भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

अध्याय १ ] अविमुक्तक्षेत्रकी महिमा और वहाँ स्थित लिङ्गायतनौंका वर्णन ७६९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
याज्ञवल्क्येश्वरस्यापि पश्चिमे पश्चिमाननम्।<br>प्रह्लादेश्वरनामानमद्वैतफलदायकम् ।<br>प्रह्लादेश्वरात् पुरतः स्वयँलीनं तु तिष्ठति॥ ९०<br><br>स्वर्लीनेश्वरनामानं सुमहाफलदायकम्।<br>ज्ञानविज्ञाननिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्॥ ९१याज्ञवल्क्येश्वरके भी पश्चिम भागमें पश्चिमकी ओर मुखवाला प्रह्लादेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; यह अद्वैत फल देनेवाला है। प्रह्लादेश्वरके सामने स्वयंलीन स्वर्लीनेश्वर नामक लिङ्ग विराजमान है; यह अत्यधिक फल प्रदान करनेवाला है। ज्ञान-विज्ञानमें निष्ठ तथा परम आनन्दकी अभिलाषा करनेवालोंकी जो गति होती है, वह गति स्वर्लीन [तीर्थ]-में मरनेवालेकी होती है॥ ९०-९१ १/२॥
या गतिर्विहिता तेषां स्वर्लीने तु मृतस्य च।<br>स्वर्लीनात् पुरतो लिङ्गं स्थितं पूर्वमुखं शुभम्॥ ९२स्वर्लीनके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला वैरोचनेश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थित है; यह दैत्य-पुत्रद्वारा स्थापित किया गया है॥ ९२ १/२॥
वैरोचनेश्वरं नाम स्थापितं दैत्यसूनुना।<br>तस्य चैवोत्तरे देवि लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्॥ ९३<br><br>बलिना स्थापितं तत्तु शिवालोकपरायणम्।<br>अन्यच्चैतत् स्थिरं लिङ्गं बाणेश्वर इति स्थितम्॥ ९४हे देवि! उसके उत्तरमें भी पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग बताया गया है; शिवालोक प्रदान करनेवाला वह [लिङ्ग] बलिके द्वारा स्थापित किया गया है। वहाँ बाणेश्वर नामक अन्य स्थिर लिङ्ग भी विराजमान है॥ ९३-९४॥
राक्षसी तु महाभीमा नाम्ना शालकटङ्कटा।<br>तया च स्थापितं भद्रे तस्य चोत्तरतः शुभम्॥ ९५हे भद्रे! शालकटंकटा नामक [एक] महाभयंकर राक्षसी थी, उसके द्वारा उस [बाणेश्वर]-के उत्तरमें शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ९५॥
अन्यदायतनं पुण्यं तस्मिन् स्थाने यशस्विनि।<br>हिरण्यगर्भं विख्यातं पुण्यं तस्यापि दर्शनम्॥ ९६हे यशस्विनि! हिरण्यगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य पुण्यप्रद आयतन [लिङ्ग] भी उस स्थानपर विद्यमान है; उसका भी दर्शन पुण्य प्रदान करनेवाला है॥ ९६॥
मोक्षेश्वरं तु तत्रैव स्वर्गेश्वरमतः परम्।<br>एतौ दृष्ट्वा सुरेशाने स्वर्गं मोक्षं च विन्दति॥ ९७हे सुरेशाने! इसके बाद वहींपर मोक्षेश्वर तथा स्वर्गेश्वर विद्यमान हैं; इनका दर्शन करके स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है॥ ९७॥
वासुकीश्वरनामानं तयोश्चोत्तरतः शुभम्।<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम्॥ ९८उन दोनोंके उत्तरमें वासुकीश्वर नामक चार मुखवाला शुभ लिङ्ग स्थित है; वह लिङ्ग समस्त कामनाओंका फल देनेवाला है॥ ९८॥
तस्यैव पूर्वखण्डे तु वासुकेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नातो वरारोहे रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ९९उसीके पूर्वभागमें वासुकिका उत्तम तीर्थ विद्यमान है; हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य रोगोंसे आक्रान्त नहीं होता है॥ ९९॥
तस्यैव च समीपे तु चन्द्रेण स्थापितं शुभम्।<br>चन्द्रेश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं विद्येश्वरं शुभम्॥ १००<br><br>लभेद्द्याधरं लोकं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १०१उसीके समीपमें चन्द्रमाके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। चन्द्रेश्वरके पूर्वमें विद्येश्वर नामक शुभ लिङ्ग विद्यमान है; उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य विद्याधरका लोक प्राप्त करता है॥ १००-१०१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णन' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥

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