श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २ ] मातृमण्डल और आकाशलिङ्गका वर्णन ७७१
| पञ्चमुद्रोवाच | पंचमुद्रा बोली— |
|---|---|
| तथा राज्यक्षमो बालस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>एवं श्रुत्वा तु तत्सर्वा मातरोऽभिमुखाभवन्॥ १४ | —यह बालक जिस भी तरह राज्य करनेमें समर्थ हो, वैसा तुम करो। यह सुनकर वे सभी माताएँ अभिमुख हुईं और बोलीं—'ऐसा ही होगा'—यह कहकर खेचरीसमुदाय प्रसन्न हो गया॥ १४ १/२ ॥ |
| एवं भविष्यतीत्युक्त्वा तुष्टो वै खेचरीगणः।<br>गच्छ पुत्र स्वयं राज्यं पालयस्व यथासुखम्॥ १५ | उन्होंने कहा—'हे पुत्र! अब जाओ और सुखपूर्वक अपने राज्यका पालन करो'॥ १५॥ |
| बालेन प्रार्थिताः सर्वाः प्रजाकामेन सुन्दरि।<br>यदाहं भविता चोर्व्यां सर्वलोकेषु पार्थिवः॥ १६<br>अवतारस्तदा कार्यो मद्भक्त्या परया तदा। | हे सुन्दरि! तब प्रजाकी कामनावाले बालकने सभी माताओंसे प्रार्थना की कि जब मैं पृथ्वीपर सभी लोकोंका राजा बनूँ, तब मेरी परम भक्तिसे आपलोग अवतार ग्रहण करें॥ १६ १/२ ॥ |
| एवं वै प्रार्थिताः सर्वा मातरो लोकमातरः॥ १७<br>अवतेरुर्यथायोगं कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्।<br>पञ्चमुद्रा तु बालं तमनयन्नगरं पुनः॥ १८ | इस प्रकार [उसके द्वारा] प्रार्थित सभी लोकमातृस्वरूपा मातृकाओंने समयानुसार कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको अवतार लिया। पंचमुद्रा उस बालकको पुनः नगरमें ले गयीं॥ १७-१८॥ |
| आगत्य च यथायोगमर्धरात्रे व्यवस्थितम्।<br>अवतेरुस्तदा हृष्टाः पञ्चमुद्रा विमातरः॥ १९ | वहाँ आ करके वे यथायोग अर्धरात्रिमैं व्यवस्थित हो गयीं। तब पंचमुद्रा तथा विमाताओंने प्रसन्न होकर अवतार लिया॥ १९॥ |
| बालेन पूजिताः सर्वाः प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>पूजां गृहीत्वा बालस्य आकाशं तु पुनर्गताः॥ २० | इसके बाद उस बालकने विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करके सभी माताओंकी पूजा की और बालककी पूजा ग्रहण करके वे पुनः आकाशमें चली गयीं॥ २०॥ |
| अद्यापि दृश्यते व्योम्नि मातृणां गणमण्डलम्।<br>निरीक्ष्यते पुण्यकर्मा उत्तराभिमुखं स्थितम्॥ २१ | मातृगणोंका समूहमण्डल आज भी आकाशमें देखा जाता है। पुण्यकर्मवाला व्यक्ति उत्तराभिमुखस्थित उस मण्डलको देख सकता है॥ २१॥ |
| यदेतद्दृश्यते व्योम्नि मातृणां तु समीपतः।<br>आकाशलिङ्गमित्युक्तमयं स्वर्लीन उच्यते॥ २२ | मातृकाओंके समीप आकाशमें जो यह देखा जाता है, उसे आकाशलिङ्ग कहा गया है; इसीको स्वर्लीन कहा जाता है॥ २२॥ |
| यथाकाशे तथा भूमौ एवं सर्वत्र दृश्यते।<br>एवमालोक्य तं सर्वं गगने मातृमण्डलम्॥ २३<br>मातृणां तु प्रभावेण नरो भवति सिद्धिभाक्। | जैसे यह आकाशमें वैसे ही पृथ्वीपर दिखायी पड़ता है; इस प्रकार यह सर्वत्र दिखायी देता है। इस तरह उस सम्पूर्ण मातृमण्डलको आकाशमें देखकर मनुष्य मातृगणोंके प्रभावसे सिद्धिका भागी हो जाता है॥ २३ १/२ ॥ |
| ततः प्रभृति देवेशि अस्मिन् क्षेत्रे व्यवस्थिता॥ २४<br>विपद्भियागता यस्माद्विकटा प्रोच्यते बुधैः।<br>बालो वीरत्वमापन्नो मत्प्रसादाद्यशस्विनि॥ २५<br>बालेन चाप्यहं देवि अस्मिन् देशे सुखोषितः॥ २६ | हे देवेशि! उसी समयसे वे देवी इस क्षेत्रमें विराजमान हो गयीं; वे विपत्तिके भयसे आयीं, अतः विद्वान् लोग उन्हें विकटा कहते हैं। हे यशस्विनि! वह बालक मेरी कृपासे वीरत्वसे युक्त हो गया और मैं भी बालकके साथ इस स्थानपर सुखपूर्वक रहने लगा॥ २४–२६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