुव मनु! राजाओंके उपकारके लिये ही मैंने संक्षेपमें [जयाभिषेकका] वर्णन किया है, इसका फल अत्यन्त कल्याणकारक है॥ २८०—२८४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अभिषेकविधिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अभिषेकविधि' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २७॥


अट्टाईसवाँ अध्याय

स्वायम्भुव मनुके प्रति सनत्कुमारप्रोक्त षोडश* महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन

सूत उवाच<br>स्नात्वा देवं नमस्कृत्य देवदेवमुमापतिम्।<br>दिव्येन चक्षुषा रुद्रं नीललोहितमीश्वरम्॥ १<br><br>दृष्ट्वा तुष्टाव वरदं रुद्राध्यायेन शङ्करम्।<br>देवोऽपि तुष्ट्या निर्वाणं राज्यान्ते कर्मणैव तु॥ २<br><br>तवास्तीति सकृच्चोक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवं नमस्कृत्य वृषध्वजम्॥ ३<br><br>आरुरोह महामेरुं महावृषभमिवेश्वरः।<br>तत्र देवं हिरण्याभं योगैश्वर्यसमन्वितम्॥ ४**सूतजी बोले—**तदनन्तर इस विधिसे स्नान करके देवदेव उमापति नीललोहित भगवान् रुद्रको नमस्कारकर तथा दिव्य दृष्टिसे उन्हें देखकर वे स्वायम्भुव मनु रुद्राध्यायके द्वारा वरदायक शंकरकी स्तुति करने लगे। भगवान् शिव भी उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर '[दीर्घकालतक] राज्य करके अन्तमें सत्कर्मसे तुम्हारा मोक्ष होगा'—ऐसा एक बार कहकर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १-२ १/२॥<br><br>वृषभध्वज भगवान् शिवको नमस्कार करके स्वायम्भुव मनु मेरुशृंगपर उसी प्रकार आरूढ़ हुए, जैसे

* सर्ग-प्रतिसर्गरूप पंचलक्षणात्मक पुराणोंके वर्ण्य-विषयमें दान-विधानका विस्तारसे निरूपण हुआ है, जिसका संग्रह परवर्ती निबन्धग्रन्थों— कृत्यकल्पतरु (दानखण्ड), हेमाद्रि (चतुर्वर्गचिन्तामणि), दानमयूख तथा दानसागर आदिमें विस्तारसे हुआ है। श्रीलिङ्गमहापुराणके उत्तरभागके अट्ठाईसवें अध्यायसे चौवालीसवें अध्यायतक सत्रह अध्यायोंमें षोडश महादानोंका वर्णन संक्षेपमें आया है। इसकी पूर्ण जानकारीके लिये उपर्युक्त निबन्धग्रन्थ, मत्स्य, अग्नि आदि पुराणों तथा दानपद्धतियोंका अवलोकन करना चाहिये। पुराणोंमें षोडश महादानोंके नामोंमें अन्तर भी प्राप्त होता है। श्रीलिङ्गमहापुराणमें षोडश महादानोंके अन्तर्गत जिन दानोंका परिगणन हुआ है, उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं— १-तुलापुरुष, २-हिरण्यगर्भ, ३-तिलपर्वत तथा सूक्ष्म तिलपर्वत, ४-सुवर्णमेदिनी, ५-कल्पपादप, ६-गणेशेश, ७-सुवर्णधेनु, ८-लक्ष्मी, ९-तिलधेनु, १०-गोसहस्र, ११-हिरण्याश्व, १२-कन्या, १३-हिरण्यवृष, १४-सुवर्णगज, १५-लोकपालाष्टक तथा १६-ब्रह्मा-विष्णु-महेश-मूर्तिदान।

७०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमारं वरदमपश्यद्ब्रह्मणः सुतम्।<br>नमश्चकार वरदं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम्॥ ५<br><br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव च महाद्युतिः।<br>सोऽपि दृष्ट्वा मनुं देवो हृष्टरोमाभवन्मुनिः॥ ६<br><br>सनत्कुमारः प्राहेदं घृणया च घृणानिधे।सदाशिव महावृषभपर आरूढ़ होते हैं। वहाँपर उन्होंने स्वर्णकी आभावाले, योगके प्रतापसे युक्त तथा वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको देखा। [उन्हें देखकर] महातेजस्वी मनुने उन वरदायक, ब्रह्मज्ञानी तथा ब्रह्मरूप [सनत्कुमार]-को नमस्कार किया और दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। मनुको देखकर मुनि सनत्कुमार भी हर्षके कारण पुलकित हो उठे और 'हे कृपानिधे!' इस प्रकार सम्बोधित करके दयापूर्वक उनसे कहने लगे॥ ३-६ १/२॥
सनत्कुमार उवाच<br>दृष्ट्वा सर्वेश्वराच्छान्ताच्छङ्करान्नीललोहितात्॥ ७<br><br>लब्ध्वाभिषेकं सम्प्राप्तो विवक्षुर्वद यद्यपि।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ ८<br><br>विज्ञापयामास कथं कर्मणा निर्वृतिर्विभो।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं कर्मणा केवलेन च॥ ९सनत्कुमार बोले—शान्तस्वभाववाले नीललोहित सर्वेश्वर शिवका दर्शन करके उनसे जयाभिषेक प्राप्त करके आप यहाँ आये हैं। यदि आप कुछ और पूछनेके इच्छुक हैं, तो पूछिये। तब उनका वचन सुनकर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके मनुने कहा—हे विभो! कर्मके द्वारा मुक्ति कैसे हो सकती है? हे विभो! आप हम लोगोंको कृपा करके यह बतायें कि केवल कर्मसे अथवा ज्ञानसे अथवा ज्ञान-कर्मके मिश्रित प्रभावसे किस प्रकार मुक्ति मिलती है?॥ ७-९॥
ज्ञानेन निर्वृत्तिः सिद्धा विभो मिश्रेण वा क्वचित्।<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा श्रुतिसारविदां निधिः॥ १०<br><br>सनत्कुमारो भगवान् कर्मणा निर्वृतिं क्रमात्।<br>मिश्रेण च क्रमादेव क्षणाज्ज्ञानेन वै मुने॥ ११उनका वचन सुनकर वेदरहस्योंको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमारने कहा—हे मुने! कर्मके द्वारा क्रमसे मुक्ति हो जाती है, कर्मयुक्त ज्ञानसे भी क्रमशः मुक्ति होती है, किंतु शुद्ध ज्ञानसे क्षणमात्रमें मोक्ष हो जाता है॥ १०-११॥
पुरामानेन चोष्ट्रत्वमगमं नन्दिनः प्रभोः।<br>शापात्पुनः प्रसादाद्धि शिवमभ्यर्च्य शङ्करम्॥ १२<br><br>प्रसादान्नन्दिनस्तस्य कर्मणैव सुतो ह्यहम्।<br>श्रुत्वोत्तमां गतिं दिव्यामवस्थां प्राप्तवानहम्॥ १३<br><br>शिवार्चनप्रकारेण शिवधर्मेण नान्यथा।पूर्वकालमें प्रभु नन्दीका अपमान करनेके कारण उनके शापसे मैं ऊँटकी योनिको प्राप्त हो गया था; पुनः उन्हींकी कृपासे कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चन करके उस शिवार्चनरूप कर्मके कारण ही मैं ब्रह्माजीका पुत्र हुआ और उन्हीं नन्दीके अनुग्रहसे उत्तम मुक्तिमार्गका श्रवण करके शिवधर्मरूप शिवार्चनकी रीतिसे दिव्य अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२-१३ १/२॥
राज्ञां षोडशदानानि नन्दिना कथितानि च॥ १४<br><br>धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं कर्मणैव महात्मना।<br>तुलादिरोहणाद्यानि शृणु तानि यथातथम्॥ १५महात्मा नन्दिकेश्वरने राजाओंको [दानरूप] कर्मके द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्तिके लिये तुलारोहण आदि सोलह दानोंका वर्णन किया है; उन्हें आप यथाविधि सुनिये॥ १४-१५॥

