श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 745, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 745
अध्याय ४८ ] देवप्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवोंके गायत्रीमन्त्र ७४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ॐ नमो वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च।<br>प्रद्युम्नाय प्रधानाय अनिरुद्धाय वै नमः॥ ३६<br><br>एवमेकेन मन्त्रेण स्थापयेत्परमेश्वरम्।<br>बिम्बानि यानि देवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ३७<br><br>प्रतिष्ठा चैव पूजा च लिङ्गवन्मुनिसत्तमाः।<br>रत्नविन्याससहितं कौतुकानि हरेरपि॥ ३८<br><br>अचले कारयेत्सर्वं चलेऽप्येवं विधानतः।<br>तन्नेत्रोन्मीलनं कुर्यान्नेत्रमन्त्रेण सुव्रताः॥ ३९<br><br>क्षेत्रप्रदक्षिणं चैव आरामस्य पुरस्य च।<br>जलाधिवासनं चैव पूर्ववत्परिकीर्तितम्॥ ४०<br><br>कुण्डमण्डपनिर्माणं शयनं च विधीयते।<br>हुत्वा नवाग्निभागेन नवकुण्डे यथाविधि॥ ४१<br><br>अथवा पञ्चकुण्डेषु प्रधाने केवलेऽथ वा।<br>प्रतिष्ठा कथिता दिव्या पारम्पर्यक्रमागता॥ ४२<br><br>शिलोद्भवानां बिम्बानां चित्राभासस्य वा पुनः।<br>जलाधिवासनं प्रोक्तं वृषेन्द्रस्य प्रकीर्तितम्॥ ४३<br><br>प्रासादस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठा परिकीर्तिता।<br>प्रासादाङ्गस्य सर्वस्य यथाङ्गानां तनोरिव॥ ४४ | मन्त्र है। 'ॐ नमो वासुदेवाय, ॐ नमः सङ्कर्षणाय, ॐ नमः प्रद्युम्नाय, ॐ नमः प्रधानाय, ॐ नमः अनिरुद्धाय'—इस प्रकार उन-उन मन्त्रोंमेंसे एकके द्वारा परमेश्वर विष्णुका स्थापन करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनिगण! परमेष्ठी शिवके जो रूप पूर्वमें बताये जा चुके हैं, उनकी भी प्रतिष्ठा तथा पूजा लिङ्गकी ही भाँति करनी चाहिये। विष्णुकी भी प्रतिष्ठामें [शिवप्रतिष्ठाकी भाँति] रत्नविन्याससहित मंगलोत्सव करना चाहिये। अचल प्रतिष्ठामें जो किया जाता है, वह सब चलमूर्तिकी भी प्रतिष्ठामें विधानपूर्वक करना चाहिये। हे सुव्रतो! उन सावयव मूर्तियोंका नेत्रोन्मीलन नेत्रमन्त्रसे करे। उद्यान, नगर तथा क्षेत्रकी प्रदक्षिणा तथा जलाधिवासन पूर्वकी भाँति कहा गया है। कुण्ड-मण्डपनिर्माण तथा शयन भी पूर्वकी भाँति किया जाता है। नवाग्निभागसे नौ कुण्डोंमें अथवा पाँच कुण्डोंमें अथवा केवल प्रधान कुण्डमें आहुति देकर हवन करे। मैंने परम्पराक्रमसे प्राप्त यह दिव्य प्रतिष्ठा कही है। पाषाणकी बनायी गयी मूर्तियोंका जलाधिवासन करना चाहिये, किंतु चित्रित प्रतिमाओंका जलाधिवासन नहीं करना चाहिये और वृषेन्द्रकी मूर्तिका अधिवासन अवश्य करना चाहिये। देवालय-प्रतिष्ठामें तथा उसके भागोंकी प्रतिष्ठामें उसी तरहकी प्रतिष्ठा-विधि बतायी गयी है, जैसी शरीरके अंगोंकी॥ ३५-४४॥ |
| वृषाग्निमातृविघ्नेशकुमारानपि यत्नतः।<br>श्रेष्ठां दुर्गां तथा चण्डीं गायत्र्या वै यथाविधि॥ ४५<br><br>प्रागाद्यं स्थापयेच्छम्भोरष्टावरणमुत्तमम्।<br>लोकपालगणेशाद्यानपि शम्भोः प्रविन््यसेत्॥ ४६<br><br>उमा चण्डी च नन्दी च महाकालो महामुनिः।<br>विघ्नेश्वरो महाभृङ्गी स्कन्दः सौम्यादितः क्रमात्॥ ४७<br><br>इन्द्रादीन् स्वेषु स्थानेषु ब्रह्माणं च जनार्दनम्।<br>स्थापयेच्चैव यत्नेन क्षेत्रेशं वेशगोचरे॥ ४८ | वृष, अग्नि, मातृका, विघ्नेश (गणपति), कुमार (कार्तिकेय), श्रेष्ठा, दुर्गा तथा चण्डी—ये आठ शिव-प्रतिष्ठाके आवरण-देवता हैं; इनकी भी अपनी-अपनी गायत्रीसे यथाविधि पूर्व आदिके क्रमसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये। शिवके प्रासादके चारों ओर लोकपाल, गणपति आदिकी भी स्थापना करनी चाहिये। उत्तर दिशासे लेकर क्रमसे उमा, चण्डी, नन्दी, महाकाल, महामुनि [लकुलीश], विघ्नेश्वर, महाभृंगी और स्कन्दकी स्थापना करनी चाहिये। इन्द्र आदि लोकपालों, ब्रह्मा तथा जनार्दनकी स्थापना अपनी-अपनी दिशाओंमें और क्षेत्रपालकी स्थापना ईशानकोणमें यत्नपूर्वक करनी |