भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 747

अध्याय ५०] विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान ७४५


यवक्षीराज्यहोमेन जातितण्डुलकेन वा।<br>प्रीयेत भगवानीशो ह्यघोरः परमेश्वरः ॥ १०<br><br>दध्ना पुष्टिर्नृपाणां च क्षीरहोमेन शान्तिकम्।<br>षण्मासं तु घृतं हुत्वा सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ ११<br><br>राजयक्ष्मा तिलैर्होमान्नश्यते वत्सरेण तु।<br>यवहोमेन चायुष्यं घृतेन च जयस्तदा ॥ १२<br><br>सर्वकुष्ठक्षयार्थं च मधुनाक्तैश्च तण्डुलैः।<br>जुहुयादयुतं नित्यं षण्मासान्नियतः सदा ॥ १३<br><br>आज्यं क्षीरं मधुश्चैव मधुरत्रयमुच्यते।<br>समस्तं तुष्यते तस्य नाशयेद्वै भगन्दरम् ॥ १४<br><br>केवलं घृतहोमेन सर्वरोगक्षयः स्मृतः।<br>सर्वव्याधिहरं ध्यानं स्थापनं विधिनार्चनम् ॥ १५<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरस्य महात्मनः।<br>प्रतिष्ठा यजनं सर्वं नन्दिना कथितं पुरा ॥ १६<br><br>ब्रह्मपुत्राय शिष्याय तेन व्यासाय सुव्रताः ॥ १७सौभाग्यकी प्राप्ति होती है और मधु, घृत तथा दधिके मिश्रणका नित्य वर्षपर्यन्त हवन करनेसे मनुष्य सिद्ध हो जाता है। जौ, दुग्ध, घृत और जातिपुष्पके समान श्वेत चावलके होमसे भगवान् अघोर परमेश्वर शिव प्रसन्न होते हैं ॥ ८-१०॥<br><br>छः मासतक नित्य दधिके हवनसे राजाओंको पुष्टि प्राप्त होती है, दुग्धके हवनसे शान्ति होती है और घृतके हवनसे उनके सभी रोगोंका नाश होता है। वर्षपर्यन्त तिलोंके हवनसे राजयक्ष्मा नष्ट होता है, जौके हवनसे आयु प्राप्त होती है और घृतके हवनसे विजय मिलती है। सभी प्रकारके कुष्ठोंके नाशके लिये नियमसे युक्त रहकर छः मासतक प्रतिदिन मधुमिश्रित चावलोंसे दस हजार आहुति प्रदान करनी चाहिये। घृत, दुग्ध और मधुको मधुरत्रय कहा जाता है। इसके हवनसे उस व्यक्तिका भगन्दर रोग नष्ट हो जाता है और सभी लोग उस व्यक्तिसे सन्तुष्ट रहते हैं। केवल घृतके होमसे सभी रोगोंका नष्ट होना बताया गया है। भगवान् अघोरका ध्यान, स्थापन तथा विधिपूर्वक पूजन समस्त कष्टोंको दूर करनेवाला है। हे सुव्रतो! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें परमात्मा अघोरके स्थापन तथा पूजनके विषयमें सब कुछ बता दिया, जिसे पूर्वकालमें नन्दीने ब्रह्मपुत्र शिष्य सनत्कुमारसे कहा था और फिर उन्होंने व्यासजीको बताया था ॥ ११-१७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽघोरेशप्रतिष्ठाविधानवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरेशप्रतिष्ठाविधानवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥


पचासवाँ अध्याय

विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान

ऋषय ऊचुः<br>निग्रहः कथितस्तेन शिववक्त्रेण शूलिना।<br>कृतापराधिनां तं तु वक्तुमर्हसि सुव्रत ॥ १<br><br>त्वया न विदितं नास्ति लौकिकं वैदिकं तथा।<br>श्रौतं स्मार्तं महाभाग रोमहर्षण सुव्रत ॥ २**ऋषिगण बोले—**हे सुव्रत! कल्याणरूप मुखवाले भगवान् शिवने अपने अपराध करनेवालोंके लिये जिस दण्डविधानका वर्णन किया है; उसे आप हमें बतानेकी कृपा करें। हे महाभाग! हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! लौकिक, वैदिक, श्रौत तथा स्मार्त—कोई भी बात आपको अविदित नहीं है ॥ १-२॥