भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 748
७४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सूत उवाच<br>पुरा भृगुसुतेनोक्तो हिरण्याक्षाय सुव्रताः।<br>निग्रहोऽघोरशिष्येण शुक्रेणाक्षयतेजसा॥ ३<br>तस्य प्रसादाद्दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान्।<br>त्रैलोक्यमखिलं जित्वा सदेवासुरमानुषम्॥ ४<br>उत्पाद्य पुत्रं गणपं चान्धकं चारुविक्रमम्।<br>रराज लोके देवेन वराहेण निषूदितः॥ ५ | सूतजी बोले—हे सुव्रतो! पूर्वकालमें अघोरके शिष्य परम तेजस्वी भृगुपुत्र शुक्राचार्यने हिरण्याक्षको इस निग्रह (दण्डविधान)-का उपदेश किया था। उसके प्रभावसे दैत्यराज हिरण्याक्ष प्रतापी हो गया और देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको जीतकर महान् पराक्रमी तथा गणाधिपति अन्धक नामक पुत्रको उत्पन्न करके संसारमें राज्य करने लगा। बादमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुने उसका वध कर दिया॥ ३–५॥ | | स्त्रीबाधां बालबाधां च गवामपि विशेषतः।<br>कुर्वतो नास्ति विजयो मार्गेणानेन भूतले॥ ६<br>तेन दैत्येन सा देवी धरा नीता रसातलम्।<br>तेनाघोरेण देवेन निष्फलो निग्रहः कृतः॥ ७<br>संवत्सरसहस्रान्ते वराहेण च सूदतः।<br>तस्मादघोरसिद्ध्यर्थं ब्राह्मणान्नैव बाधयेत्॥ ८<br>स्त्रीणामपि विशेषेण गवामपि न कारयेत्। | पृथ्वीलोकमें इस [अनीतिपूर्ण] मार्गसे स्त्री, बालक तथा विशेषकर गौओंको पीड़ा पहुँचानेवालेकी विजय नहीं होती। वह दैत्य देवी पृथिवीको रसातलमें उठा ले गया था। इस कारण देव अघोरने उसके [पृथ्वी-हरणस्वरूप] निग्रहको निष्फल कर दिया। एक हजार वर्षके पश्चात् भगवान् वाराहके द्वारा वह मारा गया। अतः अघोरसिद्धिके लिये ब्राह्मणों तथा विशेषकर स्त्रियोंको पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये; गौओंको तो कभी नहीं पीड़ित करना चाहिये॥ ६–८ १/२॥ | | गुह्याद्गुह्यतमं गोप्यमतिगुह्यं वदामि वः॥ ९<br>आततायिनमुद्दिश्य कर्तव्यं नृपसत्तमैः।<br>ब्राह्मणेभ्यो न कर्तव्यं स्वराष्ट्रेशस्य वा पुनः॥ १०<br>अतीव दुर्जये प्राप्ते बले सर्वे निषूदिते।<br>अधर्मयुद्धे सम्प्राप्ते कुर्याद्विधिमनुत्तमम्॥ ११<br>अघृणेनैव कर्तव्यो ह्यघृणेनैव कारयेत्।<br>कृतमात्रे न सन्देहो निग्रहः सम्प्रजायते॥ १२ | [हे मुनियो!] गोपनीयसे भी परम गोपनीय रहस्य मैं आप लोगोंको बता रहा हूँ। श्रेष्ठ राजाओंको चाहिये कि अपनेको मारनेके लिये उद्यत आततायीके लिये यह निग्रह-विधान करे। ब्राह्मणोंके लिये तथा अपने राष्ट्रके स्वामीके लिये इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। महान् पराजयकी स्थिति आ जानेपर, सम्पूर्ण सेनाके नष्ट हो जानेपर अथवा [शत्रुद्वारा] अधर्म युद्ध किये जानेपर इस अत्युत्तम विधानको करना चाहिये। इस निग्रह-विधिको क्रूर व्यक्ति ही करे अथवा इसे किसी क्रूर स्वभाववाले ब्राह्मणसे कराये। इसके कर लिये जानेपर निग्रह हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ९–१२॥ | | लक्षमात्रं पुमाञ्जप्त्वा अघोरं घोररूपिणम्।<br>दशांशं विधिना हुत्वा तिलेन द्विजसत्तमाः॥ १३<br>सम्पूज्य लक्षपुष्पेण सितेन विधिपूर्वकम्।<br>बाणलिङ्गेऽथवा वह्नौ दक्षिणामूर्तिमाश्रितः॥ १४<br>सिद्धमन्त्रोऽन्यथा नास्ति द्रष्टा सिद्ध्यादयः पुनः।<br>सिद्धमन्त्रः स्वयं कुर्यात्प्रेतस्थाने विशेषतः॥ १५ | हे श्रेष्ठ द्विजो! भयंकर रूपवाले अघोर मन्त्रका एक लाख जप करके और विधिपूर्वक तिलके द्वारा उसके दशांश (दस हजार)-से हवन करके और पुनः बाणलिङ्ग, अग्नि अथवा दक्षिणामूर्ति प्रतिमापर एक लाख श्वेत पुष्पोंके अर्पणद्वारा विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य सिद्धमन्त्र हो जाता है; अन्यथा उसका मन्त्र सिद्ध |

श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 748, कुल 834 में से · BharatKosha