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७१० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उभयोरन्तरं चैव षद्धस्तं नृपते स्मृतम्।<br>द्वयोश्चतुर्हस्तकृतमन्तरं स्तम्भयोरपि ॥ २८<br>षद्धस्तमन्तरं ज्ञेयं स्तम्भयोरुपरि स्थितम्।<br>वितस्तिमात्रं विस्तारो विष्कम्भस्तावदुत्तरम् ॥ २९बताया गया है। तुलाका दूसरा स्तम्भ पूर्ण गोलाकार तथा व्रणरहित होना चाहिये। हे राजन्! नीचेसे दोनों स्तम्भोंमें परस्पर दो अंगुल कम छः हाथका अन्तर कहा गया है; दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका भी अन्तर रखा जा सकता है। दोनों स्तम्भोंके ऊपरी भागोंके बीच छः हाथका अन्तर जानना चाहिये। दोनों स्तम्भोंका विस्तार एक वितस्ति (बारह अंगुल) होना चाहिये और उतने ही परिमाणका दूसरा विष्कम्भ भी होना चाहिये॥ २३-२९॥
स्तम्भयोस्तु प्रमाणेन उत्तरद्वारसम्मितम्।<br>षट्त्रिंशन्मात्रसंयुक्तं व्यायामं तु तुलात्मकम् ॥ ३०<br>विष्कम्भमष्टमात्रं तु यवपञ्चकसंयुतम्।<br>षट्त्रिंशन्मात्रनाभं स्यान्निर्माणाद्वर्तुलं शुभम् ॥ ३१<br>अग्रे मूले च मध्ये च हेमपट्टेन बन्धयेत्।<br>पट्टमध्ये प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम् ॥ ३२<br>ताम्रेण च प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम्।<br>आरेण वा प्रकर्तव्यमायसं नैव कारयेत् ॥ ३३ऊपरके भागमें तुलाकी छड़ दोनों स्तम्भोंकी लम्बाईके अनुकूल हो और तुलाका सन्तुलन करनेवाले छड़की लम्बाई छत्तीस अंगुल होनी चाहिये। विष्कम्भ आठ अंगुल और पाँच यव हो। नाभि छत्तीस अंगुल लम्बी होनी चाहिये और इसे गोल तथा सुन्दर बनाना चाहिये। सिरेपर, मध्यमें और नीचेके भागमें सोनेका पट्ट लगाना चाहिये। मध्यके पट्टमें तीन अवलम्बक लगाने चाहिये। इन अवलम्बकोंको ताम्रका अथवा पीतलका बनाना चाहिये; लोहेका कदापि नहीं बनाना चाहिये॥ ३०-३३॥
मध्ये चोर्ध्वमुखं कार्यमवलम्बः सुशोभनः।<br>रश्मिभिस्तोरणाग्रे वा बन्धयेच्च विधानतः ॥ ३४<br>जिह्वामेकां तुलामध्ये तोरणं तु विधीयते।<br>उत्तरस्य च मध्ये च शङ्कुं दृढमनुत्तमम् ॥ ३५<br>वितानेनोपरि च्छाद्य दृढं सम्यक्प्रयोजयेत्।<br>शङ्कोः सुषिरसम्पन्नं वलयं कारयेन्मुने ॥ ३६<br>तुलामध्ये वितानेन तुल्या लम्बके तथा।<br>वलयेन प्रयोक्तव्यं कुण्डलं वावलम्बनम् ॥ ३७<br>सुदृढं च तुलामध्ये नवमाङ्गुलमानतः।<br>पट्टस्यैव तु विस्तारं पञ्चमात्रप्रमाणतः ॥ ३८पट्टको बीचमें लगानेका अवलम्ब सुन्दर हो तथा उसका मुख ऊपरकी ओर होना चाहिये। तोरणके ऊपरी सिरेपर इसे डोरियोंसे विधिवत् बाँध देना चाहिये। तुलाके मध्यमें तोरण बनाया जाता है, जो जिह्वाके आकारका होता है। उत्तर तथा दक्षिणके मध्यमें एक दृढ़ एवं सुन्दर शंकु होना चाहिये; वितानके सिरेपर दृढ़तापूर्वक इसे भलीभाँति लगा देना चाहिये। हे मुने! शंकुके वलयको छिद्रयुक्त बनाना चाहिये। तुलामध्यमें आलम्बनार्थ वितानके साथ वलय अथवा कुण्डलाकृतिविशेषका प्रयोग करना चाहिये। तुलाके पट्टेके बीचसे नौ अंगुल मानमें इसे दृढ़तापूर्वक जड़ देना चाहिये; बँधनेवाले पट्टाका विस्तार पाँच वितस्ति होना चाहिये॥ ३४-३८॥
अपरौ सुदृढौ पिण्डौ शुभद्रव्येण कारयेत्।<br>शिक्याधस्तात्प्रकर्तव्यौ पञ्चप्रादेशविस्तरौ।<br>सहस्रेण तु कर्तव्यौ फलानां धारकावुभौ ॥ ३९<br>शताष्टकेन वा कुर्यात्पलैः षट्शतमेव वा।<br>चतुस्तालं च कर्तव्यो विस्तारो मध्यमस्तथा ॥ ४०शुभ द्रव्यसे दो अन्य सुदृढ़ गोलक बनवाने चाहिये। लटकनेवाली डोरीके नीचे पाँच प्रादेश (अंगुष्ठ तथा तर्जनीके बीचकी दूरी) विस्तारवाले दो धारक (पलड़े) बनवाने चाहिये; उन्हें एक हजार पल सुवर्णसे बनवाना चाहिये अथवा आठ सौ अथवा छः सौ पलोंसे बनवाना चाहिये। तुलाका मध्यम विस्तार चार ताल

