श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५५ ] योगमार्गके द्वारा भगवान् महेश्वरके ध्यानकी विधि [ ७५९
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षार्थी पुरुषोत्तमः।<br>भस्मस्नायी भवेन्नित्यं योगे पाशुपते रतः॥ ३०<br>ध्येया यथाक्रमेणैव वैष्णवी च ततः परा।<br>माहेश्वरी परा पश्चात्सैव ध्येया यथाक्रमम्॥ ३१<br>योगेश्वरस्य या निष्ठा सैषा संहृत्य वर्णिता॥ ३२ | निश्चितरूपसे श्रेष्ठ तथा ब्रह्ममयी है। अतः मोक्षकी कामना करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पूर्ण प्रयत्नसे भस्म-स्नान करके पाशुपतयोगमें नित्य संलग्न रहना चाहिये। सर्वप्रथम ब्राह्मी शक्तिका ध्यान करना चाहिये, इसके बाद परा वैष्णवी शक्तिका और तत्पश्चात् परा माहेश्वरी शक्तिका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार योगेश्वर शिवकी जो पराकाष्ठा है, उसका मैंने संक्षेपमें वर्णन कर दिया॥ २९—३२॥ |
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| सूत उवाच<br>एवं शिलादपुत्रेण नन्दिना कुलनन्दिना।<br>योगः पाशुपतः प्रोक्तो भस्मनिष्ठेन धीमता॥ ३३<br>सनत्कुमारो भगवान् व्यासायामिततेजसे।<br>तस्मादहमपि श्रुत्वा नियोगात्सत्रिणामपि॥ ३४<br>कृतकृत्योऽस्मि विप्रेभ्यो नमो यज्ञेभ्य एव च।<br>नमः शिवाय शान्ताय व्यासाय मुनये नमः॥ ३५ | सूतजी बोले—इस प्रकार अपने कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले भस्मधारी शिलादपुत्र बुद्धिमान् नन्दीने सनत्कुमारसे पाशुपतयोगका वर्णन किया। भगवान् सनत्कुमारने अमित तेजवाले व्यासजीको इसे बताया और उनसे सुनकर उनके आदेशसे मैंने यज्ञ-सत्रमें उपस्थित मुनियोंको बताया। मैं कृतकृत्य हूँ। विप्रोंको नमस्कार है, यज्ञोंको नमस्कार है, शान्त शिवको नमस्कार है और व्यासमुनिको नमस्कार है॥ ३३—३५॥ |
| ग्रन्थैकादशसाहस्रं पुराणं लैङ्गमुत्तमम्।<br>अष्टोत्तरशताध्यायमादिमांशमतः परम्॥ ३६<br>षट्चत्वारिंशदध्यायं* धर्मकामार्थमोक्षदम्।<br>अथ ते मुनयः सर्वे नैमिषेयाः समाहिताः॥ ३७<br>प्रणेमुर्देवमीशानं प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>शाखां पौराणिकामेवं कृत्वैकादशिकां प्रभुः॥ ३८<br>ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवानिदं वचनमब्रवीत्।<br>लैङ्गमाद्यन्तमखिलं यः पठेच्छृणुयादपि॥ ३९<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद्वापि स याति परमां गतिम्।<br>तपसा चैव यज्ञेन दानेनाध्ययनेन च॥ ४०<br>या गतिस्तस्य विपुला शास्त्रविद्या च वैदिकी।<br>कर्मणा चापि मिश्रेण केवलं विद्ययापि वा॥ ४१<br>निवृत्तिश्चास्य विप्रस्य भवेद्भक्तिश्च शाश्वती।<br>मयि नारायणे देवे श्रद्धा चास्तु महात्मनः॥ ४२ | यह उत्तम श्रीलिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंमें निबद्ध है। इसके प्रथम भागमें एक सौ आठ अध्याय हैं और उत्तर भागमें पचपन अध्याय हैं। यह पुराण धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तब प्रसन्नताके कारण रोमांचित नैमिषारण्यवासी उन सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर भगवान् ईशान (शिव)-को प्रणाम किया। पुराणोंकी ग्यारहवीं शाखाकी रचना करके स्वयंभू तथा प्रभुतासम्पन्न भगवान् ब्रह्माने यह वचन कहा था—‘जो मनुष्य इस सम्पूर्ण श्रीलिङ्गपुराणको आदिसे अन्ततक पढ़ता है, सुनता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह परमगति प्राप्त करता है। तपस्यासे, यज्ञसे, दानसे, वेदाध्ययनसे, उत्तम कर्मसे, कर्म तथा ज्ञानके मिश्रित प्रभावसे अथवा केवल ज्ञानसे उसकी जो गति होती है, वह इस पुराणके पठन-श्रवणसे हो जाती है; उसे विपुल शास्त्रविद्या तथा वैदिकी विद्या प्राप्त हो जाती है; उस विप्रको शाश्वत शिवभक्ति मिल जाती है; उसका मोक्ष हो जाता है और उस महात्माकी श्रद्धा |
* अत्र षट् च नव च चत्वारिंशच्च षट्चत्वारिंशदिति मध्यमपदलोपिसमासो ज्ञेयः।