भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 778
७७६श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट

| तस्मिन् पाशुपतः सिद्धस्त्र्यम्बको नाम वै मुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ २३ | उस स्थानपर त्र्यम्बक नामक सिद्ध पाशुपतमुनिने इसी शरीरसे रुद्रलोक प्राप्त किया था॥ २३॥ | | तस्याङ्गारककुण्डस्य पश्चिमेन यशस्विनि।<br>महदायतनं पुण्यं भृगुणा स्थापितं पुरा॥ २४<br>यस्तदायतनं दृष्ट्वा अर्चितं स्तुतिपूर्वकम्।<br>शिवलोकाच्च ते पुण्यान्न च्यवन्ति कदाचन॥ २५ | हे यशस्विनि! उस अंगारककुण्डके पश्चिममें पूर्व-कालमें महर्षि भृगुके द्वारा [एक] पुण्यप्रद विशाल आयतन (लिङ्ग) स्थापित किया गया है। उस लिङ्गका दर्शन करके जो लोग स्तुतिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं, वे पुण्यमय शिवलोकसे कभी च्युत नहीं होते हैं॥ २४-२५॥ | | दक्षिणेन तु तस्यैव अन्यदायतनं शुभम्।<br>नन्दीश्वरवरात्मानं देवानामपि दुर्लभम्॥ २६<br>तस्य दर्शनमात्रेण व्रतं पाशुपतं लभेत्।<br>तत्र सिद्धो महात्मा वै कपिलर्षिर्महातपाः॥ २७<br>त्रिकालमर्चयद्देवं गुहाशायी यतात्मवान्।<br>एवं वर्षसहस्रेण तस्य तुष्टोऽस्म्यहं प्रिये॥ २८<br>मम देवि प्रसादेन साङ्ख्यवेत्ता महायशाः।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्गुहा तत्रैव संस्थिता।<br>तां गुहां वीक्षते यो वै न स पापेन लिप्यते॥ २९ | उसीके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ नन्दीश्वर नामक अन्य शुभ लिङ्ग स्थित है; उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पाशुपतव्रत प्राप्त करता है। वहाँपर सिद्ध, महात्मा तथा महातपस्वी ऋषि कपिलने गुहामें रहकर जितेन्द्रिय होकर शिवजीकी त्रिकाल पूजा की थी, हे प्रिये! इस प्रकार एक हजार वर्षके अनन्तर मैं उनपर प्रसन्न हो गया और हे देवि! मेरी कृपासे वे महायशस्वी सांख्यवेत्ता हो गये। वहींपर कपिलेश्वरके नीचे [वह] गुहा स्थित है; जो उस गुहाका दर्शन करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता है॥ २६—२९॥ | | देव्युवाच<br>कपिलेश्वरं कथं देवमोङ्कारेश्वरसंज्ञितम्।<br>कथयस्व प्रसादेन देवदेव महेश्वर॥ ३० | देवी बोलीं—हे देवदेव! हे महेश्वर! देव कपिलेश्वर किस प्रकार ओंकारेश्वर नामवाले हुए? कृपापूर्वक इसे बताइये॥ ३०॥ | | ईश्वर उवाच<br>त्रीणि लिङ्गानि गुह्यानि वाराणस्यां मम प्रिये।<br>येषां चैव तु सान्निध्यं मम चैव सुरेश्वरि॥ ३१ | ईश्वर बोले—हे प्रिये! हे सुरेश्वरि! वाराणसीमें मेरे तीन गुह्य लिङ्ग हैं, जिनमें मेरा सदा सान्निध्य रहता है॥ ३१॥ | | एवं चान्यप्रकारेण ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>क्रमान्मात्रा समुद्दिष्टा नन्दीशस्य तु सुन्दरि॥ ३२ | हे सुन्दरि! इस प्रकार क्रमसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वररूप तीन मात्राएँ नन्दीश्वरकी कही गयी हैं॥ ३२॥ | | अकारे च स्थितो विष्णुः पञ्चायतनसंस्थितः।<br>उकारो ब्रह्मणो रूपं तस्य दक्षिणतः प्रिये॥ ३३ | पंचायतनमें विराजमान विष्णु अकारमें स्थित हैं और हे प्रिये! ब्रह्माका रूप उकार उनके दक्षिणमें है॥ ३३॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>तं च देवि तदोङ्कारं मम रूपं सुरेश्वरि॥ ३४<br>मानवानां हितार्थाय तत्र स्थाने स्थितो ह्यहम्।<br>मत्स्योदर्यास्तु कूलेऽहमुत्तरे चोत्तरे प्रिये॥ ३५ | मैं नन्दीशेश्वर नामसे उत्तरमें स्थित हूँ। हे देवि! हे सुरेश्वरि! वही ओंकार मेरा रूप है, मनुष्योंके कल्याणके लिये मैं उस स्थानपर विराजमान हूँ॥ ३४ १/२॥ | | नन्दीशेश्वरनामाहमुत्तरेण व्यवस्थितः।<br>नन्दीशं परमं ब्रह्म नन्दीशं परमा गतिः॥ ३६<br>नन्दीशं परमं स्थानं दुःखसंसारमोचनम्।<br>अप्रकाशयमिदं कान्ते तव स्नेहात् प्रकाशितम्॥ ३७ | हे प्रिये! मैं मत्स्योदरीके उत्तर तटपर उत्तर दिशामें नन्दीशेश्वर नामसे स्थित हूँ। नन्दीश परम ब्रह्म हैं, नन्दीश परम गति हैं, नन्दीश परम पद हैं और वे दुःखरूप सागरसे मुक्ति दिलानेवाले हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | अन्यथा गोपनीयं तु मम भक्तिविवर्जिते।<br>युगे सप्तदशे देवि कृत्वा चैकां वसुन्धराम्॥ ३८ | हे कान्ते! यह रहस्य [सर्वथा] अप्रकाश्य है, मैंने तुम्हारे स्नेहके कारण इसे बताया है, मेरी भक्तिसे रहित व्यक्तिसे इसे गुप्त रखना चाहिये। हे देवि! सत्रहवें युगमें |

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