भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ५२ ] वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान ७५१


| मन्देहा राक्षसा नित्यं विजिता विद्ययैव तु।<br>तां विद्यां सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रमोचनीम्॥ १७<br><br>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ फट् जहि हुं फट्<br>छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा।<br>विद्या वज्रेश्वरीत्येषा सर्वशत्रुभयङ्करी।<br>अनया संहतिः शाम्भोर्विद्यया मुनिपुङ्गवाः॥ १८॥ | होकर वहाँसे चले गये॥ १४-१५ १/२ ॥<br><br>अतः वज्रेश्वरीविद्या सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है। मन्देह नामक राक्षस इसी विद्याके द्वारा सदा पराजित हुए। सभी पापोंका नाश करनेवाली उस विद्याको मैं बता रहा हूँ—'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ फट् जहि हुं फट् छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा'—यह वज्रेश्वरीविद्या है, जो सब प्रकारके शत्रुओंके लिये भयंकर है। हे मुनिश्रेष्ठो! इसी विद्याके द्वारा शिवजी [विश्वका] संहार करते हैं॥ १६—१८॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वज्रेश्वरीविद्यावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वज्रेश्वरीविद्यावर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५१॥


बावनवाँ अध्याय

वज्रेश्वरीविद्याकी सिद्धिका विधान

| ऋषय ऊचुः<br>श्रुता वज्रेश्वरी विद्या ब्राह्मी शक्रोेपकारिणी।<br>अनया सर्वकार्याणि नृपाणामिति नः श्रुतम्॥ १<br>विनियोगं वदस्वास्या विद्याया रोमहर्षण।<br><br>सूत उवाच<br>वश्यमाकर्षणं चैव विद्वेषणमतः परम्॥ २<br>उच्चाटनं स्तम्भनं च मोहनं ताडनं तथा।<br>उत्सादनं तथा छेदं मारणं प्रतिबन्धनम्॥ ३<br>सेनास्तम्भनकादीनि सावित्र्या सर्वमाचरेत्।<br>आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि॥ ४<br>ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्।<br>उद्वास्यानेन मन्त्रेण गन्तव्यं नान्यथा द्विजाः॥ ५<br>प्रतिकार्यं तथा बाह्यं कृत्वा वश्यादिकां क्रियाम्।<br>उद्वास्य वह्निमाधाय पुनरन्यं यथाविधि॥ ६<br>देवीमावाह्य च पुनर्जपेत्सम्पूजयेत्पुनः।<br>होमं च विधिना वह्नौ पुनरेव समाचरेत्॥ ७ | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण! हमलोगोंने इन्द्रका उपकार करनेवाली ब्रह्माकी वज्रेश्वरीविद्याका श्रवण किया। इसके द्वारा राजाओंके सब कार्य सिद्ध होते हैं—ऐसा हमने सुना है; अब आप इस विद्याके विनियोगका वर्णन करें॥ १ १/२ ॥<br><br>सूतजी बोले—सावित्रीमन्त्रके द्वारा वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, उच्चाटन, स्तम्भन, मोहन, ताड़न, उत्सादन, छेदन, मारण, प्रतिबन्धन, सेनास्तम्भन आदि क्रियाएँ तथा अन्य सब कुछ करना चाहिये [आवाहन-मन्त्र इस प्रकार है—] 'आगच्छ वरदे देवि भूम्यां पर्वतमूर्धनि।' [विसर्जन-मन्त्र इस प्रकार है—] 'ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्।' हे द्विजो! शत्रुके प्रति समस्त बाह्य तथा वश्य आदि क्रियाएँ करके इस मन्त्रसे उद्वासन (विसर्जन) करके ही बाहर जाना चाहिये; इसके विपरीत नहीं करना चाहिये। देवीका विसर्जन करनेके अनन्तर पुनः विधिपूर्वक दूसरी अग्निकी स्थापना करके देवीका आवाहनकर फिरसे जप तथा पूजन करना चाहिये। |

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