श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २८ ] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७०७
| कल्पकोटिशतेनापि यत्पापं समुपार्जितम्।<br>स्नात्वैवं मुच्यते राजा सर्वपापैर्न संशयः॥ २८१<br><br>व्याधितो मुच्यते राजा क्षयकुष्ठादिभिः पुनः।<br>स नित्यं विजयी भूत्वा पुत्रपौत्रादिभिर्युतः॥ २८२<br><br>जनानुरागसम्पन्नो देवराज इवापरः।<br>मोदते पापहीनश्च प्रियया धर्मनिष्ठया॥ २८३<br><br>उद्देशमात्रं कथितं फलं परमशोभनम्।<br>नृपाणामुपकाराय स्वायम्भुव मनो मया॥ २८४ | सिद्धिको प्राप्त हुए लोगोंने मृत्युतकको जीत लिया। इस विधिसे स्नान करके कोई राजा करोड़ों कल्पोंमें भी जो पाप संचित किया गया हो, उन सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। क्षय-कुष्ठ आदि व्याधियोंसे राजा छुटकारा पा जाता है, वह विजयी होकर सदा पुत्र-पौत्र आदिसे सम्पन्न रहता है, प्रजाजनोंके अनुरागसे युक्त रहता है, दूसरे इन्द्रकी भाँति सुशोभित होता है तथा पापहीन रहते हुए अपनी धर्मनिष्ठ पत्नीके साथ आनन्द प्राप्त करता है। हे स्वायम्भुव मनु! राजाओंके उपकारके लिये ही मैंने संक्षेपमें [जयाभिषेकका] वर्णन किया है, इसका फल अत्यन्त कल्याणकारक है॥ २८०—२८४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अभिषेकविधिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अभिषेकविधि' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २७॥
अट्टाईसवाँ अध्याय
स्वायम्भुव मनुके प्रति सनत्कुमारप्रोक्त षोडश* महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन
| सूत उवाच<br>स्नात्वा देवं नमस्कृत्य देवदेवमुमापतिम्।<br>दिव्येन चक्षुषा रुद्रं नीललोहितमीश्वरम्॥ १<br><br>दृष्ट्वा तुष्टाव वरदं रुद्राध्यायेन शङ्करम्।<br>देवोऽपि तुष्ट्या निर्वाणं राज्यान्ते कर्मणैव तु॥ २<br><br>तवास्तीति सकृच्चोक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवं नमस्कृत्य वृषध्वजम्॥ ३<br><br>आरुरोह महामेरुं महावृषभमिवेश्वरः।<br>तत्र देवं हिरण्याभं योगैश्वर्यसमन्वितम्॥ ४ | **सूतजी बोले—**तदनन्तर इस विधिसे स्नान करके देवदेव उमापति नीललोहित भगवान् रुद्रको नमस्कारकर तथा दिव्य दृष्टिसे उन्हें देखकर वे स्वायम्भुव मनु रुद्राध्यायके द्वारा वरदायक शंकरकी स्तुति करने लगे। भगवान् शिव भी उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर '[दीर्घकालतक] राज्य करके अन्तमें सत्कर्मसे तुम्हारा मोक्ष होगा'—ऐसा एक बार कहकर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १-२ १/२॥<br><br>वृषभध्वज भगवान् शिवको नमस्कार करके स्वायम्भुव मनु मेरुशृंगपर उसी प्रकार आरूढ़ हुए, जैसे |
* सर्ग-प्रतिसर्गरूप पंचलक्षणात्मक पुराणोंके वर्ण्य-विषयमें दान-विधानका विस्तारसे निरूपण हुआ है, जिसका संग्रह परवर्ती निबन्धग्रन्थों— कृत्यकल्पतरु (दानखण्ड), हेमाद्रि (चतुर्वर्गचिन्तामणि), दानमयूख तथा दानसागर आदिमें विस्तारसे हुआ है। श्रीलिङ्गमहापुराणके उत्तरभागके अट्ठाईसवें अध्यायसे चौवालीसवें अध्यायतक सत्रह अध्यायोंमें षोडश महादानोंका वर्णन संक्षेपमें आया है। इसकी पूर्ण जानकारीके लिये उपर्युक्त निबन्धग्रन्थ, मत्स्य, अग्नि आदि पुराणों तथा दानपद्धतियोंका अवलोकन करना चाहिये। पुराणोंमें षोडश महादानोंके नामोंमें अन्तर भी प्राप्त होता है। श्रीलिङ्गमहापुराणमें षोडश महादानोंके अन्तर्गत जिन दानोंका परिगणन हुआ है, उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं— १-तुलापुरुष, २-हिरण्यगर्भ, ३-तिलपर्वत तथा सूक्ष्म तिलपर्वत, ४-सुवर्णमेदिनी, ५-कल्पपादप, ६-गणेशेश, ७-सुवर्णधेनु, ८-लक्ष्मी, ९-तिलधेनु, १०-गोसहस्र, ११-हिरण्याश्व, १२-कन्या, १३-हिरण्यवृष, १४-सुवर्णगज, १५-लोकपालाष्टक तथा १६-ब्रह्मा-विष्णु-महेश-मूर्तिदान।