श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 744, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 744
७४२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| वैवस्वताय विद्महे दण्डहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो यमः प्रचोदयात्॥ २० | वैवस्वताय विद्महे दण्डहस्ताय धीमहि। तन्नो यमः प्रचोदयात्॥ |
| निशाचराय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो निर्ऋतिः प्रचोदयात्॥ २१ | निशाचराय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि। तन्नो निर्ऋतिः प्रचोदयात्॥ |
| शुद्धहस्ताय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो वरुणः प्रचोदयात्॥ २२ | शुद्धहस्ताय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि। तन्नो वरुणः प्रचोदयात्॥ |
| सर्वप्राणाय विद्महे यष्टिहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो वायुः प्रचोदयात्॥ २३ | सर्वप्राणाय विद्महे यष्टिहस्ताय धीमहि। तन्नो वायुः प्रचोदयात्॥ |
| यक्षेश्वराय विद्महे गदाहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो यक्षः प्रचोदयात्॥ २४ | यक्षेश्वराय विद्महे गदाहस्ताय धीमहि। तन्नो यक्षः प्रचोदयात्॥ |
| सर्वेश्वराय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि।<br>तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ २५ | सर्वेश्वराय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ |
| कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि।<br>तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥ २६ | कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥ |
| एवं प्रभिद्य गायत्रीं तत्तद्देवानुरूपतः।<br>पूजयेत्स्थापयेत्तेषामासनं प्रणवं स्मृतम्॥ २७<br>अथवा विष्णुमतुलं सूक्तेन पुरुषेण वा।<br>विष्णुं चैव महाविष्णुं सदाविष्णुमनुक्रमात्॥ २८<br>स्थापयेद्देवगायत्र्या परिकल्प्य विधानतः।<br>वासुदेवः प्रधानस्तु ततः सङ्कर्षणः स्वयम्॥ २९<br>प्रद्युम्नो ह्यनिरुद्धश्च मूर्तिभेदास्तु वै प्रभोः।<br>बहूनि विविधानीह तस्य शापोद्भवानि च॥ ३०<br>सर्वावर्तेषु रूपाणि जगतां च हिताय वै।<br>मत्स्यः कूर्मोऽथ वाराहो नारसिंहोऽथ वामनः॥ ३१<br>रामो रामश्च कृष्णश्च बौद्धः कल्की तथैव च।<br>तथान्यानि न देवस्य हरेः शापोद्भवानि च॥ ३२<br>तेषामपि च गायत्रीं कृत्वा स्थाप्य च पूजयेत्।<br>गुह्यानि देवदेवस्य हरेर्नारायणस्य च॥ ३३<br>विज्ञानानि च यन्त्राणि मन्त्रोपनिषदानि च।<br>पञ्चब्रह्माङ्गजानीह पञ्चभूतमयानि च॥ ३४ | इस प्रकार उन-उन देवताओंके अनुरूप पृथक्-पृथक् गायत्रीका उच्चारणकर उनका स्थापन तथा पूजन करना चाहिये। प्रणवको उनका आसन कहा गया है। अथवा अतुलनीय विष्णुका स्थापन-पूजन पुरुषसूक्तसे करे। विष्णु, महाविष्णु तथा सदाविष्णुकी कल्पना करके अनुक्रमसे विष्णुगायत्रीके द्वारा विधानपूर्वक उनकी स्थापना करनी चाहिये। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये उन प्रभुकी व्यूहमूर्तियोंके भेद हैं। सत्ययुग आदि युगोंमें लोकोंके कल्याणके लिये शापोंके कारण उनके अनेकविध अवतार हुए हैं। मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, राम, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध, कल्की तथा और भी उन प्रभुके अन्य अवतार शापके कारण हुए हैं। उनकी भी गायत्रीकी कल्पना करके उनकी स्थापनाकर पूजन करना चाहिये। शिवजी और भगवान् विष्णुके गुप्तरूप, यन्त्र, मन्त्र, उपनिषद्, पृथ्वी आदि पंचभूतमय मूर्तियों और सद्योजात आदि पंचब्रह्मोंका स्थापन करके पूजन करना चाहिये॥ ३—३४॥ |
| नमो नारायणायेति मन्त्रः परमशोभनः।<br>हरेरष्टाक्षराणीह प्रणवेन समासतः॥ ३५ | प्रणवसहित नमो नारायणाय (ॐ नमो नारायणाय)—यह विष्णुका अत्यन्त उत्तम अष्टाक्षर |