भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय ४८ ] देवप्रतिमाओंकी संक्षेपमें प्रतिष्ठा-विधि तथा विविध देवोंके गायत्रीमन्त्र ७४३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ॐ नमो वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च।<br>प्रद्युम्नाय प्रधानाय अनिरुद्धाय वै नमः॥ ३६<br><br>एवमेकेन मन्त्रेण स्थापयेत्परमेश्वरम्।<br>बिम्बानि यानि देवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ३७<br><br>प्रतिष्ठा चैव पूजा च लिङ्गवन्मुनिसत्तमाः।<br>रत्नविन्याससहितं कौतुकानि हरेरपि॥ ३८<br><br>अचले कारयेत्सर्वं चलेऽप्येवं विधानतः।<br>तन्नेत्रोन्मीलनं कुर्यान्नेत्रमन्त्रेण सुव्रताः॥ ३९<br><br>क्षेत्रप्रदक्षिणं चैव आरामस्य पुरस्य च।<br>जलाधिवासनं चैव पूर्ववत्परिकीर्तितम्॥ ४०<br><br>कुण्डमण्डपनिर्माणं शयनं च विधीयते।<br>हुत्वा नवाग्निभागेन नवकुण्डे यथाविधि॥ ४१<br><br>अथवा पञ्चकुण्डेषु प्रधाने केवलेऽथ वा।<br>प्रतिष्ठा कथिता दिव्या पारम्पर्यक्रमागता॥ ४२<br><br>शिलोद्भवानां बिम्बानां चित्राभासस्य वा पुनः।<br>जलाधिवासनं प्रोक्तं वृषेन्द्रस्य प्रकीर्तितम्॥ ४३<br><br>प्रासादस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठा परिकीर्तिता।<br>प्रासादाङ्गस्य सर्वस्य यथाङ्गानां तनोरिव॥ ४४मन्त्र है। 'ॐ नमो वासुदेवाय, ॐ नमः सङ्कर्षणाय, ॐ नमः प्रद्युम्नाय, ॐ नमः प्रधानाय, ॐ नमः अनिरुद्धाय'—इस प्रकार उन-उन मन्त्रोंमेंसे एकके द्वारा परमेश्वर विष्णुका स्थापन करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनिगण! परमेष्ठी शिवके जो रूप पूर्वमें बताये जा चुके हैं, उनकी भी प्रतिष्ठा तथा पूजा लिङ्गकी ही भाँति करनी चाहिये। विष्णुकी भी प्रतिष्ठामें [शिवप्रतिष्ठाकी भाँति] रत्नविन्याससहित मंगलोत्सव करना चाहिये। अचल प्रतिष्ठामें जो किया जाता है, वह सब चलमूर्तिकी भी प्रतिष्ठामें विधानपूर्वक करना चाहिये। हे सुव्रतो! उन सावयव मूर्तियोंका नेत्रोन्मीलन नेत्रमन्त्रसे करे। उद्यान, नगर तथा क्षेत्रकी प्रदक्षिणा तथा जलाधिवासन पूर्वकी भाँति कहा गया है। कुण्ड-मण्डपनिर्माण तथा शयन भी पूर्वकी भाँति किया जाता है। नवाग्निभागसे नौ कुण्डोंमें अथवा पाँच कुण्डोंमें अथवा केवल प्रधान कुण्डमें आहुति देकर हवन करे। मैंने परम्पराक्रमसे प्राप्त यह दिव्य प्रतिष्ठा कही है। पाषाणकी बनायी गयी मूर्तियोंका जलाधिवासन करना चाहिये, किंतु चित्रित प्रतिमाओंका जलाधिवासन नहीं करना चाहिये और वृषेन्द्रकी मूर्तिका अधिवासन अवश्य करना चाहिये। देवालय-प्रतिष्ठामें तथा उसके भागोंकी प्रतिष्ठामें उसी तरहकी प्रतिष्ठा-विधि बतायी गयी है, जैसी शरीरके अंगोंकी॥ ३५-४४॥
वृषाग्निमातृविघ्नेशकुमारानपि यत्नतः।<br>श्रेष्ठां दुर्गां तथा चण्डीं गायत्र्या वै यथाविधि॥ ४५<br><br>प्रागाद्यं स्थापयेच्छम्भोरष्टावरणमुत्तमम्।<br>लोकपालगणेशाद्यानपि शम्भोः प्रविन्‍्यसेत्॥ ४६<br><br>उमा चण्डी च नन्दी च महाकालो महामुनिः।<br>विघ्नेश्वरो महाभृङ्गी स्कन्दः सौम्यादितः क्रमात्॥ ४७<br><br>इन्द्रादीन् स्वेषु स्थानेषु ब्रह्माणं च जनार्दनम्।<br>स्थापयेच्चैव यत्नेन क्षेत्रेशं वेशगोचरे॥ ४८वृष, अग्नि, मातृका, विघ्नेश (गणपति), कुमार (कार्तिकेय), श्रेष्ठा, दुर्गा तथा चण्डी—ये आठ शिव-प्रतिष्ठाके आवरण-देवता हैं; इनकी भी अपनी-अपनी गायत्रीसे यथाविधि पूर्व आदिके क्रमसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये। शिवके प्रासादके चारों ओर लोकपाल, गणपति आदिकी भी स्थापना करनी चाहिये। उत्तर दिशासे लेकर क्रमसे उमा, चण्डी, नन्दी, महाकाल, महामुनि [लकुलीश], विघ्नेश्वर, महाभृंगी और स्कन्दकी स्थापना करनी चाहिये। इन्द्र आदि लोकपालों, ब्रह्मा तथा जनार्दनकी स्थापना अपनी-अपनी दिशाओंमें और क्षेत्रपालकी स्थापना ईशानकोणमें यत्नपूर्वक करनी

४९- अघोरेश्वररूप भगवान् शिवके निमित्त किये गये जप, हवन एवं पूजनका फल

७४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सिंहासने ह्यानन्तादीन् विद्येशामपि च क्रमात्।<br>स्थापयेत्प्रणवेनैव गुह्याङ्गादीनि पङ्कजे॥ ४९<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं चलस्थापनमुत्तमम्।<br>सर्वेषामपि देवानां देवीनां च विशेषतः॥ ५० | चाहिये। अनन्त आदि तथा वागीश्वरीकी स्थापना सिंहासनपर और धर्म आदिकी स्थापना कमलके आसनपर प्रणवके साथ करनी चाहिये। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें समस्त देवताओं तथा विशेषरूपसे देवियोंकी उत्तम चलप्रतिष्ठाका वर्णन कर दिया॥ ४५–५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे चलमूर्तिस्थापनवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'चलमूर्तिस्थापनवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥


उनचासवाँ अध्याय

अघोरेश्वररूप भगवान् शिवके निमित्त किये गये जप, हवन एवं पूजनका फल

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
अघोरेशस्य माहात्म्यं भवता कथितं पुरा।<br>पूजां प्रतिष्ठां देवस्य भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १[हे भगवन्!] आपने पहले अघोरेशके माहात्म्यका वर्णन किया है; अब उनकी पूजा तथा प्रतिष्ठाका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
अघोरेणाङ्गयुक्तेन विधिवच्च विशेषतः।<br>प्रतिष्ठालिङ्गविधिना नान्यथा मुनिपुङ्गवाः॥ २<br><br>तथाग्निपूजां वै कुर्याद्यथा पूजा तथैव च।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ३<br><br>तिलैर्होमः प्रकर्तव्यो दधिमध्वाज्यसंयुतैः।<br>घृतसक्तुमधूनां च सर्वदुःखप्रमार्जनम्॥ ४<br><br>व्याधीनां नाशनं चैव तिलहोमस्तु भूतिदः।<br>सहस्रेण महाभूतिः शतेन व्याधिनाशनम्॥ ५<br><br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तो जपेन च न संशयः।<br>अष्टोत्तरशतेनैव त्रिकाले च यथाविधि॥ ६<br><br>अष्टोत्तरसहस्रेण षण्मासाज्जायते ध्रुवम्।<br>सिद्धयो नैव सन्देहो राज्यमण्डलिनामपि॥ ७हे श्रेष्ठ मुनियो! अंगयुक्त अघोरमन्त्रसे शिवलिङ्ग-प्रतिष्ठाकी विधिसे सम्यक् प्रकारसे अघोरेशकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये; अन्य प्रकारसे नहीं। जैसे लिङ्गपूजा होती है, वैसे ही अग्निपूजा भी करनी चाहिये। दधि, मधु तथा घृतसे युक्त तिलोंसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार हवन करना चाहिये। घृत, सत्तू तथा मधुका हवन सभी दुःखोंको दूर करनेवाला तथा व्याधियोंका नाश करनेवाला है। तिलका होम ऐश्वर्य-प्रदायक है। तिलके एक हजार हवनसे महान् ऐश्वर्य और एक सौ हवनसे व्याधिनाश होता है। त्रिकाल विधिपूर्वक अघोर-मन्त्रके एक सौ आठ जपसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। इसके एक हजार आठ जपसे छः माहके भीतर ही सभी सामन्त राजाओंको भी निश्चित रूपसे सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ २–७॥
सहस्रेण ज्वरो याति क्षीरेण च जुहोति यम्।<br>त्रिकालं मासमेकं तु सहस्रं जुहुयात्ययः॥ ८<br><br>मासेन सिध्यते तस्य महासौभाग्यमुत्तमम्।<br>सिद्ध्यते चाब्दहोमेन क्षौद्राज्यदधिसंयुतम्॥ ९जिस व्यक्तिके निमित्त दुग्धसे हजार बार आहुति दी जाती है, उसका ज्वर समाप्त हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एक माह तक तीनों कालोंमें दुग्धकी हजार आहुति प्रदान करे, तो महीनेभरमें उसे अत्युत्तम

५०- विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान

अध्याय ५०] विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान ७४५


यवक्षीराज्यहोमेन जातितण्डुलकेन वा।<br>प्रीयेत भगवानीशो ह्यघोरः परमेश्वरः ॥ १०<br><br>दध्ना पुष्टिर्नृपाणां च क्षीरहोमेन शान्तिकम्।<br>षण्मासं तु घृतं हुत्वा सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ ११<br><br>राजयक्ष्मा तिलैर्होमान्नश्यते वत्सरेण तु।<br>यवहोमेन चायुष्यं घृतेन च जयस्तदा ॥ १२<br><br>सर्वकुष्ठक्षयार्थं च मधुनाक्तैश्च तण्डुलैः।<br>जुहुयादयुतं नित्यं षण्मासान्नियतः सदा ॥ १३<br><br>आज्यं क्षीरं मधुश्चैव मधुरत्रयमुच्यते।<br>समस्तं तुष्यते तस्य नाशयेद्वै भगन्दरम् ॥ १४<br><br>केवलं घृतहोमेन सर्वरोगक्षयः स्मृतः।<br>सर्वव्याधिहरं ध्यानं स्थापनं विधिनार्चनम् ॥ १५<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरस्य महात्मनः।<br>प्रतिष्ठा यजनं सर्वं नन्दिना कथितं पुरा ॥ १६<br><br>ब्रह्मपुत्राय शिष्याय तेन व्यासाय सुव्रताः ॥ १७सौभाग्यकी प्राप्ति होती है और मधु, घृत तथा दधिके मिश्रणका नित्य वर्षपर्यन्त हवन करनेसे मनुष्य सिद्ध हो जाता है। जौ, दुग्ध, घृत और जातिपुष्पके समान श्वेत चावलके होमसे भगवान् अघोर परमेश्वर शिव प्रसन्न होते हैं ॥ ८-१०॥<br><br>छः मासतक नित्य दधिके हवनसे राजाओंको पुष्टि प्राप्त होती है, दुग्धके हवनसे शान्ति होती है और घृतके हवनसे उनके सभी रोगोंका नाश होता है। वर्षपर्यन्त तिलोंके हवनसे राजयक्ष्मा नष्ट होता है, जौके हवनसे आयु प्राप्त होती है और घृतके हवनसे विजय मिलती है। सभी प्रकारके कुष्ठोंके नाशके लिये नियमसे युक्त रहकर छः मासतक प्रतिदिन मधुमिश्रित चावलोंसे दस हजार आहुति प्रदान करनी चाहिये। घृत, दुग्ध और मधुको मधुरत्रय कहा जाता है। इसके हवनसे उस व्यक्तिका भगन्दर रोग नष्ट हो जाता है और सभी लोग उस व्यक्तिसे सन्तुष्ट रहते हैं। केवल घृतके होमसे सभी रोगोंका नष्ट होना बताया गया है। भगवान् अघोरका ध्यान, स्थापन तथा विधिपूर्वक पूजन समस्त कष्टोंको दूर करनेवाला है। हे सुव्रतो! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें परमात्मा अघोरके स्थापन तथा पूजनके विषयमें सब कुछ बता दिया, जिसे पूर्वकालमें नन्दीने ब्रह्मपुत्र शिष्य सनत्कुमारसे कहा था और फिर उन्होंने व्यासजीको बताया था ॥ ११-१७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽघोरेशप्रतिष्ठाविधानवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरेशप्रतिष्ठाविधानवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥


