भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 749

अध्याय ५० ] विभिन्न कामनाओंके लिये अघोरमन्त्रसिद्धिका विधान [ ७४७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मातृस्थानेऽपि वा विद्वान् वेदवेदाङ्गपारगः।<br>केवलं मन्त्रसिद्धो वा ब्राह्मणः शिवभावितः ॥ १६नहीं होता। वेद-वेदांगमें पारंगत विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि सिद्धमन्त्र होनेके लिये इसे प्रेतस्थान अथवा मातृस्थानमें स्वयं करे; अथवा मन्त्रसिद्ध शिवभक्त बुद्धिमान् ब्राह्मण अपने अथवा राजाके उपकारके लिये इस विधिको सम्पन्न करे॥ १३-१६१/२॥
कुर्याद्विधिमिमं धीमानात्मनोऽर्थं नृपस्य वा।<br>शूलाष्टकं न्यसेद्विद्वान् पूर्वादीशानकान्तकम् ॥ १७<br><br>त्रिशिखं च त्रिशूलं च चतुर्विंशच्छिखाग्रतः।<br>अघोरविग्रहं कृत्वा सङ्कुलीकृतविग्रहः ॥ १८<br><br>सर्वनाशकरं ध्यात्वा सर्वकर्माणि कारयेत्।<br>कालाग्निकोटिसङ्काशं स्वदेहमपि भावयेत् ॥ १९[अब निग्रहविधान बताया जाता है] विद्वान् व्यक्ति पूर्वसे आरम्भ करके ईशान [उत्तर-पूर्व] कोणपर समाप्त होनेवाले आठों दिशाओंमें आठ शूल स्थापित करे। त्रिशूलोंके चौबीस किनारोंके सिरोंपर तीन शिखावाले त्रिशूल बनाये। ऐसा त्रिशूलधारी अघोर-विग्रह बनाकर स्वयं संकुचित विग्रहवाला होकर सबका नाश करनेवाले अघोरेश्वरका ध्यान करनेके पश्चात् सभी कार्य करे। साधकको भी चाहिये कि अपने शरीरको करोड़ कालाग्निके समान अनुभव करे॥ १७-१९॥
शूलं कपालं पाशं च दण्डं चैव शरासनम्।<br>बाणं डमरुकं खड्गमष्टायुधमनुक्रमात् ॥ २०<br><br>अष्टहस्तश्च वरदो नीलकण्ठो दिगम्बरः।<br>पञ्चतत्त्वसमारूढो ह्यर्धचन्द्रधरः प्रभुः ॥ २१<br><br>दंष्ट्राकरालवदनो रौद्रदृष्टिर्भयङ्करः।<br>हुंफट्कारमहाशब्दशब्दिताखिलदिङ्मुखः ॥ २२<br><br>त्रिनेत्रं नागपाशेन सुबद्धमुकुटं स्वयम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्नं प्रेतभस्मावगुण्ठितम् ॥ २३<br><br>भूतैः प्रेतैः पिशाचैश्च डाकिनीभिश्च राक्षसैः।<br>संवृतं गजकृत्या च सर्पभूषणभूषितम् ॥ २४<br><br>वृश्चिकाभरणं देवं नीलनीरदनिस्वनम्।<br>नीलाञ्जनाद्रिसङ्काशं सिंहचर्मोत्तरीयकम् ॥ २५<br><br>ध्यायेदेवमघोरेशं घोरघोरतरं शिवम्।<br>षट्त्रिंशदुक्तमात्राभिः प्राणायामेन सुव्रताः ॥ २६<br><br>महामुद्रासमायुक्तः सर्वकर्माणि कारयेत्।उन्होंने शूल, कपाल, पाश, दण्ड, धनुष, बाण, डमरू तथा खड्ग-क्रमसे ये आठ आयुध धारण कर रखे हैं; वरदायक वे प्रभु आठ भुजाओंसे युक्त हैं; उनका कण्ठ नील वर्णका है, वे दिगम्बर हैं; वे पृथ्वी आदि पंचतत्त्वोंसे समन्वित नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ हैं; उन प्रभुने अपने मस्तकपर अर्धचन्द्रमाको धारण कर रखा है; वे विशाल दंष्ट्राओंसे युक्त भयावह मुखवाले हैं; वे भयानक दृष्टिवाले हैं; वे भयंकर हैं; वे हुं-फट् इन महाशब्दोंसे सभी दिशाओंको मुखरित कर रहे हैं; वे तीन नेत्रोंसे सम्पन्न हैं; उन्होंने नागपाशसे अपने मुकुटको भलीभाँति बाँध रखा है; वे सभी प्रकारके आभरणोंसे सम्पन्न हैं; वे चिताभस्म लगाये हुए हैं; वे भूतों, प्रेतों, पिशाचों, डाकिनियों तथा राक्षसोंसे घिरे हुए हैं; वे गजचर्म पहने हुए हैं; सर्प तथा बिच्छूके आभूषणसे अलंकृत हैं; वे जलमय मेघोंके समान गर्जन कर रहे हैं; वे नीलांजनके पर्वतसदृश विग्रहवाले हैं; वे सिंहचर्मका उत्तरीय धारण किये हुए हैं—हे सुव्रतो! पूरक, कुम्भक, रेचक-भेदसे कही गयी छत्तीस मात्राओंके साथ प्राणायामके द्वारा इस प्रकारके अत्यन्त भयंकर रूपवाले अघोरेश्वर भगवान् शिवका ध्यान करना चाहिये। साधकको चाहिये कि महामुद्रासे युक्त होकर समस्त कृत्य सम्पन्न करे॥ २०-२६१/२॥
सिद्धमन्त्रश्चिताग्नौ वा प्रेतस्थाने यथाविधि ॥ २७