भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 746
७४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सिंहासने ह्यानन्तादीन् विद्येशामपि च क्रमात्।<br>स्थापयेत्प्रणवेनैव गुह्याङ्गादीनि पङ्कजे॥ ४९<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं चलस्थापनमुत्तमम्।<br>सर्वेषामपि देवानां देवीनां च विशेषतः॥ ५० | चाहिये। अनन्त आदि तथा वागीश्वरीकी स्थापना सिंहासनपर और धर्म आदिकी स्थापना कमलके आसनपर प्रणवके साथ करनी चाहिये। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें समस्त देवताओं तथा विशेषरूपसे देवियोंकी उत्तम चलप्रतिष्ठाका वर्णन कर दिया॥ ४५–५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे चलमूर्तिस्थापनवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'चलमूर्तिस्थापनवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥


उनचासवाँ अध्याय

अघोरेश्वररूप भगवान् शिवके निमित्त किये गये जप, हवन एवं पूजनका फल

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
अघोरेशस्य माहात्म्यं भवता कथितं पुरा।<br>पूजां प्रतिष्ठां देवस्य भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १[हे भगवन्!] आपने पहले अघोरेशके माहात्म्यका वर्णन किया है; अब उनकी पूजा तथा प्रतिष्ठाका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
अघोरेणाङ्गयुक्तेन विधिवच्च विशेषतः।<br>प्रतिष्ठालिङ्गविधिना नान्यथा मुनिपुङ्गवाः॥ २<br><br>तथाग्निपूजां वै कुर्याद्यथा पूजा तथैव च।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ३<br><br>तिलैर्होमः प्रकर्तव्यो दधिमध्वाज्यसंयुतैः।<br>घृतसक्तुमधूनां च सर्वदुःखप्रमार्जनम्॥ ४<br><br>व्याधीनां नाशनं चैव तिलहोमस्तु भूतिदः।<br>सहस्रेण महाभूतिः शतेन व्याधिनाशनम्॥ ५<br><br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तो जपेन च न संशयः।<br>अष्टोत्तरशतेनैव त्रिकाले च यथाविधि॥ ६<br><br>अष्टोत्तरसहस्रेण षण्मासाज्जायते ध्रुवम्।<br>सिद्धयो नैव सन्देहो राज्यमण्डलिनामपि॥ ७हे श्रेष्ठ मुनियो! अंगयुक्त अघोरमन्त्रसे शिवलिङ्ग-प्रतिष्ठाकी विधिसे सम्यक् प्रकारसे अघोरेशकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये; अन्य प्रकारसे नहीं। जैसे लिङ्गपूजा होती है, वैसे ही अग्निपूजा भी करनी चाहिये। दधि, मधु तथा घृतसे युक्त तिलोंसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार हवन करना चाहिये। घृत, सत्तू तथा मधुका हवन सभी दुःखोंको दूर करनेवाला तथा व्याधियोंका नाश करनेवाला है। तिलका होम ऐश्वर्य-प्रदायक है। तिलके एक हजार हवनसे महान् ऐश्वर्य और एक सौ हवनसे व्याधिनाश होता है। त्रिकाल विधिपूर्वक अघोर-मन्त्रके एक सौ आठ जपसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। इसके एक हजार आठ जपसे छः माहके भीतर ही सभी सामन्त राजाओंको भी निश्चित रूपसे सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ २–७॥
सहस्रेण ज्वरो याति क्षीरेण च जुहोति यम्।<br>त्रिकालं मासमेकं तु सहस्रं जुहुयात्ययः॥ ८<br><br>मासेन सिध्यते तस्य महासौभाग्यमुत्तमम्।<br>सिद्ध्यते चाब्दहोमेन क्षौद्राज्यदधिसंयुतम्॥ ९जिस व्यक्तिके निमित्त दुग्धसे हजार बार आहुति दी जाती है, उसका ज्वर समाप्त हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एक माह तक तीनों कालोंमें दुग्धकी हजार आहुति प्रदान करे, तो महीनेभरमें उसे अत्युत्तम