अध्याय २८] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७११


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सार्धत्रितालविस्तारः कलशस्य विधीयते।<br>बध्नीयात्पञ्चपात्रं तु त्रिमात्रं षट्कमुच्यते॥ ४१<br>चतुर्द्वारसमोपेतं द्वारमङ्गुलमात्रकम्।<br>कुण्डलैश्र्च समोपेतैः शुक्लशुद्धसमन्वितैः॥ ४२<br>कुण्डले कुण्डले कार्यं शृङ्खलापरिमण्डलम्।<br>शृङ्खलाधारवलयमवलम्बेन योजयेत्॥ ४३<br>प्रादेशं वा चतुर्मात्रं भूमेस्त्यक्त्वावलम्बयेत्।(मध्यमासे अंगुष्ठके बीचकी दूरी) प्रमाणवाला बनाना चाहिये। कलशका विस्तार साढ़े तीन तालका बनानेका विधान है। वहाँपर एक विस्तृत पात्र बाँधना चाहिये; उसे तीन अथवा छः अवधृति प्रमाणवाला कहा जाता है। वह चार छिद्रोंसे युक्त हो तथा प्रत्येक छिद्र एक अंगुल प्रमाणका हो। वह छिद्र श्वेत तथा शुद्ध द्रव्योंसे युक्त कुण्डलोंसे समन्वित हो। प्रत्येक कुण्डलमें जंजीर बाँध देनी चाहिये। कुण्डलमें बँधी हुई जंजीरको तुलादण्डके अवलम्ब (वलय)-से जोड़ देना चाहिये। भूमिसे प्रादेशमात्र अथवा चार अंगुल छोड़कर पलड़ोंको लटकाना चाहिये॥ ३९-४३ १/२॥
घटौ पुरुषमात्रौ तु कर्तव्यौ शोभनावुभौ॥ ४४<br>तौ वालुकाभिः सम्पूर्य शिवं तत्र विनिःक्षिपेत्।<br>द्विहस्तमात्रमवटे स्थापनीयौ प्रयत्नतः॥ ४५<br>निःशेषं पूरयेद्विद्वान् वालुकाभिः समन्ततः।<br>येन निश्चलतां गच्छेत्तेन मार्गेण कारयेत्॥ ४६पुरुषप्रमाण (फैलानेपर दोनों हाथोंके बीचकी दूरी)-वाले दो सुन्दर घट बनाने चाहिये और उन दोनोंको बालूसे भरकर उनमें शिवकी स्थापना करनी चाहिये। दो हाथ गहरे गड्ढेमें उन घटोंको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये और गड्ढोंके रिक्त भागको चारों ओरसे बालूसे इस प्रकार भर देना चाहिये कि वे स्थिर हो जायें॥ ४४-४६॥
श्रूयतां परमं गुह्यं वेदिकोपरिमण्डलम्।<br>अष्टमाङ्गुलसंयुक्तं मङ्गलाङ्कुरशोभितम्॥ ४७<br>फलपुष्पसमाकीर्णं धूपदीपसमन्वितम्।<br>वेदिमध्ये प्रकर्तव्यं दर्पणोदरसन्निभम्॥ ४८<br>आलिखेन्मण्डलं पूर्वं चतुर्द्वारसमन्वितम्।<br>शोभोपशोभासम्पन्नं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥ ४९<br>वर्णजातिसमोपेतं पञ्चवर्णं तु कारयेत्।अब परम रहस्यकी बात सुनिये। वेदीके ऊपर आठ अंगुल प्रमाणवाला, मांगलिक अंकुरोंसे सुशोभित, फल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एवं धूप-दीपसे समन्वित परिमण्डल बनाना चाहिये। वेदीके मध्यमें दर्पणके उदरभागके समान मण्डल बनाना चाहिये। पहले चार द्वारोंसे युक्त, शोभा तथा उपशोभासे सम्पन्न एवं कर्णिका-केसरसे समन्वित मण्डलकी रचना करनी चाहिये, उसे नानाविध रंगोंसे युक्त अथवा पाँच रंगोंसे बनाना चाहिये॥ ४७-४९ १/२॥
वज्रं प्रागन्तरे भागे आग्नेय्यां शक्तिमुज्ज्वलाम्॥ ५०<br>आलिखेद्दक्षिणे दण्डं नैर्ऋत्यां खड्गमालिखेत्।<br>पाशश्च वारुणे लेख्यो ध्वजं वै वायुगोचरे॥ ५१<br>कौबेर्यां तु गदा लेख्या ऐशान्यां शूलमालिखेत्।<br>शूलस्य वामदेशेन चक्रं पद्मं तु दक्षिणे॥ ५२<br>एवं लिखित्वा पश्चाच्च होमकर्म समाचरेत्।मण्डलके पूर्वदिशामें वज्र, अग्निकोणमें उज्ज्वल शक्ति, दक्षिणमें दण्ड, नैर्ऋत्यकोणमें खड्ग, पश्चिममें पाश, वायव्यकोणमें ध्वज, उत्तरमें गदा और ईशानकोणमें शूल तथा शूलके वामभागमें चक्र एवं दक्षिण भागमें पद्मकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार आयुधोंकी रचना करके बादमें होमकर्म करना चाहिये॥ ५०-५२ १/२॥
प्रधानहोमं गायत्र्या स्वाहा शक्राय वह्नये॥ ५३<br>यमाय राक्षसेशाय वरुणाय च वायवे।<br>कुबेरायेश्वरायाथ विष्णवे ब्रह्मणे पुनः॥ ५४प्रधान होम गायत्रीमन्त्रसे करना चाहिये; इसके बाद ॐ शक्राय स्वाहा, ॐ वह्नये स्वाहा, ॐ यमाय स्वाहा, ॐ राक्षसेशाय स्वाहा, ॐ वरुणाय स्वाहा,
७१२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| स्वाहान्तं प्रणवेनैव होतव्यं विधिपूर्वकम्।<br>स्वशाखाग्निमुखेनैव जयादिप्रतिसंयुतम्॥ ५५<br>स्विष्टान्तं सर्वकार्याणि कारयेद्विधिवत्तदा।<br>सर्वहोमाग्रहोमे च समित्पालाशमुच्यते।<br>एकविंशतिसंख्यातं मन्त्रेणानेन होमयेत्॥ ५६<br><br>अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय चास्मान्प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा भूः स्वाहा भुवः स्वाहा स्वः स्वाहा भूर्भुवः स्वस्तथैव च।<br><br>समिद्धोमश्च चरुणा घृतस्य च यथाक्रमम्।<br>शुक्लान्नपायसं चैव मुद्गान्नं चरवः स्मृताः॥ ५७<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ५८ | ॐ वायवे स्वाहा, ॐ कुबेराय स्वाहा, ॐ ईश्वराय स्वाहा, ॐ विष्णवे स्वाहा तथा ॐ ब्रह्मणे स्वाहा—इन मन्त्रोंको बोलकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। उस समय अपनी शाखामें उक्त अग्निविधानके अनुसार जयाहोमसे लेकर स्विष्टकृत् होमपर्यन्त सभी कार्य विधिवत् कराना चाहिये। सभी होमों तथा प्रधान होममें पलाशकी समिधा बतायी गयी है। इस मन्त्रसे इक्कीस आहुतियाँ देकर होम करना चाहिये—अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय चास्मान्प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा भूः स्वाहा भुवः स्वाहा स्वः स्वाहा भूर्भुवः स्वः स्वाहा। समिधाहोम चरु तथा घृतसे यथाक्रम करना चाहिये; श्वेत अन्नका पायस तथा कृशरान्न—ये चरु कहे गये हैं। एक हजार, उसका आधा (पाँच सौ) अथवा एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहिये॥ ५३—५८॥ | | अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः। आरे बाधस्व दुच्छुनाम्। अग्निरृषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्। अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम्। दधद्रयिं मयि पोषम्। प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयः स्याम पतयो रयीणाम्। | अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः। आरे बाधस्व दुच्छुनाम्॥ (यजु० १९।३८) अग्निर्र्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्॥ (यजु० २६।९) अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम्। दधद्रयिं मयि पोषम्॥ (यजु० ८।३८) प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयः स्याम पतयो रयीणाम्॥ (कृष्णयजु० १।८।१४) इन मन्त्रोंसे आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। | | गायत्र्या च प्रधानस्य समिद्धोमस्तथैव च।<br>चरुणा च तथाज्यस्य शक्रादीनां च होमयेत्॥ ५९<br>वज्रादीनां च होतव्यं सहस्रार्धं ततः क्रमात्।<br>ब्रह्म जज्ञेति मन्त्रेण ब्रह्मणे विष्णवे पुनः॥ ६०<br>नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।<br>तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।<br>अयं विशेषः कथितो होममार्गः सुशोभनः।<br>दूर्वया क्षीरयुक्तेन पञ्चविंशत्पृथक्पृथक्॥ ६१<br>त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।<br>उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यौर्मुक्षीय मामृतात्॥ ६२ | रुद्रगायत्रीमन्त्रसे समिधाओंके द्वारा प्रधान देवताके लिये हवन करना चाहिये; चरु तथा घृतसे इन्द्र आदि देवताओंके लिये हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् क्रमसे वज्र आदिके निमित्त पाँच सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। ब्रह्माके लिये 'ब्रह्म जज्ञानं'*—इस मन्त्रसे और विष्णुके लिये 'नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्'—इस मन्त्रसे होम करना चाहिये; यह परम सुन्दर मुख्य होमविधान कहा गया है। क्षीरयुक्त दूर्वाके द्वारा पृथक्-पृथक् पचीस आहुतियाँ 'त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यौर्मुक्षीय |


* ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः॥ (यजु० १३।३)

