भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 776
७७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
दक्षिणे चापि तस्यैव कोटीश्वरमिति स्थितम्।<br>यत्र सा दृश्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ २९हे देवि! उसीके दक्षिणमें कोटीश्वर [नामक] लिङ्ग भी स्थित है, जहाँ वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका दिखायी देती हैं॥ २९॥
बीभत्सविकृते भीमे श्मशाने वसते सदा।<br>तेन सा प्रोच्यते देवि विश्रुता भीष्मचण्डिका॥ ३०हे देवि! वे सदा बीभत्स रूपवाले भयानक श्मशानमें वास करती हैं, इसलिये वे प्रसिद्ध भीष्मचण्डिका कही जाती हैं॥ ३०॥
कोटितीर्थेषु यः स्नात्वा कोटीश्वरमथार्चयेत्।<br>गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नरः॥ ३१कोटितीर्थोंमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करना चाहिये। हे सुन्दरि! मनुष्य करोड़ों गायोंके दानसे जो फल प्राप्त करता है, वह सम्पूर्ण फल उसे यहाँपर मात्र एक बार स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ ३१ १/२॥
तत्फलं सकलं तस्य स्नानेनैकेन सुन्दरि।<br>कोटीश्वरस्य पूर्वेण ऋषिभिश्चैः प्रतिष्ठितम्॥ ३२कोटीश्वरके पूर्वमें ऋषियोंके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है; उस लिङ्गके दर्शनसे चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् दृष्टिगत हो जाता है॥ ३२-३३॥
तेन लिङ्गेन दृष्टेन दृष्टं स्यात् सचराचरम्॥ ३३

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
कोटीश्वरस्य देवस्य आग्नेय्यां दिशि संस्थितः।<br>श्मशानस्तम्भसंज्ञेति विख्यातः सुप्रतिष्ठितः॥ १देवकोटीश्वरके आग्नेय दिशामें प्रसिद्ध तथा सुप्रतिष्ठित श्मशानस्तम्भ स्थित है। वहाँपर वे मनुष्य गिराये जाते हैं, जिन्होंने इस लोकमें बुरा कर्म किया है॥ १ १/२॥
मानवास्तत्र पात्यन्ते इह यैर्दुष्कृतं कृतम्।<br>यत्र स्तम्भे सदा देवि अहं तिष्ठामि भामिनि॥ २हे भामिनि! हे देवि! मैं उस स्तम्भमें सदा विराजमान हूँ। हे देवि! वहाँ जाकर जो मेरी पूजा करेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा और परम गति प्राप्त करेगा॥ २-३॥
तत्र गत्वा तु यः पूजां मम देवि करिष्यति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेच्च परमां गतिम्॥ ३
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि महातीर्थं यशस्विनि।<br>कपालमोचनं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ४हे यशस्विनि! अब मैं तुम्हें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध कपालमोचन नामक महातीर्थके विषयमें बताऊँगा॥ ४॥
कपालं पतितं तत्र स्नातस्य मम सुन्दरि।<br>तस्मिन् स्नातो वरारोहे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ५हे सुन्दरि! वहाँ स्नान करते हुए मेरा कपाल गिर पड़ा था; हे वरारोहे! उसमें स्नान करनेवाला ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ ५॥
कपालेश्वरनामानं तस्मिंस्तीर्थे व्यवस्थितम्।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दर्शनात्तस्य सुन्दरि॥ ६उस तीर्थमें कपालेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है; हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ६॥
तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे ऋणैर्मुक्त्तो भवेन्नरः॥ ७उसीके उत्तरमें पासमें ही त्रैलोक्यप्रसिद्ध एक तीर्थ है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्य [सभी] ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