श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ३ ] सगरेश्वर, भद्रेश्वर, शूलेश्वर, नारदेश्वर, वरणेश्वर तथा कोटीश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शूलयन्त्रं पुरा न्यस्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>ह्रदस्तत्र समुत्पन्नो देवदेवस्य चाग्रतः॥ १४<br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् दृष्ट्वा शूलेश्वरं प्रभुम्।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ १५ | है; पूर्वकालमें वहाँ शूलयन्त्र स्थापित किया गया है। हे वरवर्णिनि! वहाँ देवदेवके समक्ष स्नानके लिये ह्रद उत्पन्न हुआ है; उस ह्रदमें स्नान करके तथा भगवान् शूलेश्वरका दर्शनकर मनुष्य संसार-सागरका त्याग करके रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ १३-१५॥ |
| शूलेश्वरस्य पूर्वेण अन्यदायतनं शुभम्।<br>तप्तं तत्र तपस्तीव्रं नारदेन सुरर्षिणा॥ १६<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै नारदेश्वरम्॥ १७<br>संसारमाया या घोरा तां तरेन्नात्र संशयः।<br>नारदेशस्य पूर्वेण नाम्ना धर्मेश्वरं शुभम्॥ १८ | शूलेश्वरके पूर्वमें दूसरा शुभ आयतन (तीर्थ) स्थित है, देवर्षि नारदने वहाँ घोर तपस्या की थी। कुण्डके सामने मेरा [एक] शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। उस कुण्डमें स्नान करके नारदेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जो घोर संसारमाया है, उसे पार कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १६-१७ १/२॥ |
| स्थापितं मम लिङ्गं तु कुण्डस्य पुरतः शुभे।<br>वायव्ये तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि॥ १९<br>विनायकमिति ख्यातं कुण्डं तत्र शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव विनायकम्॥ २०<br>सर्वविघ्नविनिर्मुक्तो ह्यस्मिन् क्षेत्रे वसेच्चिरम्।<br>विनायकस्य संलग्न उत्तरेण यशस्विनि॥ २१ | हे शुभे! नारदेश्वरके पूर्वमें तथा कुण्डके सामने ही धर्मेश्वर नामक मेरा शुभ लिङ्ग स्थापित किया गया है। हे सुन्दरि! उन देवके वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशाभागमें विनायक बताये गये हैं, वहाँपर पवित्र जलवाला एक कुण्ड है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा विनायकका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर इस क्षेत्रमें चिरकालतक वास करता है॥ १८-२० १/२॥ |
| ह्रदस्तत्र सुविख्यातोऽमरको नाम नामतः।<br>दक्षिणेन तु कुण्डस्य मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ २२<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चामरकेश्वरम्।<br>अज्ञानाच्चैव यत्किञ्चिदिह क्षेत्रे तु यत्कृतम्॥ २३<br>विलयं याति तत्सर्वं दृष्ट्वा तल्लिङ्गमुत्तमम्।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे नातिदूरे यशस्विनि॥ २४ | हे यशस्विनि! विनायकके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँपर अति प्रसिद्ध ह्रद है और उस कुण्डके दक्षिणमें अमरक नामसे विख्यात मुखलिङ्ग स्थित है; उस कुण्डमें स्नान करके और उस उत्तम अमरकेश्वरलिङ्गका दर्शन करके [मनुष्यके द्वारा] इस क्षेत्रमें अज्ञानपूर्वक जो भी [पाप] किया गया रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २१-२३ १/२॥ |
| वरणायास्तटे शुद्धे लिङ्गं तत्रैव संस्थितम्।<br>वरणेश्वरं तु विख्यातं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ २५<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्ध अश्वपादो यशस्विनि।<br>अनेनैव शरीरेण शाश्वतीं सिद्धिमङ्गतः॥ २६ | हे यशस्विनि! उसके उत्तर दिशामें वहींपर समीपमें ही वरणाके पवित्र तटपर एक लिङ्ग स्थित है; वरणेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग पश्चिमाभिमुख स्थित है॥ २४-२५॥<br>हे यशस्विनि! अश्वपाद नामक सिद्ध पाशुपत उसमें इसी शरीरसे शाश्वत सिद्धिको प्राप्त हुए हैं॥ २६॥ |
| ममापि तत्र सान्निध्यं तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि गन्धर्वत्वं च विन्दति॥ २७ | हे यशस्विनि! वहाँ उस लिङ्गमें [सदा] मेरा भी सान्निध्य रहता है; हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे गन्धर्वत्वकी प्राप्ति होती है॥ २७॥ |
| तस्य पश्चिमदिग्भागे नाम्ना शैलेश्वरं शुभम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूर्वोक्तं लभते फलम्॥ २८ | हे देवि! उसके पश्चिम दिशाभागमें शैलेश्वर नामक शुभ लिङ्ग है; उसका दर्शन करके मनुष्य पूर्वोक्त [समस्त] फल प्राप्त करता है॥ २८॥ |