अध्याय २८] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७१३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दूर्वाहोमः प्रशस्तोऽयं वास्तुहोमश्च सर्वथा।<br>प्रायश्चित्तमघोरेण सर्पिषा च शतं शतम्॥ ६३मामृतात्॥' मन्त्रसे देनी चाहिये। ये दूर्वाहोम तथा वास्तु-होम सर्वथा प्रशस्त हैं। घृतके द्वारा अघोर मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ प्रदान करके प्रायश्चित्त करना चाहिये॥ ५९–६३॥
ब्रह्माणं दक्षिणे वामे विष्णुं विश्वगुरुं शिवम्।<br>मध्ये देव्या समं ज्ञेयमिन्द्रादिगणसंवृतम्॥ ६४<br><br>आदित्यं भास्करं भानुं रविं देवं दिवाकरम्।<br>उषां प्रभां तथा प्रज्ञां सन्ध्यां सावित्रिमेव च॥ ६५<br><br>पञ्चप्रकारविधिना खखोल्काय महात्मने।<br>विष्टरां सुभगां चैव वर्धनीं च प्रदक्षिणाम्॥ ६६<br><br>आप्यायनीं च सम्पूज्य देवीं पद्मासने रविम्।<br>प्रभूतं वाथ कर्तव्यं विमलं दक्षिणे तथा॥ ६७<br><br>सारं पश्चिमभागे च आराध्यं चोत्तरे यजेत्।<br>मध्ये सुखं विजानीयात्केसरेषु यथाक्रमम्॥ ६८<br><br>दीप्तां सूक्ष्मां जया भद्रां विभूतिं विमलां क्रमात्।<br>अमोघां विद्युतां चैव मध्यतः सर्वतोमुखीम्॥ ६९<br><br>सोममङ्गारकं चैव बुधं गुरुमनुक्रमात्।<br>भार्गवं च तथा मन्दं राहुं केतुं तथैव च॥ ७०<br><br>पूजयेद्धोमयेद्देवं दापयेच्च विशेषतः।<br>योगिनो भोजयेत्तत्र शिवतत्त्वैकपारगान्॥ ७१[देवतामण्डलके] दाहिने भागमें ब्रह्मा, बायें भागमें विष्णु, मध्यमें देवी पार्वतीके साथ इन्द्र आदि गणोंसे आवृत विश्वगुरु शिवको जानना चाहिये। [ग्रहमण्डलका निरूपण किया जा रहा है—] आदित्य, भास्कर, भानु, रवि, भगवान् दिवाकर, उषा, प्रभा, प्रज्ञा, सन्ध्या तथा सावित्री—पंच प्रकार विधिसे 'महात्मने खखोल्काय नमः'—ऐसा कहकर इनकी स्थापना-पूजा करनी चाहिये। विष्टरा, सुभगा, वर्धनी, प्रदक्षिणा तथा देवी आप्यायनीकी पूजा करके पद्मासनपर रविकी पूजा करनी चाहिये। प्रारम्भमें प्रभूतकी, दक्षिणमें विमलकी, पश्चिम भागमें सारकी, उत्तरमें आराध्यकी तथा मध्यमें सुखकी पूजा करनी चाहिये। कमलके दलोंमें क्रमशः दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युताको और मध्यमें सर्वतोमुखीको जानना चाहिये। तत्पश्चात् चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतुकी स्थापना करके इनके निमित्त पूजन-हवन-दान कराना चाहिये। इस प्रकार सभी विधान विस्तारपूर्वक करके इस अवसरपर शिवतत्त्वके पारगामी विद्वान् एवं वेदाध्ययनसे सम्पन्न योगियोंको भोजन कराना चाहिये॥ ६४–७१ १/२॥
दिव्याध्ययनसम्पन्नान् कृत्वैवं विधिविस्तरम्।<br>होमे प्रवर्तमाने च पूर्वदिक्स्थानमध्यमे॥ ७२<br><br>आरोहयेद्विधानेन रुद्राध्यायेन वै नृपम्।<br>धारयेत्तत्र भूपालं घटिकैकां विधानतः॥ ७३<br><br>यजमानो जपेन्मन्त्रं रुद्रगायत्रिसंज्ञकम्।<br>घटिकार्धं तदर्धं वा तत्रैवासनमारभेत्॥ ७४<br><br>आलोक्य वारुणं धीमान् कूर्चहस्तः समाहितः।<br>नृपश्च भूषणैर्युक्तः खड्गखेटकधारकः॥ ७५<br><br>स्वस्तिरित्यादिभिश्चादावन्ते चैव विशेषतः।<br>पुण्याहं ब्राह्मणैः कार्यं वेदवेदाङ्गपारगैः॥ ७६हवन-कार्यके आरम्भ हो जानेपर पूर्वदिशाके मध्यभागमें रुद्राध्यायका पाठ करते हुए विधानपूर्वक राजाको तुलापर चढ़ाये और विधानपूर्वक वहाँ राजाको एक घड़ीतक बैठाये रखे। उस समय यजमान [राजा] रुद्रगायत्री नामक मन्त्रका जप करे। वह एक घटिकाका आधा अथवा उसके भी आधे समयतक आसन लगाये रखे। सूर्यबिम्बको देखकर बुद्धिमान् ब्राह्मण समाहितचित्त होकर हाथमें कूर्च धारण किये रहे एवं सभी आभूषणोंसे युक्त राजा हाथमें खड्ग तथा खेटक धारण किये रहे। कर्मके आदि तथा अन्तमें वेदवेदांगमें पारंगत ब्राह्मणोंके द्वारा विशेषरूपसे स्वस्तिवाचनके साथ पुण्याहवाचन
७१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जयमङ्गलशब्दादिब्रह्मघोषैः सुशोभनैः।<br>नृत्यवाद्यादिभिर्गीतैः सर्वशोभासमन्वितैः॥ ७७<br>स्वमेवं चन्द्रदिग्भागे सुवर्णं तत्र विक्षिपेत्।<br>तुलाधारौ समौ वृत्तौ तुलाभारः सदा भवेत्॥ ७८<br>शतनिष्काधिकं श्रेष्ठं तदर्धं मध्यमं स्मृतम्।<br>तस्यार्धं च कनिष्ठं स्यात्त्रिविधं तत्र कल्पितम्॥ ७९किया जाना चाहिये और जय आदि मांगलिक शब्दों, परम सुन्दर वेदध्वनियों तथा सब प्रकारकी शोभासे युक्त नृत्य-वाद्य-गीत आदिके साथ उत्तर दिशाभागमें स्थित पलड़ेपर अपने भारके बराबर सुवर्ण रखे, ताकि तुलाके दोनों पलड़े समान हो जायँ; इस प्रकार तुलाभार सदा अक्षय बना रहे। सौ निष्कसे अधिक परिमाणवाली तुला श्रेष्ठ, पचास निष्कवाली मध्यम और पचीस निष्कवाली कनिष्ठ कही गयी है—इस प्रकार तुला तीन प्रकारकी कही गयी है॥ ७२—७९॥
वस्त्रयुग्ममथोष्णीषं कुण्डलं कण्ठशोभनम्।<br>अङ्गुलीभूषणं चैव मणिबन्धस्य भूषणम्॥ ८०<br>एतानि चैव सर्वाणि प्रारम्भे धर्मकर्मणि।<br>पाशुपतव्रतायाथ भस्माङ्गाय प्रदापयेत्॥ ८१अग्रपूजाके प्रारम्भमें दोनों वस्त्र, उष्णीष, कुण्डल, कण्ठहार, अँगूठी तथा मणिबन्धभूषण (कंकण)—ये सभी वस्तुएँ भस्मराग धारण किये हुए पाशुपतव्रतमें निरत शैवाचार्यको प्रदान कराने चाहिये।
पूर्वोक्तभूषणं सर्वं सोष्णीषं वस्त्रसंयुतम्।<br>दद्यादेतत्प्रयोक्तृभ्य आच्छादनपटं बुधः॥ ८२<br>दक्षिणां च शतं सार्धं तदर्धं वा प्रदापयेत्।<br>योगिनां चैव सर्वेषां पृथङ्निष्कं प्रदापयेत्॥ ८३<br>यागोपकरणं दिव्यमाचार्याय प्रदापयेत्।<br>इतरेषां यतीनां तु पृथङ्निष्कं प्रदापयेत्॥ ८४बुद्धिमान्‌को चाहिये कि पूर्वोक्त आभूषण, वस्त्रयुक्त उष्णीष एवं उत्तरीय—यह सब ऋत्विजोंको प्रदान करे और एक सौ पचास अथवा उसका आधा निष्क सुवर्णकी दक्षिणा प्रदान करे। साथ ही सभी योगियोंको अलगसे सुवर्णमुद्रा प्रदान करे। इस अवसरपर दिव्य यागोपकरण आचार्यको प्रदान करे और अन्य यतियोंको पृथक् रूपसे सुवर्णमुद्रा प्रदान करे।
तुलारोहसुवर्णं च शिवाय विनिवेदयेत्।<br>प्रासादं मण्डपं चैव प्राकारं भूषणं तथा॥ ८५<br>सुवर्णपुष्पं पटहं खड्गं वै कोशमेव च।<br>कृत्वा दत्त्वा शिवायाथ किञ्चिच्छेषं च बुद्धिमान्॥ ८६<br>आचार्येभ्यः प्रदातव्यं भस्मार्द्धेभ्यो विशेषतः।<br>बन्दीकृतान् विसृज्याथ कारागृहनिवासिनः॥ ८७बुद्धिमान्‌को चाहिये कि तुलापर रखे हुए सुवर्ण तथा प्रासाद, मण्डप, प्राकार, आभूषण, सुवर्णपुष्प, पटह, खड्ग, कोश—इन सबको एकत्र करके इनमेंसे कुछ भाग बचाकर शिवको प्रदान कर दे और बचे हुए भागको विशेषरूपसे भस्मधारी आचार्योंको प्रदान करे।
सहस्रकलशैस्तत्र सेचयेत्परमेश्वरम्।<br>घृतेन केवलैनापि देवदेवमुमापतिम्॥ ८८<br>पयसा वाथ दध्ना वा सर्वद्रव्यैरथापि वा।<br>ब्रह्मकूर्चेन वा देवं पञ्चगव्येन वा पुनः॥ ८९<br>गायत्र्या चैव गोमूत्रं गोमयं प्रणवेन वा।<br>आप्यायस्वेति वै क्षीरं दधिक्राव्णोति वै दधि॥ ९०<br>तेजोऽसीत्याज्यमीशानमन्त्रेणैवाभिषेचयेत् ।<br>देवस्यत्वेति देवेशं कुशाम्बुकलशेन वै॥ ९१<br>रुद्राध्यायेन वा सर्वं स्नापयेत्परमेश्वरम्।<br>सहस्रकलशं शम्भोर्नाम्नां चैव सहस्रकैः॥ ९२कारागारमें स्थित बन्दियोंको मुक्त करके सहस्र कलशोंके जलसे अथवा केवल घृतसे, दूधसे, दहीसे अथवा नारिकेल आदिके जलसे देवदेव परमेश्वर उमापतिका अभिषेक करना चाहिये; अथवा ब्रह्मकूर्चके द्वारा पंचगव्यसे शिवजीका अभिषेक करना चाहिये। गायत्रीमन्त्रसे गोमूत्र, प्रणवमन्त्रसे गोमय, 'आप्यायस्व०'—मन्त्रसे दूध, 'दधिक्राव्णो०'—मन्त्रसे दही तथा 'तेजोऽसीति०'—मन्त्रसे घृत ग्रहणकर ईशानमन्त्रसे ही अभिषेक करना चाहिये। 'देवस्य त्वा०'—इस मन्त्रके द्वारा कलशमें स्थित कुशाम्बुसे देवेशका अभिषेक करे अथवा रुद्राध्यायके द्वारा परमेश्वर शिवका अभिषेक करे। भगवान् विष्णुके द्वारा

