भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 757

अध्याय ५४ ] मृत्युहर त्र्यम्बकमन्त्रका माहात्म्य तथा मन्त्रका व्याख्यान ७५५


संस्कृत श्लोकहिन्दी व्याख्या
वेदानामपि देवानां ब्रह्मक्षत्रविशामपि।<br>अकारोकारमकाराणां मात्राणामपि वाचकः ॥ १९<br><br>तथा सोमस्य सूर्यस्य वह्नेरग्नित्रयस्य च।<br>अम्बा उमा महादेवो ह्यम्बकस्तु त्रियम्बकः ॥ २०यह तीनों लोकों, तीनों गुणों, तीनों वेदों, तीनों देवताओं, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य—इन तीनों वर्णोंका स्वामी है। यह अकार, उकार और मकार—इन तीन मात्राओंका वाचक है। चन्द्र, सूर्य तथा वह्नि—इन तीनों अग्नियोंकी अम्बा (माता) उमा हैं। महादेव इन सबके अम्बक (पिता) हैं, अतः यह त्रियम्बक मन्त्र है॥ १८–२०॥
सुपुष्पितस्य वृक्षस्य यथा गन्धः सुशोभनः।<br>वाति दूरातथा तस्य गन्धः शम्भोर्महात्मनः ॥ २१<br><br>तस्मात्सुगन्धो भगवान् गन्धारयति शङ्करः।<br>गान्धारश्च महादेवो देवानांमपि लीलया ॥ २२<br><br>सुगन्धस्तस्य लोकेऽस्मिन् वायुर्वाति नभस्तले।<br>तस्मात्सुगन्धिस्तं देवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३जिस प्रकार पुष्पित वृक्षकी अत्यन्त सुन्दर गन्ध बहुत दूरसे ही फैलती है, उसी प्रकार उन परमात्मा शिवकी गन्ध जगत्में सर्वत्र व्याप्त रहती है, अतः भगवान् शिव सुगन्ध हैं। वे महादेव शंकर अपनी लीलासे देवताओंको भी सुगन्धित करते हैं। जब वायु आकाशमण्डलमें प्रवाहित होती है, तब उन शिवकी सुगन्ध जगत्में फैलती है। अतः सुगन्धिमय होनेसे उन प्रभुको ‘सुगन्धि’ तथा ‘पुष्टिवर्धन’ कहा जाता है॥ २१–२३॥
यस्य रेतः पुरा शाम्भोर्हरेर्योनौ प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य वीर्यादभूदण्डं हिरण्मयमजोद्भवम् ॥ २४<br><br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ भूर्भुवःस्वर्महस्तपः।<br>सत्यलोकमतिक्रम्य पुष्टिर्वीर्यस्य तस्य वै ॥ २५<br><br>पञ्चभूतान्यहङ्कारो बुद्धिः प्रकृतिरेव च।<br>पुष्टिर्बीजस्य तस्यैव तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः ॥ २६पूर्वकालमें जिन शम्भुका तेज (वीर्य) भगवान् विष्णुकी योनिमें स्थापित हुआ, उनके उस तेजसे सुवर्णमय अण्ड निर्मित हुआ, जो ब्रह्माकी उत्पत्तिका कारण बना। उनके वीर्यका पोषण चन्द्रमा, सूर्य, सभी नक्षत्र, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, तपःलोक और सत्यलोकसे भी आगे बढ़कर हुआ; उन्हींके बीजसे पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति—ये सब पुष्टिको प्राप्त हुए। अतः वे शिव पुष्टिवर्धन संज्ञावाले हैं॥ २४–२६॥
तं पुष्टिवर्धनं देवं घृतेन पयसा तथा।<br>मधुना यवगोधूममाषबिल्वफलेन च ॥ २७<br><br>कुमुदार्कशमीपत्रगौरसर्षपशालिभिः ।<br>हुत्वा लिङ्गे यथान्यायं भक्त्या देवं यजामहे ॥ २८<br><br>ऋतेनानेन मां पाशाद्बन्धनात्कर्मयोगतः।<br>मृत्योश्च बन्धनाच्चैव मुक्षीय भव तेजसा ॥ २९<br><br>उर्वारुकाणां पक्वानां यथा कालादभूत्पुनः।<br>तथैव कालः सम्प्राप्तो मनुना तेन यत्नतः ॥ ३०घृत, दुग्ध, मधु, जौ, गेहूँ, उड़द, बेलका फल, कुमुद, अर्क, शमीपत्र, श्वेत सरसों तथा शालिधानसे विधिपूर्वक हवन करके हम शिवलिङ्गमें उन पुष्टिवर्धन भगवान् शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। हे भव! इस पूजनविधिके प्रभावसे हम कर्मजन्य पाशबन्धनसे और मृत्युबन्धनसे मुक्त हो जायें। जैसे यथासमय पके हुए ककड़ी-फल (फूट)-की उसके वृक्षसे मुक्ति हो जाती है, वैसे ही कालके उपस्थित होनेपर उस मन्त्रके प्रभावसे काल-बन्धनसे हमारी मुक्ति हो जाय॥ २७–३०॥