श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनोंका वर्णन ७६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| द्विज चारों वेदोंका ज्ञाता हो जाता है॥ ६१-६२॥ | |
| वेदेश्वरस्योत्तरतः स्वयं तिष्ठति केशवः।<br>क्षेत्रस्य कारणं चास्य क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते॥ ६३<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि सर्वं दृष्टं चराचरम्। | वेदेश्वरके उत्तरमें स्वयं केशव विराजमान हैं; वे इस क्षेत्रके कारणभूत क्षेत्रज्ञ कहे जाते हैं। हे सुश्रोणि! उनके दर्शनसे समस्त चराचर [जगत्] दृष्टिगत हो जाता है॥ ६३ १/२॥ |
| तत्समीपे तु सुश्रोणि लिङ्गं मे सङ्गमेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि शिष्टैः सह समागमः॥ ६४ | हे सुश्रोणि! उनके समीपमें मेरा संगमेश्वरलिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे हे सुश्रोणि! सज्जनोंके साथ समागम होता है॥ ६४॥ |
| सङ्गमेशस्य पूर्वेण लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>ब्रह्मणा स्थापितं भद्रे प्रयागमिति कीर्त्यते॥ ६५<br>तेन दृष्टेन लभते ब्रह्मणः पदमुत्तमम्।<br>तत्र सा शाङ्करी देवी ब्रह्मवृक्षेऽवतिष्ठते॥ ६६<br>शान्तिं करोति सर्वेषां ये च तीर्थनिवासिनः।<br>अतः परं तु संवेद्यं गङ्गावरणसङ्गमम्॥ ६७ | संगमेश्वरके पूर्वमें चारमुखवाला लिङ्ग है; हे भद्रे! ब्रह्माके द्वारा स्थापित किया गया वह प्रयाग नामसे पुकारा जाता है। उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। वहाँपर वे शांकरीदेवी ब्रह्मवृक्षमें विद्यमान हैं और जो लोग तीर्थमें निवास करनेवाले हैं, उन सबको वे शान्ति प्रदान करती हैं। इसके बाद गंगा तथा वरणाके संगमको जानना चाहिये॥ ६५-६७॥ |
| श्रवणद्वादशीयोगो बुधवारे यदा भवेत्।<br>तदा तस्मिन्नरः स्नात्वा सन्निहत्या फलं लभेत्॥ ६८<br>श्राद्धं कृत्वा तु यस्तत्र तस्मिन् काले यशस्विनि।<br>तारयित्वा पितॄन् सर्वान् विष्णुलोकं स गच्छति॥ ६९ | जब बुधवारके दिन श्रवण-द्वादशीका योग उपस्थित हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य क्षेत्रसन्निधिका फल प्राप्त करता है। हे यशस्विनि! उस कालमें वहाँपर जो [मनुष्य] श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोक जाता है॥ ६८-६९॥ |
| वरणायास्तटे पूर्वे कुम्भीश्वरमिति स्मृतम्।<br>कुम्भीश्वरात्तु पूर्वेण कालेश्वरमिति स्मृतम्॥ ७०<br>कालेश्वरस्योत्तरतो महातीर्थं वरानने।<br>कपिलाह्रदनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ ७१<br>तस्मिन् हृदे तु यः स्नानं कुर्याद्भक्तिपरायणः।<br>वृषध्वजं च वै दृष्ट्वा राजसूयफलं लभेत्॥ ७२ | वरणाके पूर्व-तटपर कुम्भीश्वर [लिङ्ग] बताया गया है। कुम्भीश्वरके पूर्वमें कालेश्वर [लिङ्ग] कहा गया है। हे वरानने! कालेश्वरके उत्तरमें सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा कपिलाह्रद नामक महातीर्थ कहा गया है। जो [मनुष्य] उस ह्रद (सरोवर) में भक्ति-परायण होकर स्नान करता है और वृषध्वजका दर्शन करता है, वह राजसूय [यज्ञ]-का फल प्राप्त करता है॥ ७०-७२॥ |
| नरकस्थास्ततो देवि पितरः सपितामहाः।<br>पितृलोकं प्राप्नुवन्ति तस्मिन् श्राद्धे कृते तु वै॥ ७३<br>गयायां चाष्टगुणितं पुण्यं प्रोक्तं महर्षिभिः।<br>तस्मिन् श्राद्धे कृते भद्रे पितॄणामनृणो भवेत्॥ ७४ | हे देवि! वहाँ श्राद्ध किये जानेपर नरकमें स्थित पितामहसहित सभी पितर पितृलोक प्राप्त करते हैं। महर्षियोंने वहाँ किये गये श्राद्धको गयामें किये गये श्राद्धसे आठ गुना पुण्यप्रद बताया है। हे भद्रे! वहाँ श्राद्ध करनेपर मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है॥ ७३-७४॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे महादेवस्य भामिनि।<br>स्कन्देन स्थापितं लिङ्गं मम भक्त्या सुरेश्वरि॥ ७५<br>तेन दृष्टेन गच्छन्ति स्कन्दस्यैव सलोकताम्।<br>तत्र शाखैर्विशाखैश्च नैगमेयैश्च सुन्दरि।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि गणैः सर्वैर्बहूनि च॥ ७६ | हे भामिनि! हे सुरेश्वरि! महादेवके पश्चिम दिशाभागमें स्कन्दने भक्तिपूर्वक मेरा लिङ्ग स्थापित किया है; उसके दर्शनसे लोग स्कन्दका सालोक्य प्राप्त करते हैं। हे सुन्दरि! वहाँ शाख, विशाख तथा नैगमेय— |