पचासवाँ अध्याय

विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान

ऋषय ऊचुः<br>निग्रहः कथितस्तेन शिववक्त्रेण शूलिना।<br>कृतापराधिनां तं तु वक्तुमर्हसि सुव्रत ॥ १<br><br>त्वया न विदितं नास्ति लौकिकं वैदिकं तथा।<br>श्रौतं स्मार्तं महाभाग रोमहर्षण सुव्रत ॥ २**ऋषिगण बोले—**हे सुव्रत! कल्याणरूप मुखवाले भगवान् शिवने अपने अपराध करनेवालोंके लिये जिस दण्डविधानका वर्णन किया है; उसे आप हमें बतानेकी कृपा करें। हे महाभाग! हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! लौकिक, वैदिक, श्रौत तथा स्मार्त—कोई भी बात आपको अविदित नहीं है ॥ १-२॥
७४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सूत उवाच<br>पुरा भृगुसुतेनोक्तो हिरण्याक्षाय सुव्रताः।<br>निग्रहोऽघोरशिष्येण शुक्रेणाक्षयतेजसा॥ ३<br>तस्य प्रसादाद्दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान्।<br>त्रैलोक्यमखिलं जित्वा सदेवासुरमानुषम्॥ ४<br>उत्पाद्य पुत्रं गणपं चान्धकं चारुविक्रमम्।<br>रराज लोके देवेन वराहेण निषूदितः॥ ५ | सूतजी बोले—हे सुव्रतो! पूर्वकालमें अघोरके शिष्य परम तेजस्वी भृगुपुत्र शुक्राचार्यने हिरण्याक्षको इस निग्रह (दण्डविधान)-का उपदेश किया था। उसके प्रभावसे दैत्यराज हिरण्याक्ष प्रतापी हो गया और देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको जीतकर महान् पराक्रमी तथा गणाधिपति अन्धक नामक पुत्रको उत्पन्न करके संसारमें राज्य करने लगा। बादमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुने उसका वध कर दिया॥ ३–५॥ | | स्त्रीबाधां बालबाधां च गवामपि विशेषतः।<br>कुर्वतो नास्ति विजयो मार्गेणानेन भूतले॥ ६<br>तेन दैत्येन सा देवी धरा नीता रसातलम्।<br>तेनाघोरेण देवेन निष्फलो निग्रहः कृतः॥ ७<br>संवत्सरसहस्रान्ते वराहेण च सूदतः।<br>तस्मादघोरसिद्ध्यर्थं ब्राह्मणान्नैव बाधयेत्॥ ८<br>स्त्रीणामपि विशेषेण गवामपि न कारयेत्। | पृथ्वीलोकमें इस [अनीतिपूर्ण] मार्गसे स्त्री, बालक तथा विशेषकर गौओंको पीड़ा पहुँचानेवालेकी विजय नहीं होती। वह दैत्य देवी पृथिवीको रसातलमें उठा ले गया था। इस कारण देव अघोरने उसके [पृथ्वी-हरणस्वरूप] निग्रहको निष्फल कर दिया। एक हजार वर्षके पश्चात् भगवान् वाराहके द्वारा वह मारा गया। अतः अघोरसिद्धिके लिये ब्राह्मणों तथा विशेषकर स्त्रियोंको पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये; गौओंको तो कभी नहीं पीड़ित करना चाहिये॥ ६–८ १/२॥ | | गुह्याद्गुह्यतमं गोप्यमतिगुह्यं वदामि वः॥ ९<br>आततायिनमुद्दिश्य कर्तव्यं नृपसत्तमैः।<br>ब्राह्मणेभ्यो न कर्तव्यं स्वराष्ट्रेशस्य वा पुनः॥ १०<br>अतीव दुर्जये प्राप्ते बले सर्वे निषूदिते।<br>अधर्मयुद्धे सम्प्राप्ते कुर्याद्विधिमनुत्तमम्॥ ११<br>अघृणेनैव कर्तव्यो ह्यघृणेनैव कारयेत्।<br>कृतमात्रे न सन्देहो निग्रहः सम्प्रजायते॥ १२ | [हे मुनियो!] गोपनीयसे भी परम गोपनीय रहस्य मैं आप लोगोंको बता रहा हूँ। श्रेष्ठ राजाओंको चाहिये कि अपनेको मारनेके लिये उद्यत आततायीके लिये यह निग्रह-विधान करे। ब्राह्मणोंके लिये तथा अपने राष्ट्रके स्वामीके लिये इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। महान् पराजयकी स्थिति आ जानेपर, सम्पूर्ण सेनाके नष्ट हो जानेपर अथवा [शत्रुद्वारा] अधर्म युद्ध किये जानेपर इस अत्युत्तम विधानको करना चाहिये। इस निग्रह-विधिको क्रूर व्यक्ति ही करे अथवा इसे किसी क्रूर स्वभाववाले ब्राह्मणसे कराये। इसके कर लिये जानेपर निग्रह हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ९–१२॥ | | लक्षमात्रं पुमाञ्जप्त्वा अघोरं घोररूपिणम्।<br>दशांशं विधिना हुत्वा तिलेन द्विजसत्तमाः॥ १३<br>सम्पूज्य लक्षपुष्पेण सितेन विधिपूर्वकम्।<br>बाणलिङ्गेऽथवा वह्नौ दक्षिणामूर्तिमाश्रितः॥ १४<br>सिद्धमन्त्रोऽन्यथा नास्ति द्रष्टा सिद्ध्यादयः पुनः।<br>सिद्धमन्त्रः स्वयं कुर्यात्प्रेतस्थाने विशेषतः॥ १५ | हे श्रेष्ठ द्विजो! भयंकर रूपवाले अघोर मन्त्रका एक लाख जप करके और विधिपूर्वक तिलके द्वारा उसके दशांश (दस हजार)-से हवन करके और पुनः बाणलिङ्ग, अग्नि अथवा दक्षिणामूर्ति प्रतिमापर एक लाख श्वेत पुष्पोंके अर्पणद्वारा विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य सिद्धमन्त्र हो जाता है; अन्यथा उसका मन्त्र सिद्ध |