२९- षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि

अध्याय २९ ] षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि ७१५


| विष्णुना कथितैर्वापि तण्डिना कथितैस्तु वा।<br>दक्षेण मुनिमुख्येन कीर्तितैरथ वा पुनः॥ ९३<br><br>महापूजा प्रकर्तव्या महादेवस्य भक्तितः।<br>शिवार्चकाय दातव्या दक्षिणा स्वगुरोः सदा॥ ९४<br><br>देहार्णवं च सर्वेषां दक्षिणा च यथाक्रमम्।<br>दीनान्धकृपणानां च बालवृद्धकृशातुरान्॥ ९५<br><br>भोजयेच्च विधानेन दक्षिणामपि दापयेत्॥ ९६ | कहे गये¹ अथवा [शिवभक्त] तण्डीके द्वारा कहे गये² अथवा मुनिश्रेष्ठ दक्षके द्वारा कहे गये³ शिवके हजार नामोंसे हजार कलशोंके जलसे शिवका अभिषेक करे॥ ८०-९३॥<br><br>भक्तिपूर्वक अपने गुरु महादेवकी सदा महापूजा करनी चाहिये और शिवपूजकको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तुलाद्रव्य और दक्षिणा यथाक्रम ऋत्विज् आदि तथा दीनों, अन्धों, दरिद्रोंको देनी चाहिये; साथ ही बालकों, वृद्धों, निर्बलों तथा रोगियोंको विधान-पूर्वक भोजन कराना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९४-९६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तुलापुरुषदानविधिर्नामाष्टाविंशत्तमोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तुलापुरुषदानविधि' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥


उनतीसवाँ अध्याय

षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि

सनत्कुमार उवाच
तुला ते कथिता ह्येषा आद्या सामान्यरूपिणी।<br>हिरण्यगर्भं वक्ष्यामि द्वितीयं सर्वसिद्धिदम्॥ १सनत्कुमार बोले— मैंने आपसे प्रथमतः सामान्यरूपसे तुलादानका वर्णन कर दिया; अब समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हिरण्यगर्भदानके विषयमें बताऊँगा॥ १॥
अधःपात्रं सहस्रेण हिरण्येन विधीयते।<br>ऊर्ध्वपात्रं तदर्धेन मुखं संवेशमात्रकम्॥ २इसके लिये हजार स्वर्ण-मुद्राओंसे एक नीचेका पात्र बनाना चाहिये और उसके आधे अर्थात् पाँच सौ स्वर्ण-मुद्राओंसे उसके प्रवेश-प्रमाण मुखवाला ऊर्ध्वपात्र (ढक्कन) निर्मित कराना चाहिये। उस शुभ स्वर्णपात्रको सभी अलंकारोंसे विभूषित करना चाहिये॥ २½॥
हैममेवं शुभं कुर्यात्सर्वालङ्कारसंयुतम्।<br>अधःपात्रे स्मरेद्देवीं गुणत्रयसमन्विताम्॥ ३<br><br>चतुर्विंशतिकां देवीं ब्रह्मविष्णुग्निरूपिणीम्।<br>ऊर्ध्वपात्रे गुणातीतं षड्विंशकमुमापतिम्॥ ४तत्पश्चात् नीचेके मुख्य पात्रमें त्रिगुणात्मिका, चतुर्विंशति-तत्त्वस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा-विष्णु-अग्निस्वरूपा भगवतीका ध्यान करे और ऊपरके पात्रमें छब्बीसवें तत्त्वरूप गुणातीत उमापति सदाशिवका और पचीसवें तत्त्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषका ध्यान करे॥ ३-४½॥
आत्मानं पुरुषं ध्यायेत्पञ्चविंशकमग्रजम्।<br>पूर्वोक्तस्थानमध्येऽथ वेदिकोपरि मण्डले॥ ५तदनन्तर पूर्वकी भाँति बताये गये स्थानमें वेदी तथा मण्डल बनाकर पात्रको लेकर शालि (धान)-के ऊपर

१. भगवान् विष्णुद्वारा कथित यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ९८वें अध्यायमें है।
२. शिवभक्त तण्डीप्रोक्त यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ६५वें अध्यायमें वर्णित है।
३. मुनिश्रेष्ठ दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनाम 'शिवरहस्य' नामक ग्रन्थमें वर्णित है।

३०- तिलपर्वतदानविधि

७१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| शालिमध्ये क्षिपेन्नीत्वा नववस्त्रैश्च वेष्टयेत्।<br>माषकल्केन चालिप्य पञ्चद्रव्येण पूजयेत्॥ ६<br>ईशानाद्यैैर्यथान्यायं पञ्चभिः परिपूजयेत्।<br>पूर्ववच्छिवपूजा च होमश्चैव यथाक्रमम्॥ ७<br>देवीं गायत्रीकां जप्त्वा प्रविशेत्प्राङ्मुखः स्वयम्।<br>विधिनैव तु सम्पाद्य गर्भाधानादिकां क्रियाम्॥ ८<br>कृत्वा षोडशमार्गेण विधिना ब्राह्मणोत्तमः।<br>दूर्वाङ्कुरैस्तु कर्तव्या सेचना दक्षिणे पुटे॥ ९<br>औदुम्बरफलैः सार्धमेकविंशत्कुशोदकम्।<br>ईशान्यां तावदेवात्र कुर्यात् सीमन्तकर्मणि॥ १०<br>उद्वहेत्कन्यकां कृत्वा त्रिंशन्निष्केण शोभनाम्।<br>अलङ्कृत्य तथा हुत्वा शिवाय विनिवेदयेत्॥ ११<br>अन्नप्राशनके विद्वान् भोजयेत्पायसादिभिः।<br>एवं विश्वजितान्ता वै गर्भाधानादिकाः क्रियाः॥ १२<br>शक्तिबीजेन कर्तव्या ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>शेषं सर्वं च विधिवत्तुलाहेमवदाचरेत्॥ १३ | स्थापित कर देना चाहिये और उसे नवीन वस्त्रोंसे ढँक देना चाहिये। पुनः माष (उड़द)-के उबटनसे आलेप करके पंचोपचारोंसे ईशान आदि पाँच मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक उस पात्रकी पूजा करनी चाहिये। शिवपूजा तथा होम भी पूर्वकी भाँति क्रमानुसार करना चाहिये॥ ५—७॥<br>भगवती गायत्रीका जप करके पूर्वाभिमुख बैठ जाय और स्वयं श्रेष्ठ आचार्य गर्भाधान आदि सोलह संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न करके दूर्वाके अंकुरोंसे दक्षिण पुटमें सेचन करे। गूलरके फलोंसहित इक्कीस कुशाके जलसे ईशान दिशामें सीमन्तकर्म करे। तीस निष्क परिमाणकी सुवर्णकी सुन्दर कन्या बनाकर उसे [भूषण-वस्त्र आदिसे] अलंकृत करके हवनकर भगवान् शिवको अर्पित करे। विद्वान्‌को चाहिये कि अन्नप्राशन-संस्कारमें पायस (खीर) आदिका भोजन कराये। इस प्रकार वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको गर्भाधानसे लेकर विश्वजित्पर्यन्त उन सभी संस्कारोंको शक्तिबीजके साथ करना चाहिये। शेष सभी कृत्य स्वर्ण-तुलादानकी भाँति विधिवत् करना चाहिये॥ ८—१३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्यगर्भदानविधिर्नामौकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्यगर्भदानविधि' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९॥


