श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग ---|---
| श्लोक | अर्थ |
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| एतद्द्वः कथितं सर्वं सरहस्यं समासतः।<br>शिवेन देवदेवेन शर्वेणात्युग्रशूलिना॥ ७<br><br>कथितं मेरुशिखरे स्कन्दायामिततेजसे।<br>स्कन्देन देवदेवेन ब्रह्मपुत्राय धीमते॥ ८<br><br>साक्षात्सनत्कुमारेण सर्वलोकहितैषिणा।<br>पाराशर्याय कथितं पारम्पर्यक्रमागतम्॥ ९ | इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सम्पूर्ण बातें संक्षेपमें आप लोगोंको बता दीं। अत्यन्त उग्र शूल धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् शिवने मेरु शिखरपर अमित तेजवाले कार्तिकेयजीको इसे बताया था। तत्पश्चात् देवोंके देव उन कार्तिकेयने बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारको बताया और पुनः उन लोकहितैषी सनत्कुमारने इसे पराशरपुत्र व्यासको बताया; इस प्रकार परम्पराक्रमसे यह प्रकाशमें आया॥ ७-९॥ |
| शुके गते परंधाम दृष्ट्वा रुद्रं त्रियम्बकम्।<br>गतशोको महाभागो व्यासः पर ऋषिः प्रभुः॥ १०<br><br>स्कन्दस्य सम्भवं श्रुत्वा स्थिताय च महात्मने।<br>त्रियम्बकस्य माहात्म्यं मन्त्रस्य च विशेषतः॥ ११<br><br>कथितं बहुधा तस्मै कृष्णद्वैपायनाय वै।<br>तत्सर्वं कथयिष्यामि प्रसादादेव तस्य वै॥ १२ | त्रियम्बक रुद्रका दर्शन करके शुकदेवजीके मोक्षपद प्राप्त कर लेनेके अनन्तर महाभाग महर्षि भगवान् व्यासजी शोकको प्राप्त हुए। उस समय स्कन्दके प्रादुर्भावको सुनकर वहाँपर स्थित महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको सनत्कुमारने त्रियम्बकमन्त्रके माहात्म्यको बहुत प्रकारसे बताया था। मैं उन्हींकी कृपासे आप लोगोंको वह सब बताऊँगा॥ १०-१२॥ |
| देवं सम्पूज्य विधिना जपेन्मन्त्रं त्रियम्बकम्।<br>मुच्यते सर्वपापैश्च सप्तजन्मकृतैरपि॥ १३<br><br>सङ्ग्रामे विजयं लब्ध्वा सौभाग्यमतुलं भवेत्।<br>लक्षहोमेन राज्यार्थी राज्यं लब्ध्वा सुखी भवेत्॥ १४<br><br>पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति नियुतेन न संशयः।<br>धनार्थी प्रयुतेनैव जपेदेव न संशयः॥ १५<br><br>धनधान्यादिभिः सर्वैः सम्पूर्णः सर्वमङ्गलैः।<br>क्रीडते पुत्रपौत्रैश्च मृतः स्वर्गे प्रजायते॥ १६<br><br>नानेन सदृशो मन्त्रो लोके वेदे च सुव्रताः।<br>तस्मात्त्रियम्बकं देवं तेन नित्यं प्रपूजयेत्॥ १७ | महादेवकी सम्यक् पूजा करके विधिपूर्वक त्रियम्बकमन्त्रका जप करना चाहिये। इसके प्रभावसे मनुष्य सात जन्मोंके किये गये सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; संग्राममें विजय प्राप्त करके वह अतुलनीय सौभाग्य प्राप्त करता है। राज्यकी कामना करनेवाला व्यक्ति एक लाख हवनसे राज्य प्राप्त करके सुखी हो जाता है। पुत्रकी इच्छावाला एक लाख होमसे पुत्र प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। धन चाहनेवालेको एक करोड़ त्रियम्बक-मन्त्रका जप करना चाहिये और देव त्रियम्बककी सदा पूजा करनी चाहिये; उससे वह मनुष्य सभी प्रकारके मंगलोंसहित पुत्र-पौत्रोंके साथ सुखमय जीवन व्यतीत करता है और मृत्युके अनन्तर स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रतो! इस त्रियम्बकमन्त्रके समान इस लोकमें तथा वेदमें कोई भी मन्त्र नहीं है। अतः इस मन्त्रसे भगवान् त्रियम्बककी नित्य पूजा करनी चाहिये—ऐसा करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका आठ गुना फल होता है॥ १३-१७ १/२॥ |
| अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं भवेत्।<br>त्रयाणामपि लोकानां गुणानामपि यः प्रभुः॥ १८ | [त्रियम्बक शब्दकी व्याख्या इस प्रकार है—] |