भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७७२श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

तीसरा अध्याय

सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
वायव्ये तु दिशाभागे तस्य पीठस्य सुन्दरि।<br>सगरेण पुरा देवि तस्मिन् देशे प्रतिष्ठितम्॥ १<br>चतुर्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्।हे सुन्दरि! हे देवि! उस पीठके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें उस स्थानपर पूर्वकालमें सगरके द्वारा चार मुखवाला लिङ्ग स्थापित किया गया है; वह लिङ्ग समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १<sup></sup>/<sub></sub>
तस्यैवोत्तरपूर्वेण नाम्ना वालीश्वरं शुभम्॥ २<br>वालिना स्थापितं लिङ्गं कपिना सुमहात्मना।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि तिर्यग्योनिं न गच्छति॥ ३उसीके उत्तर-पूर्वमें परम महात्मा कपि वालिके द्वारा वालीश्वर नामक शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य तिर्यक् (पशु-पक्षी)-योनि नहीं प्राप्त करता है॥ २-३॥
तस्य चोत्तरदिग्भागे सुग्रीवस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं तस्य शुभं भद्रे सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ४<br>तथा हनुमतात्रैव स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्।उसके उत्तर दिशाभागमें महात्मा सुग्रीवके द्वारा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है; हे भद्रे! वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है और यहींपर हनुमान्जीने भी उत्तम लिङ्गकी स्थापना की है॥ ४<sup></sup>/<sub></sub>
सगरात्पश्चिमेनैव लिङ्गं तत्र प्रतिष्ठितम्॥ ५<br>मम भक्त्या च सुश्रोणि अश्विभ्यां परमेश्वरि।हे सुश्रोणि! हे परमेश्वरि! वहींपर सगरेश्वरके पश्चिममें दोनों अश्विनीकुमारोंने भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गकी स्थापना की है॥ ५<sup></sup>/<sub></sub>
तस्यैवोत्तरपार्श्वे तु भद्रदोहमिति स्मृतम्॥ ६<br>गवां क्षीरेण सञ्जातं सर्वपातकनाशनम्।<br>कपिलानां सहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्।<br>तत्फलं लभते मर्त्यः स्नातस्तत्र न संशयः॥ ७उसीके उत्तरभागमें भद्रदोह [लिङ्ग] बताया गया है; गायोंके दुग्धसे निर्मित वह लिङ्ग सभी पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें स्नान किया हुआ मनुष्य हजार कपिला गायोंके दानका जो फल होता है, उस फलको प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६-७॥
पूर्वभाद्रपदायुकता पौर्णमासी यदा भवेत्।<br>तदा पुण्यतमः कालो ह्यश्वमेधफलप्रदः॥ ८पूर्वभाद्रपदसे युक्त पूर्णिमा जब हो, उस समयका पुण्यतम काल अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ८॥
ह्रदस्य पश्चिमे तीरे भद्रेश्वरमिति स्थितम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो भद्रे गोलोकं लभते ध्रुवम्॥ ९[उस] ह्रद (सरोवर)-के पश्चिम तटपर भद्रेश्वर [लिङ्ग] स्थित है; हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गोलोक प्राप्त करता है॥ ९॥
भद्रेश्वरस्य दिग्भागे नैर्ऋते तु यशस्विनि।<br>उपशान्तशिवं नाम ख्यातं सर्वसुरासुरैः॥ १०<br>उपशान्तस्य देवस्य उत्तरे वरवर्णिनि।<br>चक्रेश्वरमिति ख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ११<br>पश्चिमाभिमुखं देवि ह्रदस्तस्यैव चाग्रतः।<br>तस्मिन् ह्रदे नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्॥ १२<br>शिवलोकमवाप्नोति भावितेनान्तरात्मना।हे यशस्विनि! भद्रेश्वरके नैर्ऋत्य दिशाभागमें उपशान्तशिव नामक लिङ्ग बताया गया है। हे वरवर्णिनि! उपशान्तदेवके उत्तरमें सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत पश्चिमकी ओर मुखवाला चक्रेश्वरलिङ्ग कहा गया है। हे देवि! उसीके आगे [एक] सरोवर है; उस सरोवरमें स्नान करके तथा भक्तियुक्त मनसे महेश्वरकी पूजा करके मनुष्य शिवलोक प्राप्त करता है॥ १०-१२<sup></sup>/<sub></sub>
तस्य पश्चिमदिग्भागे शूलेश्वरमिति स्थितम्॥ १३उसके पश्चिम दिशाभागमें शूलेश्वरलिङ्ग विराजमान