भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि ७५७

संस्कृतहिन्दी
भगवान् नीललोहित महादेवसे पूछा था॥ ५ १/२ ॥
श्रीदेव्युवाच<br>योगः कतिविधः प्रोक्तस्तत्कथं चैव कीदृशम् ॥ ६<br>ज्ञानं च मोक्षदं दिव्यं मुच्यन्ते येन जन्तवः ।श्रीदेवी बोलीं— योग कितने प्रकारका कहा गया है, उसका स्वरूप कैसा है तथा वह किस प्रकारका है ? वह दिव्य तथा मोक्षदायक ज्ञान कैसा है, जिसके द्वारा प्राणी [बन्धनसे] मुक्त हो जाते हैं?॥ ६ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>प्रथमो मन्त्रयोगश्च स्पर्शयोगो द्वितीयकः ॥ ७<br>भावयोगस्तृतीयः स्यादभावश्च चतुर्थकः ।<br>सर्वोत्तमो महायोगः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥ ८श्रीभगवान् बोले— पहला मन्त्रयोग है, दूसरा स्पर्शयोग है, तीसरा भावयोग है और चौथा अभावयोग है; पाँचवाँ महायोग है, जो सर्वोत्तम कहा गया है॥ ७-८॥
ध्यानयुक्तो जपाभ्यासो मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः ।<br>नाडीशुद्ध्यधिको यस्तु रेचकादिक्रमान्वितः ॥ ९<br>समस्तव्यस्तयोगेन जयो वायोः प्रकीर्तितः ।<br>बलस्थिरक्रियायुक्तो धारणाद्यैश्च शोभनैः ॥ १०<br>धारणात्रयसन्दीप्तो भेदत्रयविशोधकः ।<br>कुम्भकावस्थितोऽभ्यासः स्पर्शयोगः प्रकीर्तितः ॥ ११<br>मन्त्रस्पर्शविनिर्मुक्तो महादेवं समाश्रितः ।<br>बहिरन्तर्विभागस्थस्फुरत्संहरणात्मकः ॥ १२<br>भावयोगः समाख्यातश्चित्तशुद्धिप्रदायकः ।<br>विलीनावयवं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ १३<br>शून्यं सर्वं निराभासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते ।<br>अभावयोगः सम्प्रोक्तश्चित्तनिर्वाणकारकः ॥ १४<br>नीरूपः केवलः शुद्धः स्वच्छन्दं च सुशोभनः ।<br>अनिर्देश्यः सदालोकः स्वयंवेद्यः समन्ततः ॥ १५<br>स्वभावो भासते यत्र महायोगः प्रकीर्तितः ।<br>नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वचित्तसमुत्थितः ॥ १६<br>निर्मलः केवलो ह्यात्मा महायोग इति स्मृतः ।ध्यानसे युक्त जपका अभ्यास मन्त्रयोग कहा गया है। रेचक आदि प्राणायामके द्वारा नाड़ियोंका शुद्धीकरण समस्त-व्यस्त-योगसे प्राणका विजय कहा गया है। वाजीकरण क्रियासे युक्त [वीर्यस्तम्भनरूप] शोभन धारणादि अंगोंसे सम्पन्न, सात्त्विक आदि त्रिविध धारणासे प्रकाशित, विश्व-प्राज्ञ-तैजसरूप भेदत्रयका शोधक, कुम्भकमें स्थित ध्यानाभ्यास ही स्पर्शयोग कहा गया है। मन्त्र तथा स्पर्शयोगसे पृथक्, महादेवपर अवलम्बित, बाहर तथा भीतरकी दशाके स्फुरण तथा संहरणसे युक्त और चित्तको शुद्धि प्रदान करनेवाला योग भावयोग कहा गया है। चराचर सम्पूर्ण जगत् जिसमें विलीन है, जिसमें सम्पूर्ण स्वरूपका शून्य तथा आभासहीन रूपमें चिन्तन किया जाता है, चित्तका निर्वाण करनेवाले उस योगको अभावयोग कहा गया है। जो रूपहीन, अद्वितीय, निर्मल, स्वतन्त्र, अत्यन्त सुन्दर, अनिर्देश्य, सर्वदा प्रकाशमान, हर प्रकारसे स्वयं जाननेयोग्य है तथा जिसमें अपनी आत्माकी सत्ता भासित होती है, उसे महायोग कहा गया है। आत्मा सदा प्रकाशित है, स्वयं ज्योतिर्मय है, सम्पूर्ण चित्तोंसे ऊपर उठा हुआ है, विशुद्ध है तथा अद्वितीय है—यह अनुभव होना महायोग कहा गया है॥ ९-१६ १/२ ॥
अणिमादिप्रदाः सर्वे सर्वे ज्ञानस्य दायकाः ॥ १७<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यमेषु योगेष्वनुक्रमात् ।<br>अहं सङ्गविनिर्मुक्तो महाकाशोपमः परः ॥ १८ये सभी योग अणिमा आदि सिद्धियोंको देनेवाले तथा ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। इन योगोंमें क्रमशः एकके बाद दूसरेमें पूर्वकी अपेक्षा वैशिष्ट्य है। यह महायोग अहंके संगसे रहित, महान् आकाशके तुल्य,