तीसवाँ अध्याय

तिलपर्वतदानविधि

सनत्कुमार उवाच
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि तिलपर्वतमुत्तमम्।<br>पूर्वोक्तस्थानकाले तु कृत्वा सम्पूज्य यत्नतः॥ १<br>सुसमे भूतले रम्ये वेदिना च विवर्जिते।<br>दशतालप्रमाणेण दण्डं संस्थाप्य वै मुने॥ २<br>अद्भिः सम्प्रोक्ष्य पश्चाद्विद्वांस्तिलांस्त्वस्मिन् विनिक्षिपेत्।<br>पञ्चगव्येन तं देशं प्रोक्षयेद् ब्राह्मणोत्तमः॥ ३<br>मण्डलं कल्पयेद्विद्वान् पूर्ववत्सुसमन्ततः।<br>नववस्त्रैश्च संस्थाप्य रम्यपुष्पैर्विकीर्य च॥ ४<br>तस्मिन् सञ्चयनं कार्यं तिलभारैर्विशेषतः।<br>दण्डप्रादेशमुत्सेधमुत्तमं परिकीर्तितम्॥ ५सनत्कुमार बोले— हे मुने! अब मैं उत्तम तिलपर्वतदानका विधिवत् वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये स्थान तथा कालमें प्रयत्नपूर्वक पूजन करके तिलपर्वतका दान करे। वेदीरहित सुन्दर समतल भूमिपर दस ताल* प्रमाणका दण्ड स्थापित करके जल छिड़ककर उसपर तिलराशि रखे; श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि पंचगव्यसे उस स्थानका प्रोक्षण करे॥ १—३॥<br>तदनन्तर विद्वान् पूर्ववत् चारों ओर गोल मण्डल बनाये। नये वस्त्रोंको रखकर उसपर सुन्दर पुष्प बिखेरकर वहाँ तिलके बीजोंके भारोंका ढेर लगाये। तिलराशि स्थापित किये गये दण्डसे प्रादेशमात्र ऊपर

* अंगुष्ठसे मध्यमाके बीचकी दूरीको एक ताल कहा जाता है। (वायुपुराण ८।१०३)

३१- सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि

अध्याय ३१] सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि ७१७


| चतुरङ्गुलहीनं तु मध्यमं मुनिपुङ्गवाः।<br>दण्डतुल्यं कनिष्ठं स्याद्दण्डहीनं न कारयेत्॥ ६<br><br>वेष्टयित्वा नवैर्वस्त्रैः परितः पूजयेत्क्रमात्।<br>सद्यादीनि प्रविन्यस्य पूजयेद्विधिपूर्वकम्॥ ७<br><br>अष्टदिक्षु च कर्तव्याः पूर्वोक्ता मूर्तयः क्रमात्।<br>त्रिनिष्केन सुवर्णेन प्रत्येकं कारयेत्क्रमात्॥ ८ | हो, तो उसे उत्तम कहा गया है। हे श्रेष्ठ मुनियो! दण्डसे चार अंगुल कम रहनेपर मध्यम तथा दण्डके बराबर होनेपर कनिष्ठ श्रेणीका होता है। तिलके ढेरको दण्डसे नीचे नहीं करना चाहिये। इस तिलपर्वतको नवीन वस्त्रोंसे चारों ओरसे लपेटकर क्रमसे पूजन करना चाहिये। वहाँ 'सद्योजात' आदि पंचब्रह्मोंको क्रमसे स्थापित करके विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें कही गयी मूर्तियोंको आठों दिशाओंमें क्रमसे स्थापित करना चाहिये; प्रत्येक मूर्तिको तीन निष्क सुवर्णसे निर्मित कराना चाहिये॥ ४–८॥ | | दक्षिणा विधिना कार्या तुलाभारवदेव तु।<br>होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो यथावन्मुनिसत्तमाः॥ ९<br><br>अर्चयेद्देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्।<br>तिलपर्वतमध्यस्थं तिलपर्वतरूपिणम्॥ १०<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या सहस्रकलशादिभिः।<br>दर्शयेत्तिलमध्यस्थं देवदेवमुमापतिम्॥ ११<br><br>पूजयित्वा विधानेन क्रमेण च विसर्जयेत्।<br>श्रोत्रियाय दरिद्राय दापयेत्तिलपर्वतम्॥ १२<br><br>एवं तिलनगः प्रोक्तः सर्वस्मादधिकः परः॥ १३ | तुलाभारके कृत्यकी भाँति इसमें दक्षिणा देनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! इस दानमें पूर्वकी भाँति यथावत् होम करना भी बताया गया है। लोकपालोंसे आवृत, तिल पर्वतके मध्यमें विराजमान तथा तिलपर्वतरूपी देवदेवेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये। हजार कलशोंसे शिवकी अर्चना करनी चाहिये। अपने इष्टजनोंको तिलके मध्यमें स्थित देवाधिदेव उमापतिका दर्शन कराना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक उनका पूजन करके विसर्जन करना चाहिये। तत्पश्चात् उस तिलपर्वतको धनहीन श्रोत्रिय [ब्राह्मण]–को दिला देना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे तिलपर्वतके दानका वर्णन कर दिया; यह सभी दानोंसे श्रेष्ठ है॥ ९–१३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलपर्वतदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलपर्वतदान' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥


इकतीसवाँ अध्याय

सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि

| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यं पर्वतं सूक्ष्ममल्पद्रव्यं महाफलम्।<br>द्रव्यमात्रोपसंयुक्ते काले मध्यं विधीयते॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब एक अन्य सूक्ष्म तिलपर्वतके दानके विषयमें बताता हूँ, जो व्ययमें अल्प द्रव्यवाला, किंतु महान् फल प्रदान करनेवाला है। जब भी व्यक्ति द्रव्यसे सम्पन्न हो जाय, तब इस पवित्र कृत्यको करे॥ १॥ | | गोमयालिप्तभूमौ तु ह्याम्बराणि प्रकीर्य च।<br>तन्मध्ये निक्षिपेद्धीमांस्तिलभारत्रयं शुभम्॥ २ | बुद्धिमान् पुरुषको गोमयसे विधिवत् लीपी गयी भूमिपर वस्त्र बिछाकर उसके मध्यमें तीन भार विशुद्ध तिल स्थापित करना चाहिये॥ २॥ |

३२- सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि

७१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| पद्ममष्टदलं कुर्यात्कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>दशनिष्केण तत्कार्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३<br><br>तिलमध्ये न्यसेत्पद्मं पद्ममध्ये महेश्वरम्।<br>आराध्य विधिवद्देवं वामादीनि प्रपूजयेत्॥ ४<br><br>शक्तिरूपं सुवर्णेन त्रिनिष्केण तु कारयेत्।<br>न्यासं तु परितः कुर्याद्विघ्नेशान् परिभागतः॥ ५<br><br>पूर्वोक्तहेममानेन विघ्नेशानपि कारयेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ६ | तदनन्तर कर्णिका तथा केसरसे युक्त सुवर्णका अष्टदल कमल बनाना चाहिये। इसे दस निष्क अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे प्रमाणवाले सुवर्णसे निर्मित करना चाहिये। इस [अष्टदल] कमलको तिलके मध्य रखना चाहिये और कमलके बीच शिवजीकी विधिवत् आराधना करके उनकी वामदेव आदि मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। तीन निष्क सुवर्णके द्वारा शक्तिकी प्रतिमा बनानी चाहिये। इसी प्रकार आठों दिशाओंमें अष्ट विनायकोंकी स्थापना करनी चाहिये। पूर्वमें कहे गये तीन निष्क सुवर्णसे विघ्नेश्वरोंकी भी प्रतिमा बनानी चाहिये। विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमसे उनकी पूजा करके दानादि शेष क्रियाएँ पूर्वोक्त क्रमसे करें॥ ३-६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥


