भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 770
७६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन सभी गणोंके द्वारा मेरे बहुत-से लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ७५-७६॥
स्कन्देश्वरस्योत्तरतो बलभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>तेन दृष्टेन देवेशि अनन्तफलमाप्नुयात् ॥ ७७<br><br>स्कन्देश्वराद्दक्षिणतो महालिङ्गं प्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं नन्दिना पुरा ॥ ७८<br><br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि नन्दिलोकमवाप्नुयात्।हे देवेशि! स्कन्देश्वरके उत्तरमें बलभद्रजीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है; उसके दर्शनसे मनुष्य अनन्त फल प्राप्त करता है। स्कन्देश्वरके दक्षिणमें महालिङ्ग विराजमान है; पूर्वकालमें नन्दीने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया था। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य नन्दीका लोक प्राप्त करता है॥ ७७-७८ १/२ ॥
नन्दीश्वरात् पश्चमतो लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम् ॥ ७९<br><br>स्वर्लीनसदृशं भद्रे नन्दिपित्रा प्रतिष्ठितम्।<br>शिलाक्षेश्वरनामानं सुरसङ्घैः प्रपूजितम् ॥ ८०नन्दीश्वरके पश्चिममें पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! स्वर्लीनसदृश शिलाक्षेश्वर नामक वह लिङ्ग नन्दीके पिताके द्वारा स्थापित किया गया है, जो देवसमुदायके द्वारा पूजित है॥ ७९-८०॥
अन्यत्तत्र तु विख्यातं हिरण्याक्षेश्वरं विभुम्।<br>हिरण्याक्षेण दैत्येन स्थापितं मम भक्तितः ॥ ८१<br><br>हिरण्याख्यस्य सामीप्ये अन्यैर्देवैः सहस्रशः।<br>स्थापितानि च लिङ्गानि भक्त्या चैव फलार्थिभिः ॥ ८२वहाँपर हिरण्याक्षदैत्यने मेरी भक्तिसे हिरण्याक्षेश्वर नामक अन्य प्रसिद्ध तथा सर्वव्यापी लिङ्गकी भी स्थापना की है। फलकी आकांक्षावाले अन्य देवताओंके द्वारा हिरण्याक्षेश्वरके समीपमें भक्तिपूर्वक हजारों लिङ्ग स्थापित किये गये हैं॥ ८१-८२॥
अन्यद्वै देवदेवस्य स्थितं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>तत्र स्थाने वरारोहे हिरण्याक्षस्य दक्षिणे ॥ ८३हे वरारोहे! उस स्थानपर हिरण्याक्षके दक्षिणमें देवदेव [शिव]-का अन्य पश्चिममुखवाला लिङ्ग भी बताया गया है॥ ८३॥
तेषां पश्चिमदिग्भागे अट्टहासं स्थितं शुभम्।<br>मुखं लिङ्गं तु तद्देवि पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥ ८४<br><br>प्रसन्नवदने देवि सर्वपातकनाशकम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि ऐशानं लोकमाप्नुयात् ॥ ८५उनके पश्चिम दिशाभागमें अट्टहास नामक शुभ लिङ्ग स्थित है। हे देवि! वह मुखलिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए विराजमान है, हे प्रसन्न मुखवाली देवि! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है; हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ८४-८५॥
अट्टहाससमीपेन पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मित्रावरुणनामानौ पूर्वद्वारे व्यवस्थितौ ॥ ८६<br><br>मित्रावरुणलोकस्तु तयोः सन्दर्शनाद्भवेत्।<br>अन्यत्तत्रैव विख्यातं वसिष्ठेशमिति स्थितम् ॥ ८७हे यशस्विनि! अट्टहासके समीप पश्चिममें पूर्वद्वारपर मित्रावरुण नामक दो लिङ्ग स्थित हैं; उन दोनोंके दर्शनसे मित्रावरुणलोक प्राप्त होता है। वहींपर वसिष्ठेश नामक अन्य प्रसिद्ध लिङ्ग भी विराजमान है॥ ८६-८७॥
स्थापितं तत्र तल्लिङ्गं याज्ञवल्क्येन वै पुरा।<br>चतुर्मुखं च तल्लिङ्गं सर्वपापक्षयकरम् ॥ ८८पूर्वकालमें [महर्षि] याज्ञवल्क्यने भी लिङ्गको स्थापित किया था; चार मुखोंवाला वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ८८॥
अन्यत्तत्रैव संलग्नं मैत्रेय्या स्थापितं शुभम्।<br>तेन दृष्टेन लभते परं ज्ञानं सुदुर्लभम् ॥ ८९वहींपर समीपमें मैत्रेयीके द्वारा स्थापित अन्य शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उसके दर्शनसे मनुष्य अति दुर्लभ परम ज्ञान प्राप्त करता है॥ ८९॥