श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ७४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्थापयेन्मध्यदेशे तु ऐन्द्रे याम्ये च वारुणे।<br>कौबेर्यां विधिवत्कृत्वा होमकुण्डानि शास्त्रतः॥ २८<br>आचार्यो मध्यकुण्डे तु साधकाश्च दिशासु वै।<br>परिस्तीर्य विलोमेन पूर्ववच्छूलसम्भृतः॥ २९<br>कालाग्निपीठमध्यस्थः स्वयं शिष्यैश्च तादृशैः।<br>ध्यात्वा घोरमघोरेशं द्वात्रिंशाक्षरसंयुक्तम्॥ ३०<br>विभीतकेन वै कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः।<br>पीठे न्यस्य नृपेन्द्रस्य शत्रुमङ्गारकेण तु॥ ३१<br>कुण्डस्याधः खनेच्छत्रुं ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः।<br>अधोमुखोर्ध्वपादं तु सर्वकुण्डेषु यत्नतः॥ ३२<br>श्मशानाङ्गारमानीय तुषेण सह दाहयेत्।<br>तत्राग्निं स्थापयेत्तूष्णीं ब्रह्मचर्यपरायणः॥ ३३ | सिद्धमन्त्र-साधक चिताग्निमें अथवा प्रेतस्थानमें यथाविधि मूर्ति स्थापित करे। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओंमें और मध्यमें पाँच होमकुण्ड विधिवत् शास्त्रानुसार बनाकर अग्नि स्थापित करे। आचार्य मध्यदेशके कुण्डके सामने और अन्य ऋत्विज् चारों दिशाओंके कुण्डोंके सामने बैठें। वह कुशोंको विलोम क्रमसे बिछाकर शूलको पकड़ ले। वह स्वयं कालाग्निपीठके मध्य अपने ही सदृश शिष्योंके साथ बैठे। तत्पश्चात् बत्तीस अक्षरोंवाले अघोरमन्त्रसे अघोरेश्वरका ध्यान करके बहेड़ेकी शाखाके बारह अंगुल मापके टुकड़े करके अपने राजाके शत्रुकि प्रतिकृति बनाकर कुण्डमें अंगारके साथ पीठपर रखकर वह ब्राह्मण क्रोधयुक्त होकर कुण्डके अन्दर ऊपरकी ओर पैर तथा नीचेकी ओर मुख करके उस प्रतिकृतिको सभी कुण्डोंमें यत्नपूर्वक गाड़ दे। तदनन्तर श्मशानसे अग्नि लाकर धानकी भूसीके साथ जला दे। साधक ब्रह्मचर्यपरायण होकर मौन-भावसे वहाँ अग्नि स्थापित करे॥ २७-३३॥ |
| मायूरास्त्रेण नाभ्यां तु ज्वलनं दीपयेत्ततः।<br>कञ्चुकं तुषसंयुक्तैः कार्पासास्थिसमन्वितैः॥ ३४<br>रक्तवस्त्रसमं मिश्रैर्होमद्रव्यैर्विशेषतः।<br>हस्तयन्त्रोद्भवैस्तैलैः सह होमं तु कारयेत्॥ ३५<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु होमयेदनुपूर्वशः।<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां समारभ्य यथाक्रमम्॥ ३६<br>अष्टम्यन्तं तथाङ्गारमण्डलस्थानवर्जितः।<br>एवं कृते नृपेन्द्रस्य शत्रवः कुलजैः सह॥ ३७<br>सर्वदुःखसमोपेताः प्रयान्ति यमसादनम्। | तत्पश्चात् रक्तवस्त्र ओढ़कर साधक कुण्डकी नाभिमें मयूरास्त्रसे, भूसी तथा कपासके बीजोंसे अग्निको प्रज्वलित करे, इसके बाद हाथके यन्त्रसे निकाले गये विविध तेलों तथा रक्तवस्त्रके साथ अन्य हवन-सामग्रियोंको मिश्रित करके शिष्यके साथ होम करे। कृष्णपक्षमें चतुर्दशीसे आरम्भ करके अष्टमीतक क्रमशः एक हजार आठ बार हवन करे; अंगार-मण्डलकी जगहका स्पर्श न करे। इस कर्मके सम्पन्न कर लेनेपर उस राजाके शत्रु अपने परिवारजनोंसहित सभी कष्टोंसे पीड़ित होकर यमलोकको प्राप्त होते हैं॥ ३४-३७ १/२॥ |
| मन्त्रेणानेन चादाय नृकपाले नखं तथा॥ ३८<br>केशं नृणां तथाङ्गारं तुषं कञ्चुकमेव च।<br>चीरच्छटां राजधूलीं गृहसम्मार्जनस्य वा॥ ३९<br>विषसर्पस्य दन्तानि वृषदन्तानि यानि तु।<br>गवां चैव क्रमेणैव व्याघ्रदन्तनखानि च॥ ४०<br>तथा कृष्णमृगाणां च बिडालस्य च पूर्ववत्।<br>नकुलस्य च दन्तानि वराहस्य विशेषतः॥ ४१<br>दंष्ट्राणि साधयित्वा तु मन्त्रेणानेन सुव्रतः।<br>जपेदष्टोत्तरशतं मन्त्रं चाघोरमुत्तमम्॥ ४२ | हे सुव्रतो! इस अघोर मन्त्रका जप करते हुए नाखून, मनुष्यका बाल, अंगार, भूसी, साँपके केचुल, वस्त्रसे झाड़ी गयी धूल, राजमार्गकी धूल, गृहसम्मार्जनकी धूल, विषैले साँपके दाँत, बैलोंके दाँत, गायके दाँत, बाघके दाँत और नाखून, काले हिरन-बिल्ली-नेवले तथा विशेषकर सूअरके दाँतको मृत मनुष्यके कपालमें ले करके और इसी मन्त्रसे इन सबको साधकर उत्तम अघोर मन्त्रको एक सौ आठ बार जपना चाहिये॥ ३८-४२॥ |