बत्तीसवाँ अध्याय

सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि

| सनत्कुमार उवाच<br>जपहोमार्चनादानाभिषेकाद्यं च पूर्ववत्।<br>सुवर्णमेदिनीदानं प्रवक्ष्यामि समासतः॥ १<br><br>पूर्वोक्तदेशकाले तु कारयेन्मुनिभिः सह।<br>लक्षणेन यथापूर्वं कुण्डे वा मण्डलेऽथ वा॥ २ | सनत्कुमार बोले—अब मैं सुवर्णमेदिनीदानका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। जप, होम, पूजा, दान, अभिषेक आदि कृत्य पूर्वोक्त देशकालमें पूर्वकी भाँति मुनियोंके द्वारा सम्पन्न कराये जाने चाहिये। यह कार्य पूर्वकथित लक्षणकी भाँति कुण्डमें या मण्डलमें किया जाना चाहिये॥ १-२॥ | | मेदिनीं कारयेद्दिव्यां सहस्रेणापि वा पुनः।<br>एकहस्ता प्रकर्तव्या चतुरस्त्रा सुशोभना॥ ३<br><br>सप्तद्वीपसमुद्राद्यैः पर्वतैरभिसंवृता।<br>सर्वतीर्थसमोपेता मध्ये मेरुसमन्विता॥ ४<br><br>अथवा मध्यतो द्वीपं नवखण्डं प्रकल्पयेत्।<br>पूर्ववन्निखिलं कृत्वा मण्डले वेदिमध्यतः॥ ५<br><br>सप्तभागैकभागेन सहस्राद्विधिपूर्वकम्।<br>शिवभक्ते प्रदातव्या दक्षिणा पूर्वचोदिता॥ ६ | एक हजार सुवर्णमुद्राओंसे अथवा उसके आधे अथवा उसके आधेसे दिव्य पृथ्वीका आकार बनाना चाहिये। उसे चौकोर, अत्यन्त सुन्दर तथा एक हाथ लम्बी-चौड़ी बनाये। वह सात द्वीपों, समुद्रों तथा पर्वतोंसे घिरी हुई हो; सभी तीर्थोंसे युक्त हो तथा मध्यमें मेरुसे सुशोभित हो। मध्य भागमें नौखण्डोंके साथ जम्बूद्वीपका निर्माण करे। मण्डलमें वेदीके मध्य पूर्वकी भाँति सम्पूर्ण कृत्य करके सहस्र स्वर्णमुद्राओंके सातवें भागको शिवभक्तको विधिपूर्वक देना चाहिये; इसमें |

३३- कल्पपादपदानविधि

अध्याय ३३ ] कल्पपादपदानविधि ७१९


| सहस्रकलशाद्यैश्च शङ्करं पूजयेच्छिवम्। <br><br> सुवर्णमेदिनीप्रोक्तं लिङ्गेऽस्मिन् दानमुत्तमम्॥ ७ | दक्षिणा पूर्वकी भाँति बतायी गयी है। हजार कलश आदिके द्वारा कल्याणकारी भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। इस लिङ्गपुराणमें कहा गया सुवर्णमेदिनीदान अत्यन्त श्रेष्ठ है॥ ३-७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णमेदिनीदानं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णमेदिनीदान' नामक बत्तीसावाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

कल्पपादपदानविधि

सनत्कुमार उवाचसनत्कुमार बोले—
अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि कल्पपादपमुत्तमम्।<br>शतनिष्केण कृत्वैवं सर्वशाखासमन्वितम्॥ १<br><br>शाखानां विविधं कृत्वा मुक्तादामाद्यलम्बनम्।<br>दिव्यैर्मारकतैश्चैव चाङ्कुराग्रं प्रविन्यसेत्॥ २<br><br>प्रवालं कारयेद्विद्वान् प्रवालेन द्रुमस्य तु।<br>फलानि पद्मरागैश्च परितोऽस्य सुशोभयेत्॥ ३<br><br>मूलं च नीलरत्नेन वज्रेण स्कन्धमुत्तमम्।<br>वैडूर्येण द्रुमाग्रं च पुष्परागेण मस्तकम्॥ ४<br><br>गोमेदकेन वै कन्दं सूर्यकान्तेन सुव्रत।<br>चन्द्रकान्तेन वा वेदिं द्रुमस्य स्फटिकेन वा॥ ५अब मैं उत्तम कल्पवृक्षदानका वर्णन करूँगा। सौ निष्क सुवर्णसे सभी शाखाओंसे युक्त एक कल्पवृक्ष बनाकर उसकी समस्त शाखाओंमें मोतियोंकी माला लटकाकर दिव्य मरकत मणिसे अंकुरका अग्रभाग बनाये। विद्वान्‌को चाहिये कि प्रवाल (मूँगे)-से वृक्षका किसलय बनाये और उसमें चारों ओर पद्मराग मणियोंसे फल बनाये। नीलमणिसे उस वृक्षका मूल, हीरेसे सुन्दर स्कन्ध (तना), वैदूर्य मणिसे वृक्षका अग्रभाग और पुष्पराग (पुखराज)-से मस्तक बनाये। हे सुव्रत! गोमेदसे वृक्षका कन्द और सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त अथवा स्फटिक मणिसे वृक्षके चारों ओर वेदी बनाये॥ १—५॥
वितस्तिमात्रमायामं वृक्षस्य परिकीर्तितम्।<br>शाखाष्टकस्य मानं च विस्तारं चोर्ध्वतस्तथा॥ ६<br><br>तन्मूले स्थापयेल्लिङ्गं लोकपालैः समावृतम्।<br>पूर्वोक्तवेदिमध्ये तु मण्डले स्थाप्य पादपम्॥ ७<br><br>पूजयेद्देवमीशानं लोकपालांश्च यत्नतः।<br>पूर्ववज्जपहोमाद्यं तुलाभारवदाचरेत्॥ ८<br><br>निवेदयेद्द्रुमं शाम्भोयोगिनां वाथ वा नृप।<br>भस्माङ्गिभ्योऽथ वा राजा सार्वभौमो भविष्यति॥ ९कल्पवृक्षकी ऊँचाई एक वितस्ति (बारह अंगुल) कही गयी है। उसकी आठ शाखाओंका विस्तार इतने ही प्रमाणवाला होना चाहिये। उस वृक्षके मूलमें लोकपालोंसहित शिवलिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलमें पूर्वोक्त वेदीके मध्यमें कल्पवृक्षको स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक भगवान् शिव तथा लोकपालोंकी पूजा करनी चाहिये। जप, होम आदि पूर्वकी भाँति तुलादानके समान ही करना चाहिये। हे राजन्! अन्तमें इस वृक्षको शिवजीको अर्पण कर देना चाहिये अथवा भस्मधारी योगियोंको दान कर देना चाहिये। इसे करनेवाला मनुष्य अगले जन्ममें सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजा होगा॥ ६—९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कल्पपादपदानविधिर्नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कल्पपादपदानविधि' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३३॥

३४- गणेशेशदानविधि

७२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


चौंतीसवाँ अध्याय

गणेशेशदानविधि

| सनत्कुमार उवाच<br>गणेशेशं प्रवक्ष्यामि दानं पूर्वोक्तमण्डपे।<br>सम्पूज्य देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्॥ १॥<br><br>विश्वेश्वरान् यथाशास्त्रं सर्वाभरणसंयुतान्।<br>दशनिष्केण वै कृत्वा सम्पूज्य च विधानतः॥ २॥<br><br>अष्टदिक्ष्वष्टकुण्डेषु पूर्ववद्धोममाचरेत्।<br>पञ्चावरणमार्गेण पारम्पर्यक्रमेण च॥ ३॥<br><br>सप्तविप्रान् समभ्यर्च्य कन्यामेकां तथोत्तरे।<br>दापयेत्सर्वमन्त्राणि स्वैःस्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात्॥ ४॥<br><br>दत्त्वैवं सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं गणेशेशदानका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बतायी गयी रीतिसे निर्मित किये गये मण्डपमें लोकपालोंसहित देवदेवेश्वर सदाशिवका पूजन करके दस निष्क सुवर्णसे आठों दिक्पालोंकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथाशास्त्र सभी आभरणोंसे विभूषित करके विधिपूर्वक उनका पूजनकर आठों दिशाओंमें आठ कुण्डोंमें पंचावरण मार्गसे तथा परम्पराक्रमसे पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>तत्पश्चात् सात विप्रोंकी तथा उत्तर दिशामें एक कन्याकी विधिपूर्वक पूजा करके अनुक्रमसे अपने-अपने देवतामन्त्रोंसे सभी देवप्रतिमाओंका दान कर देना चाहिये। इस प्रकार दान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४-५॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गणेशेशदानविधिनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गणेशेशदानविधिनिरूपण' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥


पैंतीसवाँ अध्याय

सुवर्णधेनुदानविधि

| सनत्कुमार उवाच<br>अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि हेमधेनुविधिक्रमम्।<br>सर्वपापप्रशमनं ग्रहदुर्भिक्षनाशनम्॥ १॥<br><br>उपसर्गप्रशमनं सर्वव्याधिनिवारणम्।<br>निष्काणां च सहस्रेण सुवर्णेन तु कारयेत्॥ २॥<br><br>तदर्धेनापि वा सम्यक् तदर्धार्धेन वा पुनः।<br>शतेन वा प्रकर्तव्या सर्वरूपगुणान्विता॥ ३॥<br><br>गोरूपं सुखुरं दिव्यं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>खुराग्रे विन्यसेद्वज्रं शृङ्गे वै पद्मरागकम्॥ ४॥<br><br>भ्रुवोर्मध्ये न्यसेद्दिव्यं मौक्तिकं मुनिसत्तमाः।<br>वैडूर्येण स्तनाः कार्या लाङ्गूलं नीलतः शुभम्॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं आपसे हेमधेनुके दानकी विधिका वर्णन करूँगा; यह सभी पापोंका नाश करनेवाला, ग्रह तथा दुर्भिक्षका शमन करनेवाला, उपद्रवोंको शान्त करनेवाला और समस्त व्याधियोंको दूर करनेवाला है॥ १ १/२॥<br><br>हजार सुवर्णमुद्राओंसे एक गौ बनानी चाहिये; अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे अथवा एक सौ स्वर्णमुद्राओंसे सभी लक्षणों तथा गुणोंसे समन्वित धेनुका निर्माण कराना चाहिये। वह गोप्रतिमा सुन्दर खुरोंवाली, दिव्य तथा सभी लक्षणोंसे युक्त होनी चाहिये॥ २-३ १/२॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! खुरोंके अग्र भागमें हीरा तथा सींगोंमें पद्मराग लगाना चाहिये और दोनों भौंहोंके |

