श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य [७७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋणमोचनकं नाम्ना विख्यातं भुवि सुन्दरि।<br>त्रीणि लिङ्गानि तिष्ठन्ति तत्रैव मम सुन्दरि॥ ८<br>तानि दृष्ट्वा तु सुश्रोणि नश्यति त्रिविधम् ऋणम्। | हे सुन्दरि! वह [तीर्थ] ऋणमोचन नामसे पृथ्वीलोकमें विख्यात है। हे सुन्दरि! वहींपर मेरे तीन लिङ्ग स्थित हैं; हे सुश्रोणि! उनका दर्शन करनेसे तीनों प्रकारके ऋण विनष्ट हो जाते हैं॥ ८ १/२॥ |
| दक्षिणे तु दिशाभागे तस्य तीर्थस्य सुन्दरि॥ ९<br>अङ्गारेश्वरनामानं मुखलिङ्गं व्यवस्थितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य पुरतः स्थितम्॥ १० | हे सुन्दरि! उस तीर्थके दक्षिण दिशाभागमें अंगारेश्वर नामक मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है॥ ९-१०॥ |
| अङ्गारेण यदा योगश्चतुर्थ्यामष्टमीषु वा।<br>तीर्थे तस्मिन्नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मङ्गलेश्वरम्॥ ११<br>व्याधिभिश्च विनिर्मुक्तो यत्र तत्राभिजायते। | जब अंगार [मंगल]-के साथ चतुर्थी अथवा अष्टमीका योग हो, तब उस तीर्थमें स्नान करके तथा मंगलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहे, व्याधियोंसे पूर्णतः मुक्त हो जाता है॥ ११ १/२॥ |
| तस्यैव च समीपस्थमुत्तरेण यशस्विनि॥ १२<br>लिङ्गं तु सुमहत् पुण्यं विश्वकर्मप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चिमाभिमुखं दृष्ट्वा सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात्॥ १३ | हे यशस्विनि! इसीके समीप उत्तर दिशामें विश्वकर्माके द्वारा स्थापित महापुण्यप्रद पश्चिमाभिमुख लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है॥ १२-१३॥ |
| बुधेश्वरं तु तत्रैव दृष्ट्वा भक्त्या दृढव्रतः।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति दृष्ट्वा देवं बुधेश्वरम्॥ १४ | वहींपर देव बुधेश्वरका भक्तिपूर्वक दर्शन करके दृढ व्रतवाला भक्त सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ १४॥ |
| बुधेश्वराद्दक्षिणतो लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्।<br>महामुण्डेश्वरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १५ | बुधेश्वरके दक्षिणमें सभी सिद्धियोंको देनेवाला महामुण्डेश्वर नामक चतुर्मुखलिङ्ग है॥ १५॥ |
| तस्य देवस्य पुरतः कूपस्तिष्ठति वै शुभः।<br>तस्य कूपस्य सा देवी उपरिष्टात् स्थिता शुभा॥ १६<br>स्नानार्थं तत्र सा क्षिप्ता माला मुण्डमयी मया।<br>तेन सम्प्रोच्यते देवि महामुण्डेति मानवैः॥ १७ | उन देवके समक्ष [एक] शुभ कूप विद्यमान है, उस कूपके ऊपर वे कल्याणमयी देवी विराजमान हैं। स्नानके लिये वहाँ मेरे द्वारा वह मुण्डमयी माला प्रक्षिप्त की गयी है, अतः हे देवि! मनुष्य उन्हें महामुण्डा कहते हैं॥ १६-१७॥ |
| खट्वाङ्गं तत्र वै क्षिप्तं स्नानार्थं वरवर्णिनि।<br>खट्वाङ्गेश्वर नाम्ना तु स्थितं तत्रैव सुव्रते॥ १८ | हे वरवर्णिनि! स्नानहेतु वहींपर खट्वांग भी प्रक्षिप्त किया गया है; हे सुव्रते! वहींपर खट्वांगेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है॥ १८॥ |
| भुवनेश्वरनाम्ना तु लिङ्गं देवि फलप्रदम्।<br>उत्तराभिमुखं लिङ्गं कुण्डाद्वै दक्षिणे तटे॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै भुवनेश्वरम्।<br>न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते॥ २० | हे देवि! वहाँ कुण्डके दक्षिण तटपर भुवनेश्वर नामक फलदायक लिङ्ग विराजमान है; वह लिङ्ग उत्तरकी ओर मुखवाला है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा भुवनेश्वरका दर्शन करके मनुष्य दुर्गति नहीं प्राप्त करता है और पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥ |
| दक्षिणे भुवनेशस्य कुण्डमन्यच्च तिष्ठति।<br>नाम्ना विमलमीशं च लिङ्गं तस्यैव पूर्वतः॥ २१ | भुवनेश्वरके दक्षिणमें एक अन्य कुण्ड भी स्थित है, उसीके पूर्वमें विमलेश नामक लिङ्ग है॥ २१॥ |
| वैमल्यं तु नरा यान्ति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे मोदते दिवि देवतैः॥ २२ | उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। हे वरारोहे! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दित रहता है॥ २२॥ |