अध्याय ५० ] विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान [ ७४७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मातृस्थानेऽपि वा विद्वान् वेदवेदाङ्गपारगः।<br>केवलं मन्त्रसिद्धो वा ब्राह्मणः शिवभावितः ॥ १६नहीं होता। वेद-वेदांगमें पारंगत विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि सिद्धमन्त्र होनेके लिये इसे प्रेतस्थान अथवा मातृस्थानमें स्वयं करे; अथवा मन्त्रसिद्ध शिवभक्त बुद्धिमान् ब्राह्मण अपने अथवा राजाके उपकारके लिये इस विधिको सम्पन्न करे॥ १३-१६१/२॥
कुर्याद्विधिमिमं धीमानात्मनोऽर्थं नृपस्य वा।<br>शूलाष्टकं न्यसेद्विद्वान् पूर्वादीशानकान्तकम् ॥ १७<br><br>त्रिशिखं च त्रिशूलं च चतुर्विंशच्छिखाग्रतः।<br>अघोरविग्रहं कृत्वा सङ्कुलीकृतविग्रहः ॥ १८<br><br>सर्वनाशकरं ध्यात्वा सर्वकर्माणि कारयेत्।<br>कालाग्निकोटिसङ्काशं स्वदेहमपि भावयेत् ॥ १९[अब निग्रहविधान बताया जाता है] विद्वान् व्यक्ति पूर्वसे आरम्भ करके ईशान [उत्तर-पूर्व] कोणपर समाप्त होनेवाले आठों दिशाओंमें आठ शूल स्थापित करे। त्रिशूलोंके चौबीस किनारोंके सिरोंपर तीन शिखावाले त्रिशूल बनाये। ऐसा त्रिशूलधारी अघोर-विग्रह बनाकर स्वयं संकुचित विग्रहवाला होकर सबका नाश करनेवाले अघोरेश्वरका ध्यान करनेके पश्चात् सभी कार्य करे। साधकको भी चाहिये कि अपने शरीरको करोड़ कालाग्निके समान अनुभव करे॥ १७-१९॥
शूलं कपालं पाशं च दण्डं चैव शरासनम्।<br>बाणं डमरुकं खड्गमष्टायुधमनुक्रमात् ॥ २०<br><br>अष्टहस्तश्च वरदो नीलकण्ठो दिगम्बरः।<br>पञ्चतत्त्वसमारूढो ह्यर्धचन्द्रधरः प्रभुः ॥ २१<br><br>दंष्ट्राकरालवदनो रौद्रदृष्टिर्भयङ्करः।<br>हुंफट्कारमहाशब्दशब्दिताखिलदिङ्मुखः ॥ २२<br><br>त्रिनेत्रं नागपाशेन सुबद्धमुकुटं स्वयम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्नं प्रेतभस्मावगुण्ठितम् ॥ २३<br><br>भूतैः प्रेतैः पिशाचैश्च डाकिनीभिश्च राक्षसैः।<br>संवृतं गजकृत्या च सर्पभूषणभूषितम् ॥ २४<br><br>वृश्चिकाभरणं देवं नीलनीरदनिस्वनम्।<br>नीलाञ्जनाद्रिसङ्काशं सिंहचर्मोत्तरीयकम् ॥ २५<br><br>ध्यायेदेवमघोरेशं घोरघोरतरं शिवम्।<br>षट्त्रिंशदुक्तमात्राभिः प्राणायामेन सुव्रताः ॥ २६<br><br>महामुद्रासमायुक्तः सर्वकर्माणि कारयेत्।उन्होंने शूल, कपाल, पाश, दण्ड, धनुष, बाण, डमरू तथा खड्ग-क्रमसे ये आठ आयुध धारण कर रखे हैं; वरदायक वे प्रभु आठ भुजाओंसे युक्त हैं; उनका कण्ठ नील वर्णका है, वे दिगम्बर हैं; वे पृथ्वी आदि पंचतत्त्वोंसे समन्वित नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ हैं; उन प्रभुने अपने मस्तकपर अर्धचन्द्रमाको धारण कर रखा है; वे विशाल दंष्ट्राओंसे युक्त भयावह मुखवाले हैं; वे भयानक दृष्टिवाले हैं; वे भयंकर हैं; वे हुं-फट् इन महाशब्दोंसे सभी दिशाओंको मुखरित कर रहे हैं; वे तीन नेत्रोंसे सम्पन्न हैं; उन्होंने नागपाशसे अपने मुकुटको भलीभाँति बाँध रखा है; वे सभी प्रकारके आभरणोंसे सम्पन्न हैं; वे चिताभस्म लगाये हुए हैं; वे भूतों, प्रेतों, पिशाचों, डाकिनियों तथा राक्षसोंसे घिरे हुए हैं; वे गजचर्म पहने हुए हैं; सर्प तथा बिच्छूके आभूषणसे अलंकृत हैं; वे जलमय मेघोंके समान गर्जन कर रहे हैं; वे नीलांजनके पर्वतसदृश विग्रहवाले हैं; वे सिंहचर्मका उत्तरीय धारण किये हुए हैं—हे सुव्रतो! पूरक, कुम्भक, रेचक-भेदसे कही गयी छत्तीस मात्राओंके साथ प्राणायामके द्वारा इस प्रकारके अत्यन्त भयंकर रूपवाले अघोरेश्वर भगवान् शिवका ध्यान करना चाहिये। साधकको चाहिये कि महामुद्रासे युक्त होकर समस्त कृत्य सम्पन्न करे॥ २०-२६१/२॥
सिद्धमन्त्रश्चिताग्नौ वा प्रेतस्थाने यथाविधि ॥ २७
७४८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्थापयेन्मध्यदेशे तु ऐन्द्रे याम्ये च वारुणे।<br>कौबेर्यां विधिवत्कृत्वा होमकुण्डानि शास्त्रतः॥ २८<br>आचार्यो मध्यकुण्डे तु साधकाश्च दिशासु वै।<br>परिस्तीर्य विलोमेन पूर्ववच्छूलसम्भृतः॥ २९<br>कालाग्निपीठमध्यस्थः स्वयं शिष्यैश्च तादृशैः।<br>ध्यात्वा घोरमघोरेशं द्वात्रिंशाक्षरसंयुक्तम्॥ ३०<br>विभीतकेन वै कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः।<br>पीठे न्यस्य नृपेन्द्रस्य शत्रुमङ्गारकेण तु॥ ३१<br>कुण्डस्याधः खनेच्छत्रुं ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः।<br>अधोमुखोर्ध्वपादं तु सर्वकुण्डेषु यत्नतः॥ ३२<br>श्मशानाङ्गारमानीय तुषेण सह दाहयेत्।<br>तत्राग्निं स्थापयेत्तूष्णीं ब्रह्मचर्यपरायणः॥ ३३सिद्धमन्त्र-साधक चिताग्निमें अथवा प्रेतस्थानमें यथाविधि मूर्ति स्थापित करे। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओंमें और मध्यमें पाँच होमकुण्ड विधिवत् शास्त्रानुसार बनाकर अग्नि स्थापित करे। आचार्य मध्यदेशके कुण्डके सामने और अन्य ऋत्विज् चारों दिशाओंके कुण्डोंके सामने बैठें। वह कुशोंको विलोम क्रमसे बिछाकर शूलको पकड़ ले। वह स्वयं कालाग्निपीठके मध्य अपने ही सदृश शिष्योंके साथ बैठे। तत्पश्चात् बत्तीस अक्षरोंवाले अघोरमन्त्रसे अघोरेश्वरका ध्यान करके बहेड़ेकी शाखाके बारह अंगुल मापके टुकड़े करके अपने राजाके शत्रुकि प्रतिकृति बनाकर कुण्डमें अंगारके साथ पीठपर रखकर वह ब्राह्मण क्रोधयुक्त होकर कुण्डके अन्दर ऊपरकी ओर पैर तथा नीचेकी ओर मुख करके उस प्रतिकृतिको सभी कुण्डोंमें यत्नपूर्वक गाड़ दे। तदनन्तर श्मशानसे अग्नि लाकर धानकी भूसीके साथ जला दे। साधक ब्रह्मचर्यपरायण होकर मौन-भावसे वहाँ अग्नि स्थापित करे॥ २७-३३॥
मायूरास्त्रेण नाभ्यां तु ज्वलनं दीपयेत्ततः।<br>कञ्चुकं तुषसंयुक्तैः कार्पासास्थिसमन्वितैः॥ ३४<br>रक्तवस्त्रसमं मिश्रैर्होमद्रव्यैर्विशेषतः।<br>हस्तयन्त्रोद्भवैस्तैलैः सह होमं तु कारयेत्॥ ३५<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु होमयेदनुपूर्वशः।<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां समारभ्य यथाक्रमम्॥ ३६<br>अष्टम्यन्तं तथाङ्गारमण्डलस्थानवर्जितः।<br>एवं कृते नृपेन्द्रस्य शत्रवः कुलजैः सह॥ ३७<br>सर्वदुःखसमोपेताः प्रयान्ति यमसादनम्।तत्पश्चात् रक्तवस्त्र ओढ़कर साधक कुण्डकी नाभिमें मयूरास्त्रसे, भूसी तथा कपासके बीजोंसे अग्निको प्रज्वलित करे, इसके बाद हाथके यन्त्रसे निकाले गये विविध तेलों तथा रक्तवस्त्रके साथ अन्य हवन-सामग्रियोंको मिश्रित करके शिष्यके साथ होम करे। कृष्णपक्षमें चतुर्दशीसे आरम्भ करके अष्टमीतक क्रमशः एक हजार आठ बार हवन करे; अंगार-मण्डलकी जगहका स्पर्श न करे। इस कर्मके सम्पन्न कर लेनेपर उस राजाके शत्रु अपने परिवारजनोंसहित सभी कष्टोंसे पीड़ित होकर यमलोकको प्राप्त होते हैं॥ ३४-३७ १/२॥
मन्त्रेणानेन चादाय नृकपाले नखं तथा॥ ३८<br>केशं नृणां तथाङ्गारं तुषं कञ्चुकमेव च।<br>चीरच्छटां राजधूलीं गृहसम्मार्जनस्य वा॥ ३९<br>विषसर्पस्य दन्तानि वृषदन्तानि यानि तु।<br>गवां चैव क्रमेणैव व्याघ्रदन्तनखानि च॥ ४०<br>तथा कृष्णमृगाणां च बिडालस्य च पूर्ववत्।<br>नकुलस्य च दन्तानि वराहस्य विशेषतः॥ ४१<br>दंष्ट्राणि साधयित्वा तु मन्त्रेणानेन सुव्रतः।<br>जपेदष्टोत्तरशतं मन्त्रं चाघोरमुत्तमम्॥ ४२हे सुव्रतो! इस अघोर मन्त्रका जप करते हुए नाखून, मनुष्यका बाल, अंगार, भूसी, साँपके केचुल, वस्त्रसे झाड़ी गयी धूल, राजमार्गकी धूल, गृहसम्मार्जनकी धूल, विषैले साँपके दाँत, बैलोंके दाँत, गायके दाँत, बाघके दाँत और नाखून, काले हिरन-बिल्ली-नेवले तथा विशेषकर सूअरके दाँतको मृत मनुष्यके कपालमें ले करके और इसी मन्त्रसे इन सबको साधकर उत्तम अघोर मन्त्रको एक सौ आठ बार जपना चाहिये॥ ३८-४२॥

५१- भगवान् शिवकी संहारिका शक्ति-वज्रेश्वरीविद्याके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा

अध्याय ५१] भगवान् शिवकी संहारिका शक्तिके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा ७४९


| तत्कपालं नखं क्षेत्रे गृहे वा नगरेऽपि वा।<br>प्रेतस्थानेऽपि वा राष्ट्रे मृतवस्त्रेण वेष्टयेत्॥ ४३<br>शत्रोरष्टमराशौ वा परविष्टे दिवाकरे।<br>सोमे वा परविष्टे तु मन्त्रेणानेन सुव्रतः॥ ४४<br>स्थाननाशो भवेत्तस्य शत्रोर्नाशश्च जायते।<br>शत्रुं राज्ञः समालिख्य गमने समवस्थिते॥ ४५<br>भूतले दर्पणप्रख्ये वितानोपरि शोभिते।<br>चतुस्तोरणसंयुक्ते दर्भमालासमावृते॥ ४६<br>वेदाध्ययनसम्पन्ने राष्ट्रे वृद्धिप्रकाशके।<br>दक्षिणेन तु पादेन मूर्ध्नि सन्ताडयेत्स्वयम्॥ ४७<br>एवं कृते नृपेन्द्रस्य शत्रुनाशो भविष्यति।<br>स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य यः कुर्यादाभिचारिकम्॥ ४८<br>स आत्मानं निहत्यैव स्वकुलं नाशयेत्कुधीः।<br>तस्मात्स्वराष्ट्रगोप्तारं नृपतिं पालयेत्सदा॥ ४९<br>मन्त्रौषधिक्रियाद्यैश्च सर्वयत्नेन सर्वदा।<br>एतद्रहस्यं कथितं न देयं यस्य कस्यचित्॥ ५० | हे सुव्रतो! सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहण लगनेपर या शत्रुकी आठवीं राशिमें इनके होनेपर इसी मन्त्रसे नख आदिसे युक्त उस कपालको शववस्त्रके टुकड़ेमें लपेट ले और उसे शत्रुके खेत, घर, श्मशानभूमि, नगर या देशमें गाड़ दे। ऐसा करनेपर वह शत्रु अपने पदसे च्युत हो जायगा और उसका नाश हो जायगा। विजयके लिये गमनकाल उपस्थित होनेपर अपने राजाके शत्रुके चित्रको दर्पण-सदृश भूमिपर, जो वितानसे सुशोभित हो, चार तोरणोंसे युक्त हो, कुशकी मालाओंसे सुशोभित हो और जहाँ राष्ट्रकी समृद्धिका सूचक वैदिक मन्त्रोच्चार हो रहा हो, लिख करके आचार्य अपने दाहिने पैरसे शत्रुके सिरपर प्रहार करे; ऐसा करनेपर अपने राजाके शत्रुंका नाश हो जायगा। जो व्यक्ति अपने देशके राजाको उद्देश्य करके यह अभिचार-कर्म करता है, वह दुर्बुद्धि अपनेको नष्ट करके अपने कुलका नाश कर डालता है। अतः आचार्यको सदा मन्त्रों, औषधियों तथा अनुष्ठानोंके द्वारा सभी प्रयत्नोंसे अपने देशकी रक्षा करनेवाले राजाकी निरन्तर रक्षा करनी चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने जो यह रहस्य आपलोगोंसे कहा, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये॥ ४३-५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५०॥


इक्यावनवाँ अध्याय

भगवान् शिवकी संहारिका शक्ति—वज्रेश्वरीविद्याके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा

| ऋषय ऊचुः<br>निग्रहोऽघोररूपोऽयं कथितोऽस्माकमुत्तमम्।<br>वज्रवाहनिकां विद्यां वक्तुमर्हसि सत्तम॥ १<br><br>सूत उवाच<br>वज्रवाहनिका नाम सर्वशत्रुभयङ्करी।<br>अनया सेचयेद्वज्रं नृपाणां साधयेत्तथा॥ २<br>वज्रं कृत्वा विधानेन तद्वज्रमभिषिच्य च।<br>अनया विद्यया तस्मिन् विन्यसेत्काञ्चनेन च॥ ३<br>ततश्चाक्षरलक्षं च जपेद्विद्वान् समाहितः।<br>वज्री दशांशं जुहुयाद्वज्रकुण्डे घृतादिभिः॥ ४ | ऋषिगण बोले—हे सत्तम! आपने भयंकररूपवाले इस उत्तम निग्रहके विषयमें हम लोगोंको बता दिया; अब वज्रवाहनिकाविद्याका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ १॥<br><br>सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] वज्रवाहनिका नामक यह विद्या सभी शत्रुओंके लिये भयंकर है। इस विद्यासे वज्रका सेचन करे और उसे राजाओंको समर्पित करे। विधानपूर्वक वज्रका निर्माण करके और इस विद्यासे वज्रको जलद्वारा सिंचित करके उस वज्रपर स्वर्णसे मन्त्र लिखना चाहिये। तत्पश्चात् विद्वान्‌को |

