श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ७०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमारं वरदमपश्यद्ब्रह्मणः सुतम्।<br>नमश्चकार वरदं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम्॥ ५<br><br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव च महाद्युतिः।<br>सोऽपि दृष्ट्वा मनुं देवो हृष्टरोमाभवन्मुनिः॥ ६<br><br>सनत्कुमारः प्राहेदं घृणया च घृणानिधे। | सदाशिव महावृषभपर आरूढ़ होते हैं। वहाँपर उन्होंने स्वर्णकी आभावाले, योगके प्रतापसे युक्त तथा वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको देखा। [उन्हें देखकर] महातेजस्वी मनुने उन वरदायक, ब्रह्मज्ञानी तथा ब्रह्मरूप [सनत्कुमार]-को नमस्कार किया और दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। मनुको देखकर मुनि सनत्कुमार भी हर्षके कारण पुलकित हो उठे और 'हे कृपानिधे!' इस प्रकार सम्बोधित करके दयापूर्वक उनसे कहने लगे॥ ३-६ १/२॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>दृष्ट्वा सर्वेश्वराच्छान्ताच्छङ्करान्नीललोहितात्॥ ७<br><br>लब्ध्वाभिषेकं सम्प्राप्तो विवक्षुर्वद यद्यपि।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ ८<br><br>विज्ञापयामास कथं कर्मणा निर्वृतिर्विभो।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं कर्मणा केवलेन च॥ ९ | सनत्कुमार बोले—शान्तस्वभाववाले नीललोहित सर्वेश्वर शिवका दर्शन करके उनसे जयाभिषेक प्राप्त करके आप यहाँ आये हैं। यदि आप कुछ और पूछनेके इच्छुक हैं, तो पूछिये। तब उनका वचन सुनकर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके मनुने कहा—हे विभो! कर्मके द्वारा मुक्ति कैसे हो सकती है? हे विभो! आप हम लोगोंको कृपा करके यह बतायें कि केवल कर्मसे अथवा ज्ञानसे अथवा ज्ञान-कर्मके मिश्रित प्रभावसे किस प्रकार मुक्ति मिलती है?॥ ७-९॥ |
| ज्ञानेन निर्वृत्तिः सिद्धा विभो मिश्रेण वा क्वचित्।<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा श्रुतिसारविदां निधिः॥ १०<br><br>सनत्कुमारो भगवान् कर्मणा निर्वृतिं क्रमात्।<br>मिश्रेण च क्रमादेव क्षणाज्ज्ञानेन वै मुने॥ ११ | उनका वचन सुनकर वेदरहस्योंको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमारने कहा—हे मुने! कर्मके द्वारा क्रमसे मुक्ति हो जाती है, कर्मयुक्त ज्ञानसे भी क्रमशः मुक्ति होती है, किंतु शुद्ध ज्ञानसे क्षणमात्रमें मोक्ष हो जाता है॥ १०-११॥ |
| पुरामानेन चोष्ट्रत्वमगमं नन्दिनः प्रभोः।<br>शापात्पुनः प्रसादाद्धि शिवमभ्यर्च्य शङ्करम्॥ १२<br><br>प्रसादान्नन्दिनस्तस्य कर्मणैव सुतो ह्यहम्।<br>श्रुत्वोत्तमां गतिं दिव्यामवस्थां प्राप्तवानहम्॥ १३<br><br>शिवार्चनप्रकारेण शिवधर्मेण नान्यथा। | पूर्वकालमें प्रभु नन्दीका अपमान करनेके कारण उनके शापसे मैं ऊँटकी योनिको प्राप्त हो गया था; पुनः उन्हींकी कृपासे कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चन करके उस शिवार्चनरूप कर्मके कारण ही मैं ब्रह्माजीका पुत्र हुआ और उन्हीं नन्दीके अनुग्रहसे उत्तम मुक्तिमार्गका श्रवण करके शिवधर्मरूप शिवार्चनकी रीतिसे दिव्य अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥ १२-१३ १/२॥ |
| राज्ञां षोडशदानानि नन्दिना कथितानि च॥ १४<br><br>धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं कर्मणैव महात्मना।<br>तुलादिरोहणाद्यानि शृणु तानि यथातथम्॥ १५ | महात्मा नन्दिकेश्वरने राजाओंको [दानरूप] कर्मके द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्तिके लिये तुलारोहण आदि सोलह दानोंका वर्णन किया है; उन्हें आप यथाविधि सुनिये॥ १४-१५॥ |