भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५१] भगवान् शिवकी संहारिका शक्तिके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा ७४९


| तत्कपालं नखं क्षेत्रे गृहे वा नगरेऽपि वा।<br>प्रेतस्थानेऽपि वा राष्ट्रे मृतवस्त्रेण वेष्टयेत्॥ ४३<br>शत्रोरष्टमराशौ वा परविष्टे दिवाकरे।<br>सोमे वा परविष्टे तु मन्त्रेणानेन सुव्रतः॥ ४४<br>स्थाननाशो भवेत्तस्य शत्रोर्नाशश्च जायते।<br>शत्रुं राज्ञः समालिख्य गमने समवस्थिते॥ ४५<br>भूतले दर्पणप्रख्ये वितानोपरि शोभिते।<br>चतुस्तोरणसंयुक्ते दर्भमालासमावृते॥ ४६<br>वेदाध्ययनसम्पन्ने राष्ट्रे वृद्धिप्रकाशके।<br>दक्षिणेन तु पादेन मूर्ध्नि सन्ताडयेत्स्वयम्॥ ४७<br>एवं कृते नृपेन्द्रस्य शत्रुनाशो भविष्यति।<br>स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य यः कुर्यादाभिचारिकम्॥ ४८<br>स आत्मानं निहत्यैव स्वकुलं नाशयेत्कुधीः।<br>तस्मात्स्वराष्ट्रगोप्तारं नृपतिं पालयेत्सदा॥ ४९<br>मन्त्रौषधिक्रियाद्यैश्च सर्वयत्नेन सर्वदा।<br>एतद्रहस्यं कथितं न देयं यस्य कस्यचित्॥ ५० | हे सुव्रतो! सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहण लगनेपर या शत्रुकी आठवीं राशिमें इनके होनेपर इसी मन्त्रसे नख आदिसे युक्त उस कपालको शववस्त्रके टुकड़ेमें लपेट ले और उसे शत्रुके खेत, घर, श्मशानभूमि, नगर या देशमें गाड़ दे। ऐसा करनेपर वह शत्रु अपने पदसे च्युत हो जायगा और उसका नाश हो जायगा। विजयके लिये गमनकाल उपस्थित होनेपर अपने राजाके शत्रुके चित्रको दर्पण-सदृश भूमिपर, जो वितानसे सुशोभित हो, चार तोरणोंसे युक्त हो, कुशकी मालाओंसे सुशोभित हो और जहाँ राष्ट्रकी समृद्धिका सूचक वैदिक मन्त्रोच्चार हो रहा हो, लिख करके आचार्य अपने दाहिने पैरसे शत्रुके सिरपर प्रहार करे; ऐसा करनेपर अपने राजाके शत्रुंका नाश हो जायगा। जो व्यक्ति अपने देशके राजाको उद्देश्य करके यह अभिचार-कर्म करता है, वह दुर्बुद्धि अपनेको नष्ट करके अपने कुलका नाश कर डालता है। अतः आचार्यको सदा मन्त्रों, औषधियों तथा अनुष्ठानोंके द्वारा सभी प्रयत्नोंसे अपने देशकी रक्षा करनेवाले राजाकी निरन्तर रक्षा करनी चाहिये। [हे ऋषियो!] मैंने जो यह रहस्य आपलोगोंसे कहा, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये॥ ४३-५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरमन्त्रसाधनशत्रुनाशविधानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५०॥


इक्यावनवाँ अध्याय

भगवान् शिवकी संहारिका शक्ति—वज्रेश्वरीविद्याके माहात्म्यमें वृत्रासुरकी उत्पत्तिकी कथा

| ऋषय ऊचुः<br>निग्रहोऽघोररूपोऽयं कथितोऽस्माकमुत्तमम्।<br>वज्रवाहनिकां विद्यां वक्तुमर्हसि सत्तम॥ १<br><br>सूत उवाच<br>वज्रवाहनिका नाम सर्वशत्रुभयङ्करी।<br>अनया सेचयेद्वज्रं नृपाणां साधयेत्तथा॥ २<br>वज्रं कृत्वा विधानेन तद्वज्रमभिषिच्य च।<br>अनया विद्यया तस्मिन् विन्यसेत्काञ्चनेन च॥ ३<br>ततश्चाक्षरलक्षं च जपेद्विद्वान् समाहितः।<br>वज्री दशांशं जुहुयाद्वज्रकुण्डे घृतादिभिः॥ ४ | ऋषिगण बोले—हे सत्तम! आपने भयंकररूपवाले इस उत्तम निग्रहके विषयमें हम लोगोंको बता दिया; अब वज्रवाहनिकाविद्याका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ १॥<br><br>सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] वज्रवाहनिका नामक यह विद्या सभी शत्रुओंके लिये भयंकर है। इस विद्यासे वज्रका सेचन करे और उसे राजाओंको समर्पित करे। विधानपूर्वक वज्रका निर्माण करके और इस विद्यासे वज्रको जलद्वारा सिंचित करके उस वज्रपर स्वर्णसे मन्त्र लिखना चाहिये। तत्पश्चात् विद्वान्‌को |