७५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद्वज्रं गोपयेन्नित्यं दापयेन्नृपतेस्ततः।<br>तेन वज्रेण वै गच्छञ्छत्रूञ्जीयाद्रणाजिरे॥ ५चाहिये कि दत्तचित्त होकर अक्षरोंकी संख्याके बराबर लाख संख्यामें जप करे। वज्रीको उस जपका दशांश घृत आदिसे वज्राकार कुण्डमें हवन करना चाहिये। उस वज्रकी नित्य रक्षा करनी चाहिये और बादमें उसे राजाको प्रदान कर देना चाहिये। उस वज्रसहित रणभूमिमें जानेवाला वह राजा शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है॥ २–५॥
पुरा पितामहेनैव लब्धा विद्या प्रयत्नतः।<br>देवी शक्रोपकारार्थं साक्षाद्वज्रेश्वरी तथा॥ ६<br><br>पुरा त्वष्टा प्रजानाथो हतपुत्रः सुरेश्वरात्।<br>विद्यया हरतः सोममिन्द्रवैरेण सुव्रताः॥ ७<br><br>तस्मिन् यज्ञे यथाप्राप्तं विधिनोपकृतं हविः।<br>तदैच्छत महाबाहुर्विश्वरूपविमर्दनः॥ ८<br><br>मत्पुत्रमवधीः शक्र न दास्ये तव शोभनम्।<br>भागं भागार्हता नैव विश्वरूपो हतस्त्वया॥ ९<br><br>इत्युक्त्वा चाश्रमं सर्वं मोहयामास मायया।<br>ततो मायां विनिर्भिद्य विश्वरूपविमर्दनः॥ १०<br><br>प्रसह्य सोममपिबत्सगणैश्च शचीपतिः।<br>ततस्तच्छेषमादाय क्रोधाविष्टः प्रजापतिः॥ ११<br><br>इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहेत्यग्नौ जुहाव ह।<br>ततः कालाग्निसङ्काशो वर्तनाद्वृत्रसंज्ञितः॥ १२<br><br>प्रादुरासीत्सुरेशारिर्दुद्राव च वृषान्तकः।<br>ततः किरीटी भगवान् परित्यज्य दिवं क्षणात्॥ १३<br><br>सहस्रनेत्रः सगणो दुद्राव भयविह्वलः।<br>तदा तमाह स विभुर्हृष्टो ब्रह्मा च विश्वसृट्॥ १४पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माने इन्द्रपर उपकार करनेके लिये भगवान् महेश्वरसे इस साक्षात् देवी वज्रेश्वरीविद्याको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त किया था। हे सुव्रतो! विश्वरूपसे प्राप्त विद्याके बलपर विश्वरूपविमर्दक महाबाहु इन्द्र उस यज्ञमें विधिपूर्वक दी हुई हवि (सोमरस)-को जब चाहने लगे, तब हतपुत्र प्रजापति त्वष्टाने इन्द्रसे कहा—‘हे शक्र! तुमने मेरे पुत्रका वध किया है, अतः मैं तुम्हारा श्रेष्ठ भाग तुम्हें नहीं दूँगा। तुम अपना भाग प्राप्त करनेयोग्य नहीं हो; क्योंकि तुम्हारे द्वारा विश्वरूपका वध किया गया है’—ऐसा कहकर त्वष्टाने अपनी मायासे सम्पूर्ण आश्रमको मोहित कर दिया। तब विश्वरूपका वध करनेवाले शचीपति इन्द्रने उस मायाका भेदन करके बलपूर्वक अपने गणोंके साथ सोमका पान कर लिया। तत्पश्चात् अवशिष्ट सोमको लेकर क्रोधाविष्ट प्रजापति त्वष्टाने ‘इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहा’—ऐसा कहकर अग्निमें उसे होम कर दिया। उसी क्षण हवनकुण्डसे कालाग्निसदृश असुर प्रकट हुआ, जो अपने व्यवहारके कारण वृत्र संज्ञावाला हुआ। उस इन्द्रशत्रुने उन्हें दौड़ा लिया। तब किरीटधारी तथा हजार नेत्रोंवाले भगवान् इन्द्र स्वर्ग छोड़कर भयसे व्याकुल हो अपने गणोंसहित भाग चले [और वे ब्रह्माके पास गये]॥ ६–१३ १/२॥
त्यक्त्वा वज्रं तमेतेन जहीत्यरिमरिन्दमः।<br>सोऽपि सन्नह्य देवेन्द्रो देवैः सार्धं महाभुजः॥ १५<br><br>निहत्य चाप्रयत्नेन गतवान् विगतज्वरः।<br>तस्माद्वज्रेश्वरीविद्या सर्वशत्रुभयङ्करी॥ १६तब विश्वका सृजन करनेवाले प्रभु ब्रह्माने उनसे कहा—हे शत्रुसंहारक! वज्र त्यागकर आप इस मन्त्र (वज्रेश्वरीविद्या)-के द्वारा उस शत्रु्का वध कीजिये। तब शत्रुनाशक वे महाभुज देवेन्द्र भी सावधान होकर देवताओंके साथ बिना प्रयत्न ही उसे मारकर चिन्तामुक्त

५२- वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान

अध्याय ५२ ] वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान ७५१


| मन्देहा राक्षसा नित्यं विजिता विद्ययैव तु।<br>तां विद्यां सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रमोचनीम्॥ १७<br><br>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ फट् जहि हुं फट्<br>छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा।<br>विद्या वज्रेश्वरीत्येषा सर्वशत्रुभयङ्करी।<br>अनया संहतिः शाम्भोर्विद्यया मुनिपुङ्गवाः॥ १८॥ | होकर वहाँसे चले गये॥ १४-१५ १/२ ॥<br><br>अतः वज्रेश्वरीविद्या सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है। मन्देह नामक राक्षस इसी विद्याके द्वारा सदा पराजित हुए। सभी पापोंका नाश करनेवाली उस विद्याको मैं बता रहा हूँ—'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ फट् जहि हुं फट् छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा'—यह वज्रेश्वरीविद्या है, जो सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है। हे मुनिश्रेष्ठो! इसी विद्याके द्वारा शिवजी [विश्वका] संहार करते हैं॥ १६—१८॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वज्रेश्वरीविद्यावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वज्रेश्वरीविद्यावर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५१॥


बावनवाँ अध्याय

वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान

| ऋषय ऊचुः<br>श्रुता वज्रेश्वरी विद्या ब्राह्मी शक्रोेपकारिणी।<br>अनया सर्वकार्याणि नृपाणामिति नः श्रुतम्॥ १<br>विनियोगं वदस्वास्या विद्याया रोमहर्षण।<br><br>सूत उवाच<br>वश्यमाकर्षणं चैव विद्वेषणमतः परम्॥ २<br>उच्चाटनं स्तम्भनं च मोहनं ताडनं तथा।<br>उत्सादनं तथा छेदं मारणं प्रतिबन्धनम्॥ ३<br>सेनास्तम्भनकादीनि सावित्र्या सर्वमाचरेत्।<br>आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि॥ ४<br>ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्।<br>उद्वास्यानेन मन्त्रेण गन्तव्यं नान्यथा द्विजाः॥ ५<br>प्रतिकार्यं तथा बाह्यं कृत्वा वश्यादिकां क्रियाम्।<br>उद्वास्य वह्निमाधाय पुनरन्यं यथाविधि॥ ६<br>देवीमावाह्य च पुनर्जपेत्सम्पूजयेत्पुनः।<br>होमं च विधिना वह्नौ पुनरेव समाचरेत्॥ ७ | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण! हमलोगोंने इन्द्रका उपकार करनेवाली ब्रह्माकी वज्रेश्वरीविद्याका श्रवण किया। इसके द्वारा राजाओंके सब कार्य सिद्ध होते हैं—ऐसा हमने सुना है; अब आप इस विद्याके विनियोगका वर्णन करें॥ १ १/२ ॥<br><br>सूतजी बोले—सावित्रीमन्त्रके द्वारा वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, उच्चाटन, स्तम्भन, मोहन, ताड़न, उत्सादन, छेदन, मारण, प्रतिबन्धन, सेनास्तम्भन आदि क्रियाएँ तथा अन्य सब कुछ करना चाहिये [आवाहन-मन्त्र इस प्रकार है—] 'आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि।' [विसर्जन-मन्त्र इस प्रकार है—] 'ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्।' हे द्विजो! शत्रुके प्रति समस्त बाह्य तथा वश्य आदि क्रियाएँ करके इस मन्त्रसे उद्वासन (विसर्जन) करके ही बाहर जाना चाहिये; इसके विपरीत नहीं करना चाहिये। देवीका विसर्जन करनेके अनन्तर पुनः विधिपूर्वक दूसरी अग्निकी स्थापना करके देवीका आवाहनकर फिरसे जप तथा पूजन करना चाहिये। |

७५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सर्वकार्याणि विधिना साधयेद्विद्यया पुनः।<br>जातीपुष्पैश्च वश्यार्थी जुहुयादयुतत्रयम्॥ ८<br><br>घृतेन करवीरेण कुर्यादाकर्षणं द्विजाः।<br>विद्वेषणं विशेषेण कुर्याल्लाङ्गलकस्य च॥ ९<br><br>तैलेनोच्चाटनं प्रोक्तं स्तम्भनं मधुना स्मृतम्।<br>तिलेन मोहनं प्रोक्तं ताडनं रुधिरेण च॥ १०<br><br>खरस्य च गजस्याथ उष्ट्रस्य च यथाक्रमम्।<br>स्तम्भनं सर्षपेणापि पाटनं च कुशेन च॥ ११<br><br>मारणोच्चाटने चैव रोहीबीजेन सुव्रताः।<br>बन्धनं त्वहिपत्रेण सेनास्तम्भमतः परम्॥ १२<br><br>कुनट्या नियतं विद्यात्पूजयेत्परमेश्वरीम्।<br>घृतेन सर्वसिद्धिः स्यात्पयसा वा विशुद्ध्यते॥ १३<br><br>तिलेन रोगनाशश्च कमलेन धनं भवेत्।<br>कान्तिर्मधूकपुष्पेण सावित्र्या ह्यायुतत्रयम्॥ १४<br><br>जयादिप्रभृतीन् सर्वान् स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम्।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो विनियोगोऽतिविस्तृतः॥ १५<br><br>जपेद्वा केवलां विद्यां सम्पूज्य च विधानतः।<br>सर्वसिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ १६ | इसके बाद अग्निमें विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। इस प्रकार इस विद्याके द्वारा सभी कार्य सिद्ध करना चाहिये॥ २-७१/२॥<br><br>शत्रुको वशमें करनेकी इच्छावालेको जाती पुष्पोंसे तीस हजार आहुति देनी चाहिये। हे द्विजो! घृत तथा करवीर (कनेर)-के पुष्पके हवनसे आकर्षण-कृत्य करना चाहिये और विद्वेषणकर्मके लिये लांगलक पुष्पका हवन करना चाहिये। तैलके हवनसे उच्चाटन तथा मधुके हवनसे स्तम्भन बताया गया है। इसी प्रकार तिलके हवनसे मोहन तथा पशु-शोणितके हवनसे ताड़न बताया गया है। हे सुव्रतो! सरसोंके द्वारा हवनसे स्तम्भन, कुशके द्वारा हवनसे पाटन, रोहीके बीजके द्वारा हवनसे मारण-उच्चाटन, अहिपत्र (नागवल्लीपत्र)-के द्वारा बन्धन और कुनटी (मनःशिला)-के द्वारा हवनसे सेनास्तम्भन कृत्यकी सिद्धि जाननी चाहिये। इस प्रकार नियमपूर्वक परमेश्वरीका पूजन करना चाहिये। [अब सात्त्विक कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले हवन-द्रव्योंको बताया जाता है-] घृतके हवनसे सब प्रकारकी सिद्धि होती है और दुग्धके हवनसे साधक शुद्ध हो जाता है। तिलके होमसे रोगका नाश हो जाता है, कमलपुष्पके हवनसे धन प्राप्त होता है और महुएके पुष्पके हवनसे कान्ति प्राप्त होती है। प्रत्येक हवनमें तीस हजार सावित्री-मन्त्रका उच्चारण होना चाहिये। जया, अभ्यातान तथा राष्ट्रभृत् होम करके अन्तमें स्विष्टकृत् होम पूर्ववत् कहा गया है। [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अत्यन्त विस्तारवाले इस विनियोगका वर्णन कर दिया। अथवा [हवन न होनेकी स्थितिमें] केवल विधिपूर्वक वज्रेश्वरीविद्याका पूजन करके उसका जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला समस्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ८-१६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥

