श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| सर्वकार्याणि विधिना साधयेद्विद्यया पुनः।<br>जातीपुष्पैश्च वश्यार्थी जुहुयादयुतत्रयम्॥ ८<br><br>घृतेन करवीरेण कुर्यादाकर्षणं द्विजाः।<br>विद्वेषणं विशेषेण कुर्याल्लाङ्गलकस्य च॥ ९<br><br>तैलेनोच्चाटनं प्रोक्तं स्तम्भनं मधुना स्मृतम्।<br>तिलेन मोहनं प्रोक्तं ताडनं रुधिरेण च॥ १०<br><br>खरस्य च गजस्याथ उष्ट्रस्य च यथाक्रमम्।<br>स्तम्भनं सर्षपेणापि पाटनं च कुशेन च॥ ११<br><br>मारणोच्चाटने चैव रोहीबीजेन सुव्रताः।<br>बन्धनं त्वहिपत्रेण सेनास्तम्भमतः परम्॥ १२<br><br>कुनट्या नियतं विद्यात्पूजयेत्परमेश्वरीम्।<br>घृतेन सर्वसिद्धिः स्यात्पयसा वा विशुद्ध्यते॥ १३<br><br>तिलेन रोगनाशश्च कमलेन धनं भवेत्।<br>कान्तिर्मधूकपुष्पेण सावित्र्या ह्यायुतत्रयम्॥ १४<br><br>जयादिप्रभृतीन् सर्वान् स्विष्टान्तं पूर्ववत्स्मृतम्।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो विनियोगोऽतिविस्तृतः॥ १५<br><br>जपेद्वा केवलां विद्यां सम्पूज्य च विधानतः।<br>सर्वसिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ १६ | इसके बाद अग्निमें विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। इस प्रकार इस विद्याके द्वारा सभी कार्य सिद्ध करना चाहिये॥ २-७१/२॥<br><br>शत्रुको वशमें करनेकी इच्छावालेको जाती पुष्पोंसे तीस हजार आहुति देनी चाहिये। हे द्विजो! घृत तथा करवीर (कनेर)-के पुष्पके हवनसे आकर्षण-कृत्य करना चाहिये और विद्वेषणकर्मके लिये लांगलक पुष्पका हवन करना चाहिये। तैलके हवनसे उच्चाटन तथा मधुके हवनसे स्तम्भन बताया गया है। इसी प्रकार तिलके हवनसे मोहन तथा पशु-शोणितके हवनसे ताड़न बताया गया है। हे सुव्रतो! सरसोंके द्वारा हवनसे स्तम्भन, कुशके द्वारा हवनसे पाटन, रोहीके बीजके द्वारा हवनसे मारण-उच्चाटन, अहिपत्र (नागवल्लीपत्र)-के द्वारा बन्धन और कुनटी (मनःशिला)-के द्वारा हवनसे सेनास्तम्भन कृत्यकी सिद्धि जाननी चाहिये। इस प्रकार नियमपूर्वक परमेश्वरीका पूजन करना चाहिये। [अब सात्त्विक कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले हवन-द्रव्योंको बताया जाता है-] घृतके हवनसे सब प्रकारकी सिद्धि होती है और दुग्धके हवनसे साधक शुद्ध हो जाता है। तिलके होमसे रोगका नाश हो जाता है, कमलपुष्पके हवनसे धन प्राप्त होता है और महुएके पुष्पके हवनसे कान्ति प्राप्त होती है। प्रत्येक हवनमें तीस हजार सावित्री-मन्त्रका उच्चारण होना चाहिये। जया, अभ्यातान तथा राष्ट्रभृत् होम करके अन्तमें स्विष्टकृत् होम पूर्ववत् कहा गया है। [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अत्यन्त विस्तारवाले इस विनियोगका वर्णन कर दिया। अथवा [हवन न होनेकी स्थितिमें] केवल विधिपूर्वक वज्रेश्वरीविद्याका पूजन करके उसका जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला समस्त सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ८-१६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वश्याकर्षणादिप्रयोगवर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