भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 779, कुल 834 में से

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पृष्ठ 779

अध्याय ४ ] कपालमोचन, ऋणमोचन एवं कपिलेश्वर आदि तीर्थोंका माहात्म्य ७७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
संहारं तु तपः कृत्वा अस्मिन् देशे समागतः।<br>ओङ्कारमूर्तिमास्थाय त्रिभेदेन स्थितो ह्यहम्॥ ३९सम्पूर्ण पृथ्वीको एक करके (जलाप्लावित करके) तथा संहाररूप तप करके मैं इस स्थानपर आ गया और ओंकाररूप धारणकर तीन रूपोंमें स्थित हो गया हूँ॥ ३७-३९॥
सर्वेषामेव सिद्धानां तत् स्थानं परिकीर्तितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गं शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ ४०वह सभी सिद्धोंका स्थान कहा गया है। उस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव विराजमान हैं॥ ४०॥
पूर्वामुखं तु तं देवं सिद्धसङ्घैः प्रपूजितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवानामपि दुर्लभम्॥ ४१पूर्वकी ओर मुखवाला वह ओंकारेश्वर नामक लिङ्ग सिद्धोंके द्वारा पूजित है तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ४१॥
वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्ता योगे पाशुपते स्थिताः॥ ४२वहाँपर वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल पाशुपतयोगमें स्थित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ४२॥
अन्ये च ऋषयो देवा यक्षगन्धर्वगुह्यकाः।<br>युगे युगे गमिष्यन्ति तस्मिन् स्थाने स्थितः सदा॥ ४३अन्य ऋषि, देवता, यक्ष, गन्धर्व तथा गुह्यक युग-युगमें उस स्थानपर जायँगे, मैं सदा वहाँ स्थित रहूँगा।
दिव्या हि सा परा मूर्तिः कपिलेश्वरसंज्ञिता।<br>कदाचिदस्य देवस्य दर्शने जाह्नवी प्रिये॥ ४४कपिलेश्वर नामक वह मूर्ति परम दिव्य है॥ ४३<sup></sup>/<sub></sub><br>हे प्रिये! कभी-कभी इन प्रभुके दर्शनके लिये गंगा मत्स्योदरी स्थानपर आती हैं, वहाँ स्नान करना मोक्षदायक होता है॥ ४४<sup></sup>/<sub></sub>
मत्स्योदरीं समायाति तत्र स्नानं तु मोक्षदम्।<br>आराध्य कपिलेशं तु त्रैलोक्यपालनक्षमाः॥ ४५<br><br>भवन्ति पुरुषा देवि मम नित्यं च वल्लभाः।<br>ओङ्कारं तत्परं ब्रह्म सकलं निष्कलं स्थितम्॥ ४६हे देवि! कपिलेश्वरकी आराधना करके मनुष्य तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो जाते हैं और सदा मेरे प्रिय बने रहते हैं। वे ओंकारेश्वर परब्रह्म हैं और निष्कल होते हुए भी सकल (साकार)-रूपमें स्थित हैं॥ ४५-४६॥
रुद्रलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं परिकीर्तितम्।<br>कपिलेश्वरस्याधस्ताद्दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ४७<br><br>मत्स्योदरीं समेष्यन्ति तीर्थानि सह सागरैः।<br>षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च॥ ४८वह लिङ्ग रुद्रलोकका रहस्यमय द्वार कहा गया है। हे वरवर्णिनि! कपिलेश्वरके नीचे दक्षिणमें मत्स्योदरीमें साठ हजार करोड़ तथा साठ सौ करोड़ तीर्थ सभी सागरोंके साथ प्रत्येक पक्षकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथिको आते हैं॥ ४७-४८<sup></sup>/<sub></sub>
पक्षे पक्षे समेष्यन्ति चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>मत्स्योदर्यां यदा गङ्गा पश्चिमे कपिलेश्वरे॥ ४९<br><br>समायाति महादेवि स च योगः सुदुर्लभः।<br>तस्मिन् स्नानं महाभागे अश्वमेधसहस्रदम्॥ ५०हे महादेवि! जब कपिलेश्वरके पश्चिममें मत्स्योदरीमें गंगा आती हैं, तब वह योग परम दुर्लभ होता है, हे महाभागे! उसमें [किया गया] स्नान हजार अश्वमेधयज्ञका फल देनेवाला होता है॥ ४९-५०॥
तस्य लिङ्गस्य माहात्म्यं कपिलेशस्य कीर्तितम्।<br>न कस्यचिद्देयं च गोपनीयं प्रयत्नतः॥ ५१<br><br>तत्रैव अक्षरं ब्रह्म नादेयं परिकीर्तितम्॥ ५२[हे देवि!] उस कपिलेश्वरलिङ्गका माहात्म्य कह दिया गया। इसे जिस किसीको नहीं बताना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये, वहींपर नादेय अक्षर ब्रह्म कहा गया है॥ ५१-५२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे कपिलेश्वरमाहात्म्ये ओङ्कारनिर्णयो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'कपिलेश्वरमाहात्म्यमें ओंकारनिर्णय' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥

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