५३- मृत्युंजयहवन-विधान

अध्याय ५४] मृत्युहर त्रियम्बकमन्त्रका माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान ७५३


तिरपनवाँ अध्याय

मृत्युंजयहवन-विधान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>मृत्युञ्जयविधिं सूत ब्रह्मक्षत्रविशामपि।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ १<br><br>सूत उवाच<br>मृत्युञ्जयविधिं वक्ष्ये बहुना किं द्विजोत्तमाः।<br>रुद्राध्यायेन विधिना घृतेन नियुतं क्रमात्॥ २<br>सघृतेन तिलेनैव कमलेन प्रयत्नतः।<br>दूर्वया घृतगोक्षीरमिश्रया मधुना तथा॥ ३<br>चरुणा सघृतेनैव केवलं पयसापि वा।<br>जुहुयात्कालमृत्योर्वा प्रतीकारः प्रकीर्तितः॥ ४ऋषिगण बोले—हे सूतजी! ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंके कल्याणके लिये आप हमलोगोंको मृत्युंजयविधि बतानेकी कृपा कीजिये; हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं॥ १॥<br><br>सूतजी बोले—हे उत्तम द्विजो! मैं [आपलोगोंको] मृत्युंजय विधान बताऊँगा; बहुत कहनेसे क्या लाभ! रुद्राध्यायके मन्त्रोंद्वारा घृतसे एक लाख बार क्रमशः हवन करे अथवा घृतमिश्रित तिलसे, कमल पुष्पसे, गायके घी तथा दूधसे मिश्रित दूर्वासे, मधुसे, घृतयुक्त चरुसे अथवा केवल दुग्धसे ही प्रयत्नपूर्वक हवन करना चाहिये। इस विधानको कालमृत्यु अथवा महामृत्युका प्रतीकार कहा गया है॥ २–४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे मृत्युञ्जयविधिवर्णनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'मृत्युंजयविधिवर्णन' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥


चौवनवाँ अध्याय

मृत्युहर त्रियम्बकमन्त्रका माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>त्रियम्बकेण मन्त्रेण देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>पूजयेद्बाणलिङ्गे वा स्वयम्भूतेऽपि वा पुनः॥ १<br>आयुर्वेदविदैर्वापि यथावदनुपूर्वशः।<br>अष्टोत्तरसहस्रेण पुण्डरीकेण शङ्करम्॥ २<br>कमलेन सहस्रेण तथा नीलोत्पलेन वा।<br>सम्पूज्य पायसं दत्त्वा सघृतं चौदनं पुनः॥ ३<br>मुद्गान्नं मधुना युक्तं भक्ष्याणि सुरभीणि च।<br>अग्नौ होमश्च विपुलो यथावदनुपूर्वशः॥ ४<br>पूर्वोक्तैरपि पुष्पैश्च चरुणा च विशेषतः।<br>जपेद्वै नियुतं सम्यक् समाप्य च यथाक्रमम्॥ ५<br>ब्राह्मणानां सहस्रं च भोजयेद्वै सदक्षिणम्।<br>गवां सहस्रं दत्त्वा तु हिरण्यमपि दापयेत्॥ ६सूतजी बोले—बाणलिङ्गमें अथवा स्वयम्भूविङ्गमें त्रियम्बकमन्त्रके द्वारा देवाधिदेव त्रियम्बककी पूजा करनी चाहिये। आयुर्वेदके ज्ञाताओंको चाहिये कि पूर्वोक्त विधिसे एक हजार आठ श्वेत कमलोंसे अथवा एक हजार रक्तकमलोंसे अथवा एक हजार नील कमलोंसे शंकरजीका पूजन करके खीर, घृतयुक्त ओदन (भात), मधुमिश्रित मुद्गान्न तथा अन्य सुगन्धित भक्ष्य-पदार्थ अर्पण करके पूर्व अध्यायमें कथित घृत आदि द्रव्योंके क्रमसे, पूर्वोक्त पुष्पोंसे और विशेषकर चरुसे यथाविधि अग्निमें दस हजार हवन करना चाहिये और एक लाख जप करना चाहिये। सम्यक् प्रकारसे उचित क्रममें सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करके हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये; हजार गायें प्रदान करके स्वर्ण भी देना चाहिये॥ १–६॥

७५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग ---|---

श्लोकअर्थ
एतद्द्वः कथितं सर्वं सरहस्यं समासतः।<br>शिवेन देवदेवेन शर्वेणात्युग्रशूलिना॥ ७<br><br>कथितं मेरुशिखरे स्कन्दायामिततेजसे।<br>स्कन्देन देवदेवेन ब्रह्मपुत्राय धीमते॥ ८<br><br>साक्षात्सनत्कुमारेण सर्वलोकहितैषिणा।<br>पाराशर्याय कथितं पारम्पर्यक्रमागतम्॥ ९इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सम्पूर्ण बातें संक्षेपमें आप लोगोंको बता दीं। अत्यन्त उग्र शूल धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् शिवने मेरु शिखरपर अमित तेजवाले कार्तिकेयजीको इसे बताया था। तत्पश्चात् देवोंके देव उन कार्तिकेयने बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारको बताया और पुनः उन लोकहितैषी सनत्कुमारने इसे पराशरपुत्र व्यासको बताया; इस प्रकार परम्पराक्रमसे यह प्रकाशमें आया॥ ७-९॥
शुके गते परंधाम दृष्ट्वा रुद्रं त्रियम्बकम्।<br>गतशोको महाभागो व्यासः पर ऋषिः प्रभुः॥ १०<br><br>स्कन्दस्य सम्भवं श्रुत्वा स्थिताय च महात्मने।<br>त्रियम्बकस्य माहात्म्यं मन्त्रस्य च विशेषतः॥ ११<br><br>कथितं बहुधा तस्मै कृष्णद्वैपायनाय वै।<br>तत्सर्वं कथयिष्यामि प्रसादादेव तस्य वै॥ १२त्रियम्बक रुद्रका दर्शन करके शुकदेवजीके मोक्षपद प्राप्त कर लेनेके अनन्तर महाभाग महर्षि भगवान् व्यासजी शोकको प्राप्त हुए। उस समय स्कन्दके प्रादुर्भावको सुनकर वहाँपर स्थित महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको सनत्कुमारने त्रियम्बकमन्त्रके माहात्म्यको बहुत प्रकारसे बताया था। मैं उन्हींकी कृपासे आप लोगोंको वह सब बताऊँगा॥ १०-१२॥
देवं सम्पूज्य विधिना जपेन्मन्त्रं त्रियम्बकम्।<br>मुच्यते सर्वपापैश्च सप्तजन्मकृतैरपि॥ १३<br><br>सङ्ग्रामे विजयं लब्ध्वा सौभाग्यमतुलं भवेत्।<br>लक्षहोमेन राज्यार्थी राज्यं लब्ध्वा सुखी भवेत्॥ १४<br><br>पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति नियुतेन न संशयः।<br>धनार्थी प्रयुतेनैव जपेदेव न संशयः॥ १५<br><br>धनधान्यादिभिः सर्वैः सम्पूर्णः सर्वमङ्गलैः।<br>क्रीडते पुत्रपौत्रैश्च मृतः स्वर्गे प्रजायते॥ १६<br><br>नानेन सदृशो मन्त्रो लोके वेदे च सुव्रताः।<br>तस्मात्त्रियम्बकं देवं तेन नित्यं प्रपूजयेत्॥ १७महादेवकी सम्यक् पूजा करके विधिपूर्वक त्रियम्बकमन्त्रका जप करना चाहिये। इसके प्रभावसे मनुष्य सात जन्मोंके किये गये सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; संग्राममें विजय प्राप्त करके वह अतुलनीय सौभाग्य प्राप्त करता है। राज्यकी कामना करनेवाला व्यक्ति एक लाख हवनसे राज्य प्राप्त करके सुखी हो जाता है। पुत्रकी इच्छावाला एक लाख होमसे पुत्र प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। धन चाहनेवालेको एक करोड़ त्रियम्बक-मन्त्रका जप करना चाहिये और देव त्रियम्बककी सदा पूजा करनी चाहिये; उससे वह मनुष्य सभी प्रकारके मंगलोंसहित पुत्र-पौत्रोंके साथ सुखमय जीवन व्यतीत करता है और मृत्युके अनन्तर स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रतो! इस त्रियम्बकमन्त्रके समान इस लोकमें तथा वेदमें कोई भी मन्त्र नहीं है। अतः इस मन्त्रसे भगवान् त्रियम्बककी नित्य पूजा करनी चाहिये—ऐसा करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका आठ गुना फल होता है॥ १३-१७ १/२॥
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं भवेत्।<br>त्रयाणामपि लोकानां गुणानामपि यः प्रभुः॥ १८[त्रियम्बक शब्दकी व्याख्या इस प्रकार है—]

अध्याय ५४ ] मृत्युहर त्र्यम्बकमन्त्रका माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान ७५५


