भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 768
७६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
करता है अर्थात् भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४९॥
ईश्वर उवाच<br>गोप्रेक्ष्यस्योत्तरेणाथ अनसूयाख्यलिङ्गकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि गतिं च लभते पराम्॥ ५०<br>पश्चान्मुखं च तल्लिङ्गमनसूयाप्रतिष्ठितम्।ईश्वर बोले—हे देवि! गोप्रेक्षके उत्तरमें अनसूया नामक लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य परा गतिको प्राप्त करता है। पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग [देवी] अनसूयाके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ५० १/२॥
अनसूयेश्वरस्याग्रे गणेश्वरमिति स्मृतम्॥ ५१<br>तेन दृष्टेन लभते गणेशस्य सलोकताम्।अनसूयेश्वर-लिङ्गके आगे गणेश्वर [लिङ्ग] बताया गया है, उसके दर्शनसे मनुष्य गणेशजीका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ५१ १/२॥
गणेश्वरात् पश्चिमेन हिरण्यकशिपुः पुरा॥ ५२<br>स्थापयामास मे लिङ्गं कूपस्यैव समीपतः।<br>तस्यैव पश्चिमे देवि लिङ्गं सिद्धेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>दर्शनादेव मे लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।हिरण्यकशिपुने पूर्वकालमें गणेश्वरके पश्चिममें कूपके पासमें ही मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी। हे देवि! उसीके पश्चिममें सिद्धेश्वरलिङ्ग बताया गया है; दर्शन-मात्रसे मेरा वह लिङ्ग सर्वसिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ ५२-५३ १/२॥
अन्यदायतनं भद्रे शृणुष्व गदतो मम॥ ५४<br>वृषभेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं महेशानि गोप्रेक्ष्यस्य तु नैर्ऋते।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि अभीष्टं फलमाप्नुयात्॥ ५५हे भद्रे! अन्य आयतन (लिङ्ग)-के विषयमें सुनिये; मैं बता रहा हूँ। हे महेशानि! वहींपर वृषभेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, जो पूर्वकी ओर मुखवाला है तथा गोप्रेक्षके नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम)-में स्थित है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है॥ ५४-५५॥
गोप्रेक्ष्यस्य दक्षिणतः स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्।<br>दधीचेश्वरनामानं सर्वकामफलप्रदम्॥ ५६गोप्रेक्षके दक्षिणमें सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला दधीचेश्वर नामक उत्तम लिङ्ग स्थापित है॥ ५६॥
दधीचेश्वरसामीप्ये दक्षिणे वरवर्णिनि।<br>अत्रिणा स्थापितं लिङ्गं दैवमार्तिहरं शुभम्॥ ५७हे वरवर्णिनि! दधीचेश्वरलिङ्गके समीपमें दक्षिण दिशामें [मुनि] अत्रिके द्वारा शिवजीका लिङ्ग स्थापित किया गया है; यह दैविक कष्टको दूर करनेवाला तथा मंगलकारक है॥ ५७॥
अत्रीश्वराद्दक्षिणतः सूर्यखण्डमुखेऽपि च।<br>मधुकैटभाभ्यां सुश्रोणि लिङ्गसंस्थापनं कृतम्॥ ५८<br>तत्र पश्चान्मुखो देवि विसमन्थाः प्रपठ्यते।<br>पूर्वामुखं कैटभस्य लिङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ५९हे सुश्रोणि! अत्रीश्वरके दक्षिणमें सूर्यखण्डमुखमें भी मधु तथा कैटभके द्वारा लिङ्गकी स्थापना की गयी है। हे देवि! वहाँपर मधुके द्वारा स्थापित लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला कहा जाता है और कैटभके द्वारा स्थापित त्रिलोक-प्रसिद्ध लिङ्ग पूर्वकी ओर मुखवाला है॥ ५८-५९॥
गोप्रेक्षकस्य पूर्वेण लिङ्गं वै बालकेश्वरम्।<br>बालकेश्वरसामीप्ये विज्ज्वरेश्वरसंज्ञितम्॥ ६०<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ज्वरो नश्यति तत्क्षणात्।गोप्रेक्षके पूर्वमें बालकेश्वरलिङ्ग है। बालकेश्वरके समीपमें विज्ज्वरेश्वर नामक लिङ्ग है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे ज्वर तत्काल नष्ट हो जाता है॥ ६० १/२॥
विज्ज्वरेश्वरपूर्वेण वेदेश्वरमिति श्रुतम्॥ ६१<br>ईशानाभिमुखं लिङ्गं कोणे तस्य मुखानि वै।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि चतुर्वेदो भवेद्द्विजः॥ ६२विज्ज्वरेश्वरके पूर्वमें वेदेश्वर लिङ्ग है—ऐसा कहा गया है; वह लिङ्ग ईशानकी ओर मुखवाला है, उसके कोणमें [अनेक] मुख हैं। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 768, कुल 834 में से · BharatKosha