श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| वंशस्य चाक्षया विद्या चाप्रमादश्च सर्वतः।<br>इत्याज्ञा ब्रह्मणस्तस्मात्तस्य सर्वं महात्मनः ॥ ४३<br><br>ऋषय प्रोचुः<br><br>ऋषेः सूतस्य चास्माकमेतेषामपि चास्य च।<br>नारदस्य च या सिद्धिस्तीर्थयात्रारतस्य च ॥ ४४<br><br>प्रीतिश्च विपुला यस्मादस्माकं रोमहर्षण ॥ ४५<br><br>सा सदास्तु विरूपाक्षप्रसादात्तु समन्ततः।<br>एवमुक्तेषु विप्रेषु नारदो भगवानपि ॥ ४६<br><br>कराभ्यां सुशुभाग्राभ्यां सूतं पस्पर्शवांस्त्वचि।<br>स्वस्त्यस्तु सूत भद्रं ते महादेवे वृषध्वजे ॥ ४७<br><br>श्रद्धा तवास्तु चास्माकं नमस्तस्मै शिवाय च ॥ ४८ | मुझमें, नारायणमें तथा शिवमें हो जाती है। उसके वंशमें अक्षय विद्या सुलभ रहती है और हर प्रकारसे अप्रमाद विद्यमान रहता है।' यह ब्रह्माजीकी आज्ञा है, अतः यह सब उन्हीं महात्माकी कृपासे हुआ है॥ ३६—४३॥<br><br>ऋषिगण बोले— हे रोमहर्षण! आप ऋषि सूतको, हम मुनियोंको, तीर्थयात्रामें रत इन नारदको, जो महान् सिद्धि तथा भगवत्प्रीति प्राप्त हुई; वह विरूपाक्ष भगवान् शिवकी कृपासे चारों ओर विद्यमान रहे। विप्रोंके ऐसा कहनेपर भगवान् नारदने भी अपने पवित्र हाथोंके अग्रभागसे सूतजीके शरीरका स्पर्श किया और इस प्रकार कहा—हे सूतजी! आपका मंगल हो, आपका कल्याण हो, वृषध्वज महादेवमें आपकी तथा हमलोगोंकी श्रद्धा रहे; उन भगवान् शिवको नमस्कार है—‘नमस्तस्मै शिवाय च’॥ ४४—४८॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतयोगमार्गवर्णने लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें पाशुपतयोगमार्गवर्णनके प्रसंगमें 'लिङ्गपुराणश्रवणपठनमाहात्म्यवर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५ ॥
॥ सम्पूर्णमिदं श्रीलिङ्गमहापुराणम् ॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराण पूर्ण हुआ ॥