संस्कृत श्लोकहिन्दी व्याख्या
वेदानामपि देवानां ब्रह्मक्षत्रविशामपि।<br>अकारोकारमकाराणां मात्राणामपि वाचकः ॥ १९<br><br>तथा सोमस्य सूर्यस्य वह्नेरग्नित्रयस्य च।<br>अम्बा उमा महादेवो ह्यम्बकस्तु त्रियम्बकः ॥ २०यह तीनों लोकों, तीनों गुणों, तीनों वेदों, तीनों देवताओं, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य—इन तीनों वर्णोंका स्वामी है। यह अकार, उकार और मकार—इन तीन मात्राओंका वाचक है। चन्द्र, सूर्य तथा वह्नि—इन तीनों अग्नियोंकी अम्बा (माता) उमा हैं। महादेव इन सबके अम्बक (पिता) हैं, अतः यह त्रियम्बक मन्त्र है॥ १८–२०॥
सुपुष्पितस्य वृक्षस्य यथा गन्धः सुशोभनः।<br>वाति दूरातथा तस्य गन्धः शम्भोर्महात्मनः ॥ २१<br><br>तस्मात्सुगन्धो भगवान् गन्धारयति शङ्करः।<br>गान्धारश्च महादेवो देवानांमपि लीलया ॥ २२<br><br>सुगन्धस्तस्य लोकेऽस्मिन् वायुर्वाति नभस्तले।<br>तस्मात्सुगन्धिस्तं देवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३जिस प्रकार पुष्पित वृक्षकी अत्यन्त सुन्दर गन्ध बहुत दूरसे ही फैलती है, उसी प्रकार उन परमात्मा शिवकी गन्ध जगत्में सर्वत्र व्याप्त रहती है, अतः भगवान् शिव सुगन्ध हैं। वे महादेव शंकर अपनी लीलासे देवताओंको भी सुगन्धित करते हैं। जब वायु आकाशमण्डलमें प्रवाहित होती है, तब उन शिवकी सुगन्ध जगत्में फैलती है। अतः सुगन्धिमय होनेसे उन प्रभुको ‘सुगन्धि’ तथा ‘पुष्टिवर्धन’ कहा जाता है॥ २१–२३॥
यस्य रेतः पुरा शाम्भोर्हरेर्योनौ प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य वीर्यादभूदण्डं हिरण्मयमजोद्भवम् ॥ २४<br><br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ भूर्भुवःस्वर्महस्तपः।<br>सत्यलोकमतिक्रम्य पुष्टिर्वीर्यस्य तस्य वै ॥ २५<br><br>पञ्चभूतान्यहङ्कारो बुद्धिः प्रकृतिरेव च।<br>पुष्टिर्बीजस्य तस्यैव तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः ॥ २६पूर्वकालमें जिन शम्भुका तेज (वीर्य) भगवान् विष्णुकी योनिमें स्थापित हुआ, उनके उस तेजसे सुवर्णमय अण्ड निर्मित हुआ, जो ब्रह्माकी उत्पत्तिका कारण बना। उनके वीर्यका पोषण चन्द्रमा, सूर्य, सभी नक्षत्र, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, तपःलोक और सत्यलोकसे भी आगे बढ़कर हुआ; उन्हींके बीजसे पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति—ये सब पुष्टिको प्राप्त हुए। अतः वे शिव पुष्टिवर्धन संज्ञावाले हैं॥ २४–२६॥
तं पुष्टिवर्धनं देवं घृतेन पयसा तथा।<br>मधुना यवगोधूममाषबिल्वफलेन च ॥ २७<br><br>कुमुदार्कशमीपत्रगौरसर्षपशालिभिः ।<br>हुत्वा लिङ्गे यथान्यायं भक्त्या देवं यजामहे ॥ २८<br><br>ऋतेनानेन मां पाशाद्बन्धनात्कर्मयोगतः।<br>मृत्योश्च बन्धनाच्चैव मुक्षीय भव तेजसा ॥ २९<br><br>उर्वारुकाणां पक्वानां यथा कालादभूत्पुनः।<br>तथैव कालः सम्प्राप्तो मनुना तेन यत्नतः ॥ ३०घृत, दुग्ध, मधु, जौ, गेहूँ, उड़द, बेलका फल, कुमुद, अर्क, शमीपत्र, श्वेत सरसों तथा शालिधानसे विधिपूर्वक हवन करके हम शिवलिङ्गमें उन पुष्टिवर्धन भगवान् शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। हे भव! इस पूजनविधिके प्रभावसे हम कर्मजन्य पाशबन्धनसे और मृत्युबन्धनसे मुक्त हो जायें। जैसे यथासमय पके हुए ककड़ी-फल (फूट)-की उसके वृक्षसे मुक्ति हो जाती है, वैसे ही कालके उपस्थित होनेपर उस मन्त्रके प्रभावसे काल-बन्धनसे हमारी मुक्ति हो जाय॥ २७–३०॥

५५- योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपतयोगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य

७५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
एवं मन्त्रविधिं ज्ञात्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत्।<br>तस्य पाशक्षयोऽतीव योगिनो मृत्युनिग्रहः॥ ३१<br><br>त्रियम्बकसमो नास्ति देवो वा घृणयान्वितः।<br>प्रसादशीलः प्रीतश्च तथा मन्त्रोऽपि सुव्रतः॥ ३२<br><br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य त्रियम्बकमुमापतिम्।<br>त्रियम्बकेण मन्त्रेण पूजयेत्सुसमाहितः॥ ३३<br><br>सर्वावस्थां गतो वापि मुक्तोऽयं सर्वपातकैः।<br>शिवध्यानान्न सन्देहो यथा रुद्रस्तथा स्वयम्॥ ३४<br><br>हत्वा भित्त्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>शिवमेकं सकृत्स्मृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३५इस प्रकार मन्त्रकी विधिको जानकर शिवलिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उस योगीके पाश (बन्धन)-का पूर्णरूपसे विनाश और उसके मृत्युका निग्रह हो जाता है। हे सुव्रतो! त्रियम्बकके समान कोई अन्य देवता दयालु नहीं हैं; वे सरलतासे प्रसन्न होनेवाले तथा प्रेममय हैं, उनका मन्त्र भी वैसा ही है। अतः सब कुछ छोड़कर दत्तचित्त होकर त्रियम्बकमन्त्रसे उमापति त्रियम्बककी पूजा करनी चाहिये। किसी भी दशाको प्राप्त मनुष्य शिवके ध्यानसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और जैसे रुद्र हैं; वैसे ही स्वयं हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। प्राणियोंका छेदन-भेदन करके तथा अन्यायपूर्वक वस्तुओंका भोग करके भी मनुष्य एकमात्र शिवका केवल एक बार ध्यान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३१—३५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५४॥


पचपनवाँ अध्याय

योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपत-योगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य

ऋषय ऊचुः<br>कथं त्रियम्बको देवो देवदेवो वृषध्वजः।<br>ध्येयः सर्वार्थसिद्धयर्थं योगमार्गेण सुव्रत॥ १<br>पूर्वमेवापि निखिलं श्रुतं श्रुतिसमं पुनः।<br>विस्तरेण च तत्सर्वं सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि॥ २**ऋषिगण बोले—**हे सुव्रत! सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा तीन नेत्रोंवाले, देवोंके भी देव तथा वृषकी ध्वजावाले भगवान् शिवका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये? पूर्वमें भी हम आपसे वेदतुल्य जो सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुन चुके हैं, वह सब संक्षेपमें बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२॥
सूत उवाच<br>एवं पैतामहेनैव नन्दी दिनकरप्रभः।<br>मेरुपृष्ठे पुरा पृष्टो मुनिसङ्घैः समावृतः॥ ३<br>सोऽपि तस्मै कुमाराय ब्रह्मपुत्राय सुव्रतः।<br>मिथः प्रोवाच भगवान् प्रणताय समाहितः॥ ४**सूतजी बोले—**हे सुव्रतो! इसी प्रकार पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारने सूर्यके समान प्रभाववाले तथा मुनियोंसे घिरे हुए नन्दीसे पूछा था। तब भगवान् नन्दी भी उन विनम्र ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारसे समाहितचित्त होकर कहने लगे॥ ३-४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>एवं पुरा महादेवो भगवान्नीललोहितः।<br>गिरिपुत्र्याम्बया देव्या भगवत्यैकशय्यया॥ ५<br>पृष्टः कैलासशिखरे हृष्टपुष्टतनूरुहः।**नन्दिकेश्वर बोले—**यही बात पूर्व समयमें कैलास शिखरपर एक ही शय्यापर साथ-साथ विराजमान हिमालयपुत्री भगवती देवी पार्वती ने पुलकित रोमोंवाले

अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि ७५७

संस्कृतहिन्दी
भगवान् नीललोहित महादेवसे पूछा था॥ ५ १/२ ॥
श्रीदेव्युवाच<br>योगः कतिविधः प्रोक्तस्तत्कथं चैव कीदृशम् ॥ ६<br>ज्ञानं च मोक्षदं दिव्यं मुच्यन्ते येन जन्तवः ।श्रीदेवी बोलीं— योग कितने प्रकारका कहा गया है, उसका स्वरूप कैसा है तथा वह किस प्रकारका है ? वह दिव्य तथा मोक्षदायक ज्ञान कैसा है, जिसके द्वारा प्राणी [बन्धनसे] मुक्त हो जाते हैं?॥ ६ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>प्रथमो मन्त्रयोगश्च स्पर्शयोगो द्वितीयकः ॥ ७<br>भावयोगस्तृतीयः स्यादभावश्च चतुर्थकः ।<br>सर्वोत्तमो महायोगः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥ ८श्रीभगवान् बोले— पहला मन्त्रयोग है, दूसरा स्पर्शयोग है, तीसरा भावयोग है और चौथा अभावयोग है; पाँचवाँ महायोग है, जो सर्वोत्तम कहा गया है॥ ७-८॥
ध्यानयुक्तो जपाभ्यासो मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः ।<br>नाडीशुद्ध्यधिको यस्तु रेचकादिक्रमान्वितः ॥ ९<br>समस्तव्यस्तयोगेन जयो वायोः प्रकीर्तितः ।<br>बलस्थिरक्रियायुक्तो धारणाद्यैश्च शोभनैः ॥ १०<br>धारणात्रयसन्दीप्तो भेदत्रयविशोधकः ।<br>कुम्भकावस्थितोऽभ्यासः स्पर्शयोगः प्रकीर्तितः ॥ ११<br>मन्त्रस्पर्शविनिर्मुक्तो महादेवं समाश्रितः ।<br>बहिरन्तर्विभागस्थस्फुरत्संहरणात्मकः ॥ १२<br>भावयोगः समाख्यातश्चित्तशुद्धिप्रदायकः ।<br>विलीनावयवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १३<br>शून्यं सर्वं निराभासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते ।<br>अभावयोगः सम्प्रोक्तश्चित्तनिर्वाणकारकः ॥ १४<br>नीरूपः केवलः शुद्धः स्वच्छन्दं च सुशोभनः ।<br>अनिर्देश्यः सदालोकः स्वयंवेद्यः समन्ततः ॥ १५<br>स्वभावो भासते यत्र महायोगः प्रकीर्तितः ।<br>नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वचित्तसमुत्थितः ॥ १६<br>निर्मलः केवलो ह्यात्मा महायोग इति स्मृतः ।ध्यानसे युक्त जपका अभ्यास मन्त्रयोग कहा गया है। रेचक आदि प्राणायामके द्वारा नाड़ियोंका शुद्धीकरण समस्त-व्यस्त-योगसे प्राणका विजय कहा गया है। वाजीकरण क्रियासे युक्त [वीर्यस्तम्भनरूप] शोभन धारणादि अंगोंसे सम्पन्न, सात्त्विक आदि त्रिविध धारणासे प्रकाशित, विश्व-प्राज्ञ-तैजसरूप भेदत्रयका शोधक, कुम्भकमें स्थित ध्यानाभ्यास ही स्पर्शयोग कहा गया है। मन्त्र तथा स्पर्शयोगसे पृथक्, महादेवपर अवलम्बित, बाहर तथा भीतरकी दशाके स्फुरण तथा संहरणसे युक्त और चित्तको शुद्धि प्रदान करनेवाला योग भावयोग कहा गया है। चराचर सम्पूर्ण जगत् जिसमें विलीन है, जिसमें सम्पूर्ण स्वरूपका शून्य तथा आभासहीन रूपमें चिन्तन किया जाता है, चित्तका निर्वाण करनेवाले उस योगको अभावयोग कहा गया है। जो रूपहीन, अद्वितीय, निर्मल, स्वतन्त्र, अत्यन्त सुन्दर, अनिर्देश्य, सर्वदा प्रकाशमान, हर प्रकारसे स्वयं जाननेयोग्य है तथा जिसमें अपनी आत्माकी सत्ता भासित होती है, उसे महायोग कहा गया है। आत्मा सदा प्रकाशित है, स्वयं ज्योतिर्मय है, सम्पूर्ण चित्तोंसे ऊपर उठा हुआ है, विशुद्ध है तथा अद्वितीय है—यह अनुभव होना महायोग कहा गया है॥ ९-१६ १/२ ॥
अणिमादिप्रदाः सर्वे सर्वे ज्ञानस्य दायकाः ॥ १७<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यमेषु योगेष्वनुक्रमात् ।<br>अहं सङ्गविनिर्मुक्तो महाकाशोपमः परः ॥ १८ये सभी योग अणिमा आदि सिद्धियोंको देनेवाले तथा ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। इन योगोंमें क्रमशः एकके बाद दूसरेमें पूर्वकी अपेक्षा वैशिष्ट्य है। यह महायोग अहंके संगसे रहित, महान् आकाशके तुल्य,
७५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सर्वावरणनिर्मुक्तो ह्यचिन्त्यः स्वरसेन तु।<br>ज्ञेयमेतत्समाख्यातमग्राह्यमपि दैवतैः॥ १९<br><br>प्रविलीनो महान् सम्यक् स्वयंवैद्यः स्वसाक्षिकः।<br>चकास्त्यानन्दवपुषा तेन ज्ञेयमिदं मतम्॥ २०<br><br>परीक्षिताय शिष्याय ब्राह्मणायहिताग्नये।<br>धार्मिकायाकृतघ्नाय दातव्यं क्रमपूर्वकम्॥ २१<br><br>गुरुदैवतभक्ताय अन्यथा नैव दापयेत्।<br>निन्दितो व्याधितोऽल्पायुस्तथा चैव प्रजायते॥ २२<br><br>दातुरप्येवमनघे तस्माज्ज्ञात्वैव दापयेत्।<br>सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो मद्भक्तो मत्परायणः॥ २३<br><br>साधको ज्ञानसंयुक्तः श्रौतस्मार्तविशारदः।<br>गुरुभक्तश्च पुण्यात्मा योग्यो योगरतः सदा॥ २४ | सर्वोत्कृष्ट, समस्त आवरणोंसे मुक्त और यथार्थतः अचिन्त्य है। उस ज्ञानको देवताओंके द्वारा भी अग्राह्य कहा गया है। यह परमात्मामें विलीन कर देनेवाला, महान्, स्वयंवैद्य तथा स्वयं अपना साक्षी है और आनन्दपूर्ण शरीरसे प्रकाशित होनेवाला है। यह अहंकाररहित पुरुषके द्वारा ही जाननेयोग्य है। [मेरे द्वारा उपदिष्ट] इस मत (ज्ञान)-को परीक्षा किये गये शिष्य, अग्निहोत्री ब्राह्मण, धर्मपरायण, कृतज्ञ और गुरु-देवताके प्रति भक्ति रखनेवाले व्यक्तिको ही प्रदान करना चाहिये; अन्यको कभी नहीं देना चाहिये। अनधिकारी व्यक्ति निन्दित, रोगसे पीड़ित तथा अल्प आयुवाला होता है और इसे प्रदान करनेवालेकी भी यही दशा होती है; हे अनघे! इसलिये पूर्णरूपसे परीक्षा करके ही इसे देना चाहिये। इसे प्राप्त करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण आसक्तियोंसे रहित, मेरा भक्त, मेरे प्रति परायण, साधक, ज्ञानवान्, श्रुति-स्मृतिसम्बन्धी कर्मोंका ज्ञान रखनेवाला, गुरुमें भक्ति रखनेवाला, पुण्यात्मा, योग्यतासम्पन्न तथा सर्वदा योगमें निरत रहनेवाला होता है॥ १७—२४॥ | | एवं देवि समाख्यातो योगमार्गः सनातनः।<br>सर्ववेदागमाम्भोजमकरन्दः सुमध्यमे॥ २५<br><br>पीत्वा योगामृतं योगी मुच्यते ब्रह्मवित्तमः।<br>एवं पाशुपतं योगं योगैश्वर्यमनुत्तमम्॥ २६<br><br>अत्याश्रममिदं ज्ञेयं मुक्तये केन लभ्यते।<br>तस्मादिष्टैः समाचारैः शिवार्चनरतैः प्रिये॥ २७<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् देवीमनुज्ञाप्य वृषध्वजः।<br>शङ्कुकर्णं समासाद्य युयोजात्मानमात्मनि॥ २८ | हे देवि! हे सुमध्यमे! इस प्रकार यह योगमार्ग सनातन और समस्त वेद तथा आगमरूपी कमलका मकरन्द कहा गया है। इस योगरूपी अमृतका पान करके ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ योगी [भवबन्धनसे] मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह पाशुपतयोग समस्त योगोंका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला तथा सर्वोत्कृष्ट है। इसे ब्रह्मचर्य आदि किसी आश्रमकी अपेक्षा न रखनेवाला जानना चाहिये। अतः हे प्रिये! यह सभी प्राणियोंके हितकी कामना करनेवाले शिवपूजापरायण लोगोंको किसी अनिर्वचनीय सौभाग्यसे ही मुक्तिके लिये प्राप्त होता है। ऐसा कहनेके पश्चात् वृषध्वज भगवान् शिव देवी पार्वतीसे आज्ञा लेकर और अपने गण शंकुकर्णको द्वारपर नियुक्त करके स्वयं समाधिमें लीन हो गये॥ २५—२८॥ | | शैलादिरुवाच<br>तस्मात्त्वमपि योगीन्द्र योगाभ्यासरतो भव।<br>स्वयम्भुव परा मूर्तिर्नूनं ब्रह्ममयी वरा॥ २९ | **शैलादि बोले—**अतएव हे योगीन्द्र! आप भी योगाभ्यासमें संलग्न हो जाइये। स्वयंभू शिवकी परामूर्ति |

अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि [ ७५९


तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षार्थी पुरुषोत्तमः।<br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं योगे पाशुपते रतः॥ ३०<br>ध्येया यथाक्रमेणैव वैष्णवी च ततः परा।<br>माहेश्वरी परा पश्चात्सैव ध्येया यथाक्रमम्॥ ३१<br>योगेश्वरस्य या निष्ठा सैषा संहृत्य वर्णिता॥ ३२निश्चितरूपसे श्रेष्ठ तथा ब्रह्ममयी है। अतः मोक्षकी कामना करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पूर्ण प्रयत्नसे भस्म-स्नान करके पाशुपतयोगमें नित्य संलग्न रहना चाहिये। सर्वप्रथम ब्राह्मी शक्तिका ध्यान करना चाहिये, इसके बाद परा वैष्णवी शक्तिका और तत्पश्चात् परा माहेश्वरी शक्तिका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार योगेश्वर शिवकी जो पराकाष्ठा है, उसका मैंने संक्षेपमें वर्णन कर दिया॥ २९—३२॥
सूत उवाच<br>एवं शिलादपुत्रेण नन्दिना कुलनन्दिना।<br>योगः पाशुपतः प्रोक्तो भस्मनिष्ठेन धीमता॥ ३३<br>सनत्कुमारो भगवान् व्यासायामिततेजसे।<br>तस्मादहमपि श्रुत्वा नियोगात्सत्रिणामपि॥ ३४<br>कृतकृत्योऽस्मि विप्रेभ्यो नमो यज्ञेभ्य एव च।<br>नमः शिवाय शान्ताय व्यासाय मुनये नमः॥ ३५सूतजी बोले—इस प्रकार अपने कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले भस्मधारी शिलादपुत्र बुद्धिमान् नन्दीने सनत्कुमारसे पाशुपतयोगका वर्णन किया। भगवान् सनत्कुमारने अमित तेजवाले व्यासजीको इसे बताया और उनसे सुनकर उनके आदेशसे मैंने यज्ञ-सत्रमें उपस्थित मुनियोंको बताया। मैं कृतकृत्य हूँ। विप्रोंको नमस्कार है, यज्ञोंको नमस्कार है, शान्त शिवको नमस्कार है और व्यासमुनिको नमस्कार है॥ ३३—३५॥
ग्रन्थैकादशसाहस्रं पुराणं लैङ्गमुत्तमम्।<br>अष्टोत्तरशताध्यायमादिमांशमतः परम्॥ ३६<br>षट्चत्वारिंशदध्यायं* धर्मकामार्थमोक्षदम्।<br>अथ ते मुनयः सर्वे नैमिषेयाः समाहिताः॥ ३७<br>प्रणेमुर्देवमीशानं प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>शाखां पौराणिकामेवं कृत्वैकादशिकां प्रभुः॥ ३८<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवानिदं वचनमब्रवीत्।<br>लैङ्गमाद्यन्तमखिलं यः पठेच्छृणुयादपि॥ ३९<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम्।<br>तपसा चैव यज्ञेन दानेनाध्ययनेन च॥ ४०<br>या गतिस्तस्य विपुला शास्त्रविद्या च वैदिकी।<br>कर्मणा चापि मिश्रेण केवलं विद्ययापि वा॥ ४१<br>निवृत्तिश्चास्य विप्रस्य भवेद्भक्तिश्च शाश्वती।<br>मयि नारायणे देवे श्रद्धा चास्तु महात्मनः॥ ४२यह उत्तम श्रीलिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंमें निबद्ध है। इसके प्रथम भागमें एक सौ आठ अध्याय हैं और उत्तर भागमें पचपन अध्याय हैं। यह पुराण धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तब प्रसन्नताके कारण रोमांचित नैमिषारण्यवासी उन सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर भगवान् ईशान (शिव)-को प्रणाम किया। पुराणोंकी ग्यारहवीं शाखाकी रचना करके स्वयंभू तथा प्रभुतासम्पन्न भगवान् ब्रह्माने यह वचन कहा था—‘जो मनुष्य इस सम्पूर्ण श्रीलिङ्गपुराणको आदिसे अन्ततक पढ़ता है, सुनता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है। तपस्यासे, यज्ञसे, दानसे, वेदाध्ययनसे, उत्तम कर्मसे, कर्म तथा ज्ञानके मिश्रित प्रभावसे अथवा केवल ज्ञानसे उसकी जो गति होती है, वह इस पुराणके पठन-श्रवणसे हो जाती है; उसे विपुल शास्त्रविद्या तथा वैदिकी विद्या प्राप्त हो जाती है; उस विप्रको शाश्वत शिवभक्ति मिल जाती है; उसका मोक्ष हो जाता है और उस महात्माकी श्रद्धा

* अत्र षट् च नव च चत्वारिंशच्च षट्चत्वारिंशदिति मध्यमपदलोपिसमासो ज्ञेयः।

७६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वंशस्य चाक्षया विद्या चाप्रमादश्च सर्वतः।<br>इत्याज्ञा ब्रह्मणस्तस्मात्तस्य सर्वं महात्मनः ॥ ४३<br><br>ऋषय प्रोचुः<br><br>ऋषेः सूतस्य चास्माकमेतेषामपि चास्य च।<br>नारदस्य च या सिद्धिस्तीर्थयात्रारतस्य च ॥ ४४<br><br>प्रीतिश्च विपुला यस्मादस्माकं रोमहर्षण ॥ ४५<br><br>सा सदास्तु विरूपाक्षप्रसादात्तु समन्ततः।<br>एवमुक्तेषु विप्रेषु नारदो भगवानपि ॥ ४६<br><br>कराभ्यां सुशुभाग्राभ्यां सूतं पस्पर्शवांस्त्वचि।<br>स्वस्त्यस्तु सूत भद्रं ते महादेवे वृषध्वजे ॥ ४७<br><br>श्रद्धा तवास्तु चास्माकं नमस्तस्मै शिवाय च ॥ ४८ | मुझमें, नारायणमें तथा शिवमें हो जाती है। उसके वंशमें अक्षय विद्या सुलभ रहती है और हर प्रकारसे अप्रमाद विद्यमान रहता है।' यह ब्रह्माजीकी आज्ञा है, अतः यह सब उन्हीं महात्माकी कृपासे हुआ है॥ ३६—४३॥<br><br>ऋषिगण बोले— हे रोमहर्षण! आप ऋषि सूतको, हम मुनियोंको, तीर्थयात्रामें रत इन नारदको, जो महान् सिद्धि तथा भगवत्प्रीति प्राप्त हुई; वह विरूपाक्ष भगवान् शिवकी कृपासे चारों ओर विद्यमान रहे। विप्रोंके ऐसा कहनेपर भगवान् नारदने भी अपने पवित्र हाथोंके अग्रभागसे सूतजीके शरीरका स्पर्श किया और इस प्रकार कहा—हे सूतजी! आपका मंगल हो, आपका कल्याण हो, वृषध्वज महादेवमें आपकी तथा हमलोगोंकी श्रद्धा रहे; उन भगवान् शिवको नमस्कार है—‘नमस्तस्मै शिवाय च’॥ ४४—४८॥ |

इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतयोगमार्गवर्णने लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें पाशुपतयोगमार्गवर्णनके प्रसंगमें 'लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५ ॥

॥ सम्पूर्णमिदं श्रीलिङ्गमहापुराणम् ॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराण पूर्ण हुआ ॥

॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः॥

श्रीलिङ्गमहापुराण-परिशिष्ट

[ वाराणसी-माहात्म्य ]

[ धर्मशास्त्रीय निबन्धग्रन्थोंकी परम्परामें पं० लक्ष्मीधरभट्ट-विरचित 'कृत्यकल्पतरु' अत्यन्त प्राचीन, बहुश्रुत तथा अत्यधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। इसके प्रणेता पं० लक्ष्मीधर कान्यकुब्जनरेश गोविन्दचन्द्रके महामन्त्री थे। पं० लक्ष्मीधरका समय १२वीं शताब्दी है। परवर्ती निबन्धकारोंने कृत्यकल्पतरुके वचनोंको अपने ग्रन्थोंमें सादर उपन्यस्त किया है। चतुर्वर्गचिन्तामणि-जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थके प्रणेता 'हेमाद्रि' तो इस ग्रन्थ तथा पं० लक्ष्मीधरके वैदुष्यसे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इन्हें 'भगवान्' शब्दसे सम्बोधित किया है।

'कृत्यकल्पतरु' धर्मशास्त्रीय कृत्योंके संग्रहका एक विशाल ग्रन्थ है। यह ब्रह्मचारिकाण्ड, गृहस्थकाण्ड, श्राद्धकाण्ड, दानकाण्ड, शुद्धिकाण्ड, व्यवहारकाण्ड, शान्तिकाण्ड, आचारकाण्ड तथा तीर्थविवेचनकाण्ड आदि कई काण्डोंमें विभक्त है। तत्तत् काण्डोंमें स्मृतियों तथा पुराणोंमें आये हुए धर्मशास्त्रीय विषयों जैसे—वर्णाश्रमधर्म, श्राद्ध, दान, प्रायश्चित्त, शान्ति, सदाचार तथा तीर्थविवेचन आदिका एक स्थानपर संग्रह हुआ है, इससे यह सौविध्य प्राप्त होता है कि एक ही स्थानपर विभिन्न स्मृतियों तथा पुराणादिमें उपन्यस्त तत्तद् विषयोंका संग्रह देखनेको मिल जाता है।

कृत्यकल्पतरुका तीर्थविवेचनकाण्ड प्रमुख तीर्थोंके माहात्म्यका महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इसमें मुख्यरूपसे वाराणसी, प्रयाग, गंगा, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, मथुरा, उज्जयिनी, बदरिकाश्रम, द्वारका, केदार तथा नैमिषारण्य आदि तीर्थोंके माहात्म्य तथा तीर्थयात्रा आदिकी विधि विस्तारसे दी गयी है। इसमें अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका तथा यहाँके गुहायतनों, लिङ्गों, वापी, कुण्डों तथा हृदोंका जो वर्णन दिया गया है, वह विविध पुराणों आदिसे संगृहीत है। विशेष बात यह है कि इस ग्रन्थमें लिङ्गपुराणके नामसे सोलह अध्यायोंमें लगभग दो हजार श्लोकोंमें वाराणसीका माहात्म्य उपलब्ध है, किंतु यह सामग्री वर्तमानमें उपलब्ध लिङ्गपुराणके संस्करणोंमें प्राप्त नहीं है। वर्तमानमें जो लिङ्गपुराण उपलब्ध होता है, वह पूर्वभाग तथा उत्तरभाग नामसे दो खण्डोंमें विभक्त है। इसके पूर्वभागके ९२वें अध्यायमें १९० श्लोकोंमें वाराणसी तथा यहाँके तीर्थोंका जो माहात्म्य आया है, वह पूर्वोक्त कृत्यकल्पतरुके संग्रहसे भिन्न है।

कृत्यकल्पतरु १२वीं शताब्दीका अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है। उस समय लिङ्गपुराणका जो संस्करण उपलब्ध था, उसमेंसे ही ग्रन्थकारने सामग्री संगृहीत की होगी। लिङ्गपुराणकी श्लोकसंख्या स्वयं लिङ्गपुराणने तथा नारदादि पुराणोंने ग्यारह हजार बतायी है, परंतु वर्तमानमें लगभग आठ हजारके आस-पास श्लोक मिलते हैं। साथ ही लिङ्गपुराणके नामसे अरुणाचलमाहात्म्य, पंचाक्षरमाहात्म्य, रामसहस्रनाम तथा रुद्राक्षमाहात्म्य आदि प्रकरणोंका भी उल्लेख प्राप्त होता है, किंतु ये प्रकरण वर्तमान संस्करणोंमें अनुपलब्ध हैं। कालातिरेकसे वर्तमानमें पुराणोंके संस्करणोंमें कुछ परिवर्तन आ गया है। कई माहात्म्य तथा प्रकरण आदि ऐसे हैं, जो उन-उन पुराणोंके नामसे प्राप्त तो होते हैं, किंतु वर्तमानमें वे उस पुराणमें उपलब्ध नहीं होते। उदाहरणके लिये प्रसिद्ध सत्यनारायणकथाकी पुष्पिकामें 'इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे' यह मिलता है, किंतु यह कथा वर्तमानमें प्राप्त रेवाखण्डमें प्राप्त नहीं होती। प्रसिद्ध माघमाहात्म्य वायुपुराणके नामसे मिलता है, किंतु वायुपुराणमें नहीं मिलता। ऐसे ही अध्यात्मरामायणको ब्रह्माण्डपुराणका अंश माना जाता है, किंतु वर्तमान ब्रह्माण्डपुराणके संस्करणमें वह प्राप्त नहीं होता। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी समयमें पुराणादिका जो प्राचीन स्वरूप था, उसमें वह सब गुम्फित था। यही बात लिङ्गपुराणके वाराणसी-माहात्म्यके विषयमें भी है।

इस कृत्यकल्पतरुमें उद्धृत वाराणसी-माहात्म्य अत्यन्त महत्त्वका है, इसके अध्ययनसे प्राचीन समयके वाराणसीके लिङ्गायतननों एवं तीर्थोंके वास्तविक स्वरूपके विषयमें महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। काशीखण्ड आदिमें जो वाराणसीके विषयमें सामग्री उपलब्ध होती है, उससे भी विशिष्ट सामग्री इस प्राचीन लिङ्गमहापुराणमें

१- अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन

७६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

मिलती है। अतः यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। वहाँ वाराणसी-माहात्म्य-सम्बन्धी सामग्री कहीं स्फुट रूपमें तथा कहीं अध्यायोंमें उपनिबद्ध है, किंतु अध्यायोंमें श्लोकसंख्याका अंकन नहीं है। भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीके प्रधान संवादके रूपमें उपलब्ध वह सामग्री तीसरे अध्यायसे अठारहवें अध्यायतक वहाँ दी गयी है, किंतु सुविधाकी दृष्टिसे तीसरे अध्यायको प्रथम अध्याय मानकर सम्पूर्ण सामग्री जिस रूपमें तथा जिस क्रममें कृत्यकल्पतरुमें उपलब्ध है, उसी रूपमें तथा उसी क्रममें श्लोक-संख्या अंकितकर मूल श्लोकोंसहित उसका हिन्दीभावानुवाद यहाँ दिया जा रहा है। इसे पढ़कर भगवद्भक्तों तथा श्रद्धालुजनोंमें भगवान् साम्बसदाशिवके प्रति विशेष श्रद्धा जाग्रत् होगी तथा आशा है कि सभी पाठक महानुभाव इससे लाभ उठायेंगे— सम्पादक ]

पहला अध्याय

अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनका वर्णन

ईश्वर उवाचश्लोकार्थ
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि उपायज्ञानसाधनम्।<br>यानि तीर्थानि चोक्तानि व्योमतन्त्रे पुरा मया॥ १<br>तेषामप्यधिकं तीर्थमविमुक्तं महामुने।<br>सर्वतीर्थानि च मया तस्मिन् स्थाने प्रतिष्ठिताः॥ २ईश्वर बोले—हे महामुने! अब मैं आपको ज्ञानप्राप्तिका अन्य साधन बताऊँगा। मैंने पूर्वमें व्योमतन्त्रमें जिन तीर्थोंका वर्णन किया था, उन सबसे बढ़कर अविमुक्त तीर्थ है। मैंने समस्त तीर्थोंको उस [अविमुक्त] स्थानमें स्थापित कर दिया है॥ १-२॥
न कदाचिन्मया मुक्तं स्थानं च सततं मुने।<br>सर्वतीर्थमयं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत्॥ ३हे मुने! मैं यहाँ सतत स्थित रहता हूँ, मैंने कभी भी इस स्थानका त्याग नहीं किया; यह सभी तीर्थोंसे युक्त, पुण्यप्रद, गुह्यसे भी गुह्यतर तथा महान् है॥ ३॥
स्थानानां चैव सर्वेषामादिभूतं महेश्वरम्।<br>यत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिसत्तम॥ ४<br>अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्।<br>तत्र चैव तु सम्भूतो ज्ञानं प्राप्नोति मानवः॥ ५हे मुनिश्रेष्ठ! महेश्वरका यह स्थान सभी स्थानोंके आदिमें प्रादुर्भूत हुआ, जहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त किया। वहाँपर उत्पन्न हुआ मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४-५॥
गच्छ वाराणसीं शीघ्रं यत्र देवः सनातनः।<br>देवताभिः समस्ताभिस्तत्र देवः पिनाकधृक्॥ ६<br>स्तूयते वरदो देवैर्ब्रह्मादिभिरभीक्ष्णशः।<br>तत्रासिवरणा चैव निम्नगे सिद्धसेविते॥ ७आप शीघ्र वाराणसी जाइये, जहाँ सनातन देव [शिवजी] समस्त देवताओंके साथ विद्यमान हैं। ब्रह्मा आदि देवता वर प्रदान करनेवाले पिनाकधारी शिवकी वहाँ निरन्तर स्तुति करते हैं। वहाँ सिद्धोंके द्वारा सेवित ‘असि’ तथा ‘वरणा’ [नामक] दो नदियाँ हैं॥ ६-७॥
बहुजन्माप्तपापानां दुष्टानां देहिनां भुवि।<br>क्षालनं कुरुते देवि सा नदी यत्र जाह्नवी॥ ८<br>या दृशा सर्वथा स्वर्गे सा नदीनां सरिद्वरा।<br>या माता सर्वभूतानां सा गङ्गा यत्र निम्नगा॥ ९हे देवि! वहाँ गङ्गा नदी पृथ्वीतलपर दुष्ट प्राणियोंके अनेक जन्मोंके अर्जित पापोंका क्षालन करती हैं। जो सदा स्वर्गमें दृष्टिगत होती हैं तथा जो सभी प्राणियोंकी माता हैं, वे नदियोंमें श्रेष्ठ गंगा नदी वहाँ विद्यमान हैं॥ ८-९॥
अविमुक्तं परं क्षेत्रं शङ्करस्य सदैव हि।<br>तत्र स्थानं प्रसिद्धं च त्रैलोक्ये शूलपाणिनः॥ १०<br>निम्नगाभ्यां पुरी सा च नाम्ना वाराणसी मुने।<br>कृतस्नानेन देवेन ओङ्कारे संस्थितेन वा।<br>तस्मिन् काले वरो दत्तो देवदेवेन शम्भुना॥ ११वहाँ शंकरजीका सदैव परम अविमुक्तक्षेत्र है, वह शूलपाणि शिवजीका तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध निवास-स्थान है। हे मुने! दोनों [वरणा तथा असि] नदियोंसे युक्त होनेके कारण वह पुरी ‘वाराणसी’ नामसे विख्यात है। स्नान करनेके अनन्तर ओंकारमें संस्थित देवदेव