३६- ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि

अध्याय ३६ ] ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि ७२१


दन्तस्थाने प्रकर्तव्यः पुष्परागः सुशोभनः।<br>पशुवत्कारयित्वा तु वत्सं कुर्यात्सुशोभनम्॥ ६<br><br>सुवर्णदशनिष्केण सर्वरत्नसुशोभितम्।<br>पूर्वोक्तवेदिकामध्ये मण्डलं परिकल्प्य तु॥ ७<br><br>तन्मध्ये सुरभिं स्थाप्य सवत्सां सर्वतत्त्ववित्।<br>सवत्सां सुरभिं तत्र वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत्॥ ८<br><br>सम्पूजयेद्गां गायत्र्या सवत्सां सुरभिं पुनः।<br>अथैकाग्निविधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि॥ ९<br><br>समिदाज्यविधानेन पूर्ववच्छेषमाचरेत्।<br>शिवपूजा प्रकर्तव्या लिङ्गं स्नाप्य घृतादिभिः॥ १०<br><br>गामालभ्य च गायत्र्या शिवायादापयेच्छुभाम्।<br>दक्षिणा च प्रकर्तव्या त्रिंशन्निष्का महामते॥ ११मध्यमें दिव्य मोती लगाना चाहिये। वैदूर्य मणिसे स्तनोंको तथा नीलरत्नसे शुभ पुच्छको भूषित करना चाहिये। दाँतोंमें परम सुन्दर पुष्पराज लगाना चाहिये। साथ ही दस निष्क सुवर्णसे गायकी भाँति एक सुन्दर बछड़ा बनवाकर उसे सभी रत्नोंसे विभूषित करना चाहिये॥ ४-६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् सर्वतत्त्वविद् पुरुषको चाहिये कि पूर्वमें बतायी गयी विधिसे निर्मित वेदिकाके मध्य मण्डल बनाकर उसके मध्यमें बछड़ेसहित धेनुको रखकर बछड़ेसहित उस गौको दो वस्त्रोंसे वेष्टित कर दे और गायत्रीमन्त्रसे बछड़ेसहित उस सुरभि गौकी पूजा करे॥ ७-८ १/२॥<br><br>इसके बाद अग्निविधानसे समिधा तथा घृतसे विधिपूर्वक होम करना चाहिये; शेष कार्य पूर्वकी भाँति करना चाहिये। तत्पश्चात् शिवलिङ्गको घृत आदिसे स्नान कराकर शिव-पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गौका स्पर्श करके गायत्रीमन्त्रका उच्चारणकर उस मंगलमयी धेनुको शिवको अर्पण कर देना चाहिये। हे महामते! तीस निष्क सुवर्णकी दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९-११॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हेमधेनुदानविधिनिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हेमधेनुदानविधिनिरूपण' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥


छत्तीसवाँ अध्याय

ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि

सनत्कुमार उवाचसनत्कुमार बोले—
लक्ष्मीदानं प्रवक्ष्यामि महदैश्वर्यवर्धनम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कार्यं वेदिकोपरिमण्डले॥ १<br><br>श्रीदेवीमतुलां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि।<br>सहस्रेण तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः॥ २<br><br>अष्टोत्तरशतेनापि सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>मण्डले विन्यसेल्लक्ष्मीं सर्वालङ्कारसंयुताम्॥ ३अब मैं महान् ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मीदानका वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति बताये गये विधानसे निर्मित मण्डपमें बनायी गयी वेदीके ऊपर यह दानकर्म करना चाहिये। हजार स्वर्णमुद्राओं अथवा उसके आधे अथवा उसके आधे अथवा एक सौ आठ स्वर्णमुद्राओंसे विधिपूर्वक अनुपम तथा सभी लक्षणोंसे युक्त श्रीदेवीप्रतिमा बनाकर उन लक्ष्मीजीको सभी अलंकारोंसे विभूषित करके मण्डलमें स्थापित करना चाहिये॥ १-३॥

३७- तिलधेनुदानविधिनिरूपण

७२२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| तस्यास्तु दक्षिणे भागे स्थण्डिले विष्णुमर्चयेत्।<br>अर्चयित्वा विधानेन श्रीसूक्तेन सुरेश्वरीम्॥ ४<br><br>अर्चयेद्विष्णुगायत्र्या विष्णुं विश्वगुरुं हरिम्।<br>आराध्य विधिना देवीं पूर्ववद्धोममाचरेत्॥ ५<br><br>समिद्धुत्वा विधानेन आज्याहुतिमथाचरेत्।<br>पृथगष्टोत्तरशतं होमयेद्ब्राह्मणोत्तमैः॥ ६ | उनके दक्षिण भागमें स्थण्डिलके ऊपर श्रीविष्णुका पूजन करना चाहिये। श्रीसूक्तसे विधानपूर्वक सुरेश्वरीकी पूजा करके विष्णुगायत्रीसे विश्वगुरु भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। देवीकी विधिपूर्वक आराधना करके पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये। सर्वप्रथम विधिपूर्वक समिधासे हवन करके बादमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको घृतकी पृथक् एक सौ आठ आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ ४–६॥ | | आहूय यजमानं तु तस्याः पूर्वदिशि स्थले।<br>तस्मै तां दर्शयेद्देवीं दण्डवत्प्रणमेत्क्षितौ॥ ७<br><br>प्रणम्य विष्णुं तत्रस्थं शिवं पूर्ववदर्चयेत्।<br>तस्या विंशतिभागं तु दक्षिणा परिकीर्तिता॥ ८<br><br>तदर्द्धांशं तु दातव्यमितरेषां यथार्हतः।<br>ततस्तु होमयेच्छम्भुं भक्तो योगी विशेषतः॥ ९ | तत्पश्चात् यजमानको बुलाकर उन देवीके पूर्वदिशाभागमें उसे बिठाकर उन देवीका दर्शन कराना चाहिये। वह यजमान भी पृथ्वीपर देवीको दण्डवत् प्रणाम करे। इसके बाद वहाँ प्रतिष्ठित विष्णुको प्रणाम करके पूर्वकी भाँति शिवकी पूजा करनी चाहिये। आचार्यके लिये उस मूर्तिके बीसवें भागके तुल्य दक्षिणा बतायी गयी है। उसका आधा अर्थात् बीसवें भागका आधा यथायोग्य अन्य [शिवभक्तों]-को दान करना चाहिये। तदनन्तर भक्त-योगी आचार्यको विशेष-रूपसे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये होम कराना चाहिये॥ ७–९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लक्ष्मीदानविधिनिरूपणं नाम षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लक्ष्मीदानविधिनिरूपण' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥


सैंतीसवाँ अध्याय

तिलधेनुदानविधिनिरूपण

| सनत्कुमार उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि तिलधेनुविधिक्रमम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कुर्याच्छिवपूजां तु पश्चिमे॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं तिलधेनुदानके विधिक्रमका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये नियमसे निर्मित मण्डपमें पश्चिम भागमें शिवपूजा करनी चाहिये। | | तस्याग्रे मध्यतो भूमौ पद्ममालिख्य शोभनम्।<br>वस्त्रैराच्छादितं पद्मं तन्मध्ये विन्यसेच्छुभम्॥ २ | उसके आगे मध्यमें भूमिपर सुन्दर कमल बनाकर उसे वस्त्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये। उसके मध्यमें उत्तम तिलपुष्प स्थापित करना चाहिये। | | तिलपुष्पं तु कृत्वाथ हेमपद्मं विनिक्षिपेत्।<br>त्रिंशन्निष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३ | हेमपद्म (सुवर्णकमल) बनाकर उसे मध्यमें रख देना चाहिये। यह हेमपद्म तीस निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे अर्थात् पन्द्रह निष्क अथवा उसके भी आधे अर्थात् |