भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २८] षोडश महादानोंमें तुलापुरुषदानकी विधिका वर्णन ७११


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सार्धत्रितालविस्तारः कलशस्य विधीयते।<br>बध्नीयात्पञ्चपात्रं तु त्रिमात्रं षट्कमुच्यते॥ ४१<br>चतुर्द्वारसमोपेतं द्वारमङ्गुलमात्रकम्।<br>कुण्डलैश्र्च समोपेतैः शुक्लशुद्धसमन्वितैः॥ ४२<br>कुण्डले कुण्डले कार्यं शृङ्खलापरिमण्डलम्।<br>शृङ्खलाधारवलयमवलम्बेन योजयेत्॥ ४३<br>प्रादेशं वा चतुर्मात्रं भूमेस्त्यक्त्वावलम्बयेत्।(मध्यमासे अंगुष्ठके बीचकी दूरी) प्रमाणवाला बनाना चाहिये। कलशका विस्तार साढ़े तीन तालका बनानेका विधान है। वहाँपर एक विस्तृत पात्र बाँधना चाहिये; उसे तीन अथवा छः अवधृति प्रमाणवाला कहा जाता है। वह चार छिद्रोंसे युक्त हो तथा प्रत्येक छिद्र एक अंगुल प्रमाणका हो। वह छिद्र श्वेत तथा शुद्ध द्रव्योंसे युक्त कुण्डलोंसे समन्वित हो। प्रत्येक कुण्डलमें जंजीर बाँध देनी चाहिये। कुण्डलमें बँधी हुई जंजीरको तुलादण्डके अवलम्ब (वलय)-से जोड़ देना चाहिये। भूमिसे प्रादेशमात्र अथवा चार अंगुल छोड़कर पलड़ोंको लटकाना चाहिये॥ ३९-४३ १/२॥
घटौ पुरुषमात्रौ तु कर्तव्यौ शोभनावुभौ॥ ४४<br>तौ वालुकाभिः सम्पूर्य शिवं तत्र विनिःक्षिपेत्।<br>द्विहस्तमात्रमवटे स्थापनीयौ प्रयत्नतः॥ ४५<br>निःशेषं पूरयेद्विद्वान् वालुकाभिः समन्ततः।<br>येन निश्चलतां गच्छेत्तेन मार्गेण कारयेत्॥ ४६पुरुषप्रमाण (फैलानेपर दोनों हाथोंके बीचकी दूरी)-वाले दो सुन्दर घट बनाने चाहिये और उन दोनोंको बालूसे भरकर उनमें शिवकी स्थापना करनी चाहिये। दो हाथ गहरे गड्ढेमें उन घटोंको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये और गड्ढोंके रिक्त भागको चारों ओरसे बालूसे इस प्रकार भर देना चाहिये कि वे स्थिर हो जायें॥ ४४-४६॥
श्रूयतां परमं गुह्यं वेदिकोपरिमण्डलम्।<br>अष्टमाङ्गुलसंयुक्तं मङ्गलाङ्कुरशोभितम्॥ ४७<br>फलपुष्पसमाकीर्णं धूपदीपसमन्वितम्।<br>वेदिमध्ये प्रकर्तव्यं दर्पणोदरसन्निभम्॥ ४८<br>आलिखेन्मण्डलं पूर्वं चतुर्द्वारसमन्वितम्।<br>शोभोपशोभासम्पन्नं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥ ४९<br>वर्णजातिसमोपेतं पञ्चवर्णं तु कारयेत्।अब परम रहस्यकी बात सुनिये। वेदीके ऊपर आठ अंगुल प्रमाणवाला, मांगलिक अंकुरोंसे सुशोभित, फल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एवं धूप-दीपसे समन्वित परिमण्डल बनाना चाहिये। वेदीके मध्यमें दर्पणके उदरभागके समान मण्डल बनाना चाहिये। पहले चार द्वारोंसे युक्त, शोभा तथा उपशोभासे सम्पन्न एवं कर्णिका-केसरसे समन्वित मण्डलकी रचना करनी चाहिये, उसे नानाविध रंगोंसे युक्त अथवा पाँच रंगोंसे बनाना चाहिये॥ ४७-४९ १/२॥
वज्रं प्रागन्तरे भागे आग्नेय्यां शक्तिमुज्ज्वलाम्॥ ५०<br>आलिखेद्दक्षिणे दण्डं नैर्ऋत्यां खड्गमालिखेत्।<br>पाशश्च वारुणे लेख्यो ध्वजं वै वायुगोचरे॥ ५१<br>कौबेर्यां तु गदा लेख्या ऐशान्यां शूलमालिखेत्।<br>शूलस्य वामदेशेन चक्रं पद्मं तु दक्षिणे॥ ५२<br>एवं लिखित्वा पश्चाच्च होमकर्म समाचरेत्।मण्डलके पूर्वदिशामें वज्र, अग्निकोणमें उज्ज्वल शक्ति, दक्षिणमें दण्ड, नैर्ऋत्यकोणमें खड्ग, पश्चिममें पाश, वायव्यकोणमें ध्वज, उत्तरमें गदा और ईशानकोणमें शूल तथा शूलके वामभागमें चक्र एवं दक्षिण भागमें पद्मकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार आयुधोंकी रचना करके बादमें होमकर्म करना चाहिये॥ ५०-५२ १/२॥
प्रधानहोमं गायत्र्या स्वाहा शक्राय वह्नये॥ ५३<br>यमाय राक्षसेशाय वरुणाय च वायवे।<br>कुबेरायेश्वरायाथ विष्णवे ब्रह्मणे पुनः॥ ५४प्रधान होम गायत्रीमन्त्रसे करना चाहिये; इसके बाद ॐ शक्राय स्वाहा, ॐ वह्नये स्वाहा, ॐ यमाय स्वाहा, ॐ राक्षसेशाय स्वाहा, ॐ वरुणाय स्वाहा,