भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 752
७५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद्वज्रं गोपयेन्नित्यं दापयेन्नृपतेस्ततः।<br>तेन वज्रेण वै गच्छञ्छत्रूञ्जीयाद्रणाजिरे॥ ५चाहिये कि दत्तचित्त होकर अक्षरोंकी संख्याके बराबर लाख संख्यामें जप करे। वज्रीको उस जपका दशांश घृत आदिसे वज्राकार कुण्डमें हवन करना चाहिये। उस वज्रकी नित्य रक्षा करनी चाहिये और बादमें उसे राजाको प्रदान कर देना चाहिये। उस वज्रसहित रणभूमिमें जानेवाला वह राजा शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है॥ २–५॥
पुरा पितामहेनैव लब्धा विद्या प्रयत्नतः।<br>देवी शक्रोपकारार्थं साक्षाद्वज्रेश्वरी तथा॥ ६<br><br>पुरा त्वष्टा प्रजानाथो हतपुत्रः सुरेश्वरात्।<br>विद्यया हरतः सोममिन्द्रवैरेण सुव्रताः॥ ७<br><br>तस्मिन् यज्ञे यथाप्राप्तं विधिनोपकृतं हविः।<br>तदैच्छत महाबाहुर्विश्वरूपविमर्दनः॥ ८<br><br>मत्पुत्रमवधीः शक्र न दास्ये तव शोभनम्।<br>भागं भागार्हता नैव विश्वरूपो हतस्त्वया॥ ९<br><br>इत्युक्त्वा चाश्रमं सर्वं मोहयामास मायया।<br>ततो मायां विनिर्भिद्य विश्वरूपविमर्दनः॥ १०<br><br>प्रसह्य सोममपिबत्सगणैश्च शचीपतिः।<br>ततस्तच्छेषमादाय क्रोधाविष्टः प्रजापतिः॥ ११<br><br>इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहेत्यग्नौ जुहाव ह।<br>ततः कालाग्निसङ्काशो वर्तनाद्वृत्रसंज्ञितः॥ १२<br><br>प्रादुरासीत्सुरेशारिर्दुद्राव च वृषान्तकः।<br>ततः किरीटी भगवान् परित्यज्य दिवं क्षणात्॥ १३<br><br>सहस्रनेत्रः सगणो दुद्राव भयविह्वलः।<br>तदा तमाह स विभुर्हृष्टो ब्रह्मा च विश्वसृट्॥ १४पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माने इन्द्रपर उपकार करनेके लिये भगवान् महेश्वरसे इस साक्षात् देवी वज्रेश्वरीविद्याको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त किया था। हे सुव्रतो! विश्वरूपसे प्राप्त विद्याके बलपर विश्वरूपविमर्दक महाबाहु इन्द्र उस यज्ञमें विधिपूर्वक दी हुई हवि (सोमरस)-को जब चाहने लगे, तब हतपुत्र प्रजापति त्वष्टाने इन्द्रसे कहा—‘हे शक्र! तुमने मेरे पुत्रका वध किया है, अतः मैं तुम्हारा श्रेष्ठ भाग तुम्हें नहीं दूँगा। तुम अपना भाग प्राप्त करनेयोग्य नहीं हो; क्योंकि तुम्हारे द्वारा विश्वरूपका वध किया गया है’—ऐसा कहकर त्वष्टाने अपनी मायासे सम्पूर्ण आश्रमको मोहित कर दिया। तब विश्वरूपका वध करनेवाले शचीपति इन्द्रने उस मायाका भेदन करके बलपूर्वक अपने गणोंके साथ सोमका पान कर लिया। तत्पश्चात् अवशिष्ट सोमको लेकर क्रोधाविष्ट प्रजापति त्वष्टाने ‘इन्द्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहा’—ऐसा कहकर अग्निमें उसे होम कर दिया। उसी क्षण हवनकुण्डसे कालाग्निसदृश असुर प्रकट हुआ, जो अपने व्यवहारके कारण वृत्र संज्ञावाला हुआ। उस इन्द्रशत्रुने उन्हें दौड़ा लिया। तब किरीटधारी तथा हजार नेत्रोंवाले भगवान् इन्द्र स्वर्ग छोड़कर भयसे व्याकुल हो अपने गणोंसहित भाग चले [और वे ब्रह्माके पास गये]॥ ६–१३ १/२॥
त्यक्त्वा वज्रं तमेतेन जहीत्यरिमरिन्दमः।<br>सोऽपि सन्नह्य देवेन्द्रो देवैः सार्धं महाभुजः॥ १५<br><br>निहत्य चाप्रयत्नेन गतवान् विगतज्वरः।<br>तस्माद्वज्रेश्वरीविद्या सर्वशत्रुभयङ्करी॥ १६तब विश्वका सृजन करनेवाले प्रभु ब्रह्माने उनसे कहा—हे शत्रुसंहारक! वज्र त्यागकर आप इस मन्त्र (वज्रेश्वरीविद्या)-के द्वारा उस शत्रु्का वध कीजिये। तब शत्रुनाशक वे महाभुज देवेन्द्र भी सावधान होकर देवताओंके साथ बिना प्रयत्न ही उसे मारकर चिन्तामुक्त