श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ७७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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पाँचवाँ अध्याय
कपिलेश्वरमें सिद्धि प्राप्त करनेवाले मुनियोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>तत्र स्थाने तु ये सिद्धास्तान् प्रवक्ष्याम्यहं पुनः।<br>महापाशुपता श्रेष्ठा मम पुत्रा महौजसः॥ १<br>अनन्यमनसः शुद्धाः सेवितोऽहं पुरा सदा। | ईश्वर बोले—[हे देवि!] उस स्थानमें जो सिद्ध हुए हैं, अब मैं उनके विषयमें बताऊँगा। महापाशुपत, श्रेष्ठ, महातेजस्वी, अनन्य चित्तवाले तथा विशुद्धात्मा मेरे पुत्र वहाँ रहते हैं, उन्होंने पूर्वकालमें सदा मेरी सेवा की थी॥ १ १/२॥ |
| शीतातपविनिर्मुक्तं प्रासादैरुपशोभितम्॥ २<br>कैलासपृष्ठे देवस्य यादृग्देवि गृहं शुभम्।<br>तदभ्यधिकरूपं तु कृत्वा देवस्य मन्दिरम्॥ ३<br>सेव्यते सिद्धतुल्यैस्तु सर्वसिद्धानुकम्पिभिः।<br>तदा सिद्धिरनुप्राप्ता निर्वाणाया गतिः पुरा॥ ४ | हे देवि! कैलासशिखरपर शीत-आतपसे रहित तथा महलोंसे सुशोभित भगवान् शिवका जैसा सुन्दर भवन है, उससे भी अधिक रूपवाला शिवमन्दिर बनाकर सिद्धतुल्य तथा सभी सिद्धोंपर अनुकम्पा करनेवालोंके द्वारा वह स्थान सेवित होता है, उस समय जो निर्वाणगति है, उन्होंने उस सिद्धिको प्राप्त किया॥ २–४॥ |
| कपिलेश्वरस्य चैवाग्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्मृतम्।<br>उद्दालक ऋषिस्तत्र सिद्धिं परमिकां गतः॥ ५ | कपिलेश्वरके आगे पश्चिमाभिमुख लिङ्ग बताया गया है, वहाँ ऋषि उद्दालक परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे॥ ५॥ |
| अन्यत् पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थितं तत्र तथोत्तरे।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धः पाराशर्यो महामुनिः॥ ६ | वहाँ उत्तर दिशामें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, उस लिङ्गमें महामुनि पाराशर्य (व्यास) पूर्ण रूपसे सिद्ध हुए॥ ६॥ |
| अन्यत्तत्रैव संलग्ने स्थितं पश्चान्मुखं शुभम्।<br>तस्मिन्नायतने सिद्धो महाज्ञानी हि बाष्कलिः॥ ७ | वहींपर समीपमें पश्चिमकी ओर मुखवाला दूसरा शुभ लिङ्ग विराजमान है, उस स्थानपर बाष्कलि [मुनि] सिद्ध तथा महाज्ञानी हुए॥ ७॥ |
| तस्यैव तु समीपस्थं स्थितं पूर्वामुखं प्रिये।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धो भाववृत्तस्तु वै मुनिः॥ ८ | हे प्रिये! उसीके समीपमें [अन्य] पूर्वमुख लिङ्ग स्थित है, वहाँ पशुपतिके भक्त मुनि भाववृत्त सिद्ध हुए॥ ८॥ |
| तस्यैव पश्चिमे देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति।<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्त अरुणिर्नाम नामतः॥ ९ | हे देवि! उसीके पश्चिममें मुखलिङ्ग स्थित है, वहाँ अरुणि नामवाले ऋषिने परम सिद्धि प्राप्त की॥ ९॥ |
| पश्चिमे अरुणीशस्य अन्यल्लिङ्गं तु तिष्ठति।<br>अस्मिन् पाशुपताचार्यो योगसिद्धो महामुनिः॥ १०<br>अन्यत्तत्रैव संलग्नं दक्षिणे लिङ्गमुत्तमम्।<br>तत्र सिद्धिं गतो देवि कौस्तुभो नाम वै ऋषिः॥ ११ | अरुणीशके पश्चिममें दूसरा लिङ्ग भी स्थित है, यहाँपर महामुनि पाशुपताचार्य योगमें सिद्ध हुए। वहींपर दक्षिण दिशामें समीपमें ही एक दूसरा उत्तम लिङ्ग विराजमान है, हे देवि! वहाँपर कौस्तुभ नामक ऋषिने सिद्धि प्राप्त की॥ १०-११॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्।<br>महापाशुपतः सिद्धः सावणिस्तत्र वै मुनिः॥ १२ | उसके दक्षिण भागमें पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, वहाँ महापाशुपत मुनि सावणि सिद्ध हुए॥ १२॥ |
| तस्याग्रे तु महल्लिङ्गं स्थितं पूर्वामुखं शुभम्।<br>अस्मिँल्लिङ्गे शिवः साक्षात् स्वयमेव व्यवस्थितः॥ १३ | उसके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला महान् तथा |