भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 758
७५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
एवं मन्त्रविधिं ज्ञात्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत्।<br>तस्य पाशक्षयोऽतीव योगिनो मृत्युनिग्रहः॥ ३१<br><br>त्रियम्बकसमो नास्ति देवो वा घृणयान्वितः।<br>प्रसादशीलः प्रीतश्च तथा मन्त्रोऽपि सुव्रतः॥ ३२<br><br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य त्रियम्बकमुमापतिम्।<br>त्रियम्बकेण मन्त्रेण पूजयेत्सुसमाहितः॥ ३३<br><br>सर्वावस्थां गतो वापि मुक्तोऽयं सर्वपातकैः।<br>शिवध्यानान्न सन्देहो यथा रुद्रस्तथा स्वयम्॥ ३४<br><br>हत्वा भित्त्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>शिवमेकं सकृत्स्मृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३५इस प्रकार मन्त्रकी विधिको जानकर शिवलिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उस योगीके पाश (बन्धन)-का पूर्णरूपसे विनाश और उसके मृत्युका निग्रह हो जाता है। हे सुव्रतो! त्रियम्बकके समान कोई अन्य देवता दयालु नहीं हैं; वे सरलतासे प्रसन्न होनेवाले तथा प्रेममय हैं, उनका मन्त्र भी वैसा ही है। अतः सब कुछ छोड़कर दत्तचित्त होकर त्रियम्बकमन्त्रसे उमापति त्रियम्बककी पूजा करनी चाहिये। किसी भी दशाको प्राप्त मनुष्य शिवके ध्यानसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और जैसे रुद्र हैं; वैसे ही स्वयं हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। प्राणियोंका छेदन-भेदन करके तथा अन्यायपूर्वक वस्तुओंका भोग करके भी मनुष्य एकमात्र शिवका केवल एक बार ध्यान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३१—३५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सार्थत्रियम्बकमन्त्रवर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५४॥


पचपनवाँ अध्याय

योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि, पाँच प्रकारके योग, शिवपाशुपत-योगकी महिमा, श्रीलिङ्गमहापुराणका परिचय तथा श्रीलिङ्गमहापुराणके श्रवण एवं पठनका माहात्म्य

ऋषय ऊचुः<br>कथं त्रियम्बको देवो देवदेवो वृषध्वजः।<br>ध्येयः सर्वार्थसिद्धयर्थं योगमार्गेण सुव्रत॥ १<br>पूर्वमेवापि निखिलं श्रुतं श्रुतिसमं पुनः।<br>विस्तरेण च तत्सर्वं सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि॥ २**ऋषिगण बोले—**हे सुव्रत! सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा तीन नेत्रोंवाले, देवोंके भी देव तथा वृषकी ध्वजावाले भगवान् शिवका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये? पूर्वमें भी हम आपसे वेदतुल्य जो सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुन चुके हैं, वह सब संक्षेपमें बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२॥
सूत उवाच<br>एवं पैतामहेनैव नन्दी दिनकरप्रभः।<br>मेरुपृष्ठे पुरा पृष्टो मुनिसङ्घैः समावृतः॥ ३<br>सोऽपि तस्मै कुमाराय ब्रह्मपुत्राय सुव्रतः।<br>मिथः प्रोवाच भगवान् प्रणताय समाहितः॥ ४**सूतजी बोले—**हे सुव्रतो! इसी प्रकार पूर्वकालमें मेरुपर्वतके शिखरपर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारने सूर्यके समान प्रभाववाले तथा मुनियोंसे घिरे हुए नन्दीसे पूछा था। तब भगवान् नन्दी भी उन विनम्र ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारसे समाहितचित्त होकर कहने लगे॥ ३-४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>एवं पुरा महादेवो भगवान्नीललोहितः।<br>गिरिपुत्र्याम्बया देव्या भगवत्यैकशय्यया॥ ५<br>पृष्टः कैलासशिखरे हृष्टपुष्टतनूरुहः।**नन्दिकेश्वर बोले—**यही बात पूर्व समयमें कैलास शिखरपर एक ही शय्यापर साथ-साथ विराजमान हिमालयपुत्री भगवती देवी पार्वती ने पुलकित रोमोंवाले