भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 712

७१० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उभयोरन्तरं चैव षद्धस्तं नृपते स्मृतम्।<br>द्वयोश्चतुर्हस्तकृतमन्तरं स्तम्भयोरपि ॥ २८<br>षद्धस्तमन्तरं ज्ञेयं स्तम्भयोरुपरि स्थितम्।<br>वितस्तिमात्रं विस्तारो विष्कम्भस्तावदुत्तरम् ॥ २९बताया गया है। तुलाका दूसरा स्तम्भ पूर्ण गोलाकार तथा व्रणरहित होना चाहिये। हे राजन्! नीचेसे दोनों स्तम्भोंमें परस्पर दो अंगुल कम छः हाथका अन्तर कहा गया है; दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका भी अन्तर रखा जा सकता है। दोनों स्तम्भोंके ऊपरी भागोंके बीच छः हाथका अन्तर जानना चाहिये। दोनों स्तम्भोंका विस्तार एक वितस्ति (बारह अंगुल) होना चाहिये और उतने ही परिमाणका दूसरा विष्कम्भ भी होना चाहिये॥ २३-२९॥
स्तम्भयोस्तु प्रमाणेन उत्तरद्वारसम्मितम्।<br>षट्त्रिंशन्मात्रसंयुक्तं व्यायामं तु तुलात्मकम् ॥ ३०<br>विष्कम्भमष्टमात्रं तु यवपञ्चकसंयुतम्।<br>षट्त्रिंशन्मात्रनाभं स्यान्निर्माणाद्वर्तुलं शुभम् ॥ ३१<br>अग्रे मूले च मध्ये च हेमपट्टेन बन्धयेत्।<br>पट्टमध्ये प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम् ॥ ३२<br>ताम्रेण च प्रकर्तव्यमवलम्बनकत्रयम्।<br>आरेण वा प्रकर्तव्यमायसं नैव कारयेत् ॥ ३३ऊपरके भागमें तुलाकी छड़ दोनों स्तम्भोंकी लम्बाईके अनुकूल हो और तुलाका सन्तुलन करनेवाले छड़की लम्बाई छत्तीस अंगुल होनी चाहिये। विष्कम्भ आठ अंगुल और पाँच यव हो। नाभि छत्तीस अंगुल लम्बी होनी चाहिये और इसे गोल तथा सुन्दर बनाना चाहिये। सिरेपर, मध्यमें और नीचेके भागमें सोनेका पट्ट लगाना चाहिये। मध्यके पट्टमें तीन अवलम्बक लगाने चाहिये। इन अवलम्बकोंको ताम्रका अथवा पीतलका बनाना चाहिये; लोहेका कदापि नहीं बनाना चाहिये॥ ३०-३३॥
मध्ये चोर्ध्वमुखं कार्यमवलम्बः सुशोभनः।<br>रश्मिभिस्तोरणाग्रे वा बन्धयेच्च विधानतः ॥ ३४<br>जिह्वामेकां तुलामध्ये तोरणं तु विधीयते।<br>उत्तरस्य च मध्ये च शङ्कुं दृढमनुत्तमम् ॥ ३५<br>वितानेनोपरि च्छाद्य दृढं सम्यक्प्रयोजयेत्।<br>शङ्कोः सुषिरसम्पन्नं वलयं कारयेन्मुने ॥ ३६<br>तुलामध्ये वितानेन तुल्या लम्बके तथा।<br>वलयेन प्रयोक्तव्यं कुण्डलं वावलम्बनम् ॥ ३७<br>सुदृढं च तुलामध्ये नवमाङ्गुलमानतः।<br>पट्टस्यैव तु विस्तारं पञ्चमात्रप्रमाणतः ॥ ३८पट्टको बीचमें लगानेका अवलम्ब सुन्दर हो तथा उसका मुख ऊपरकी ओर होना चाहिये। तोरणके ऊपरी सिरेपर इसे डोरियोंसे विधिवत् बाँध देना चाहिये। तुलाके मध्यमें तोरण बनाया जाता है, जो जिह्वाके आकारका होता है। उत्तर तथा दक्षिणके मध्यमें एक दृढ़ एवं सुन्दर शंकु होना चाहिये; वितानके सिरेपर दृढ़तापूर्वक इसे भलीभाँति लगा देना चाहिये। हे मुने! शंकुके वलयको छिद्रयुक्त बनाना चाहिये। तुलामध्यमें आलम्बनार्थ वितानके साथ वलय अथवा कुण्डलाकृतिविशेषका प्रयोग करना चाहिये। तुलाके पट्टेके बीचसे नौ अंगुल मानमें इसे दृढ़तापूर्वक जड़ देना चाहिये; बँधनेवाले पट्टाका विस्तार पाँच वितस्ति होना चाहिये॥ ३४-३८॥
अपरौ सुदृढौ पिण्डौ शुभद्रव्येण कारयेत्।<br>शिक्याधस्तात्प्रकर्तव्यौ पञ्चप्रादेशविस्तरौ।<br>सहस्रेण तु कर्तव्यौ फलानां धारकावुभौ ॥ ३९<br>शताष्टकेन वा कुर्यात्पलैः षट्शतमेव वा।<br>चतुस्तालं च कर्तव्यो विस्तारो मध्यमस्तथा ॥ ४०शुभ द्रव्यसे दो अन्य सुदृढ़ गोलक बनवाने चाहिये। लटकनेवाली डोरीके नीचे पाँच प्रादेश (अंगुष्ठ तथा तर्जनीके बीचकी दूरी) विस्तारवाले दो धारक (पलड़े) बनवाने चाहिये; उन्हें एक हजार पल सुवर्णसे बनवाना चाहिये अथवा आठ सौ अथवा छः सौ पलोंसे बनवाना चाहिये। तुलाका मध्यम विस्तार चार ताल
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