श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 781, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 781
अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७७९
| ओङ्कारमूर्तिमास्थाय स्थितोऽहं तत्र सुव्रते।<br>चत्वारो मुनयः सिद्धास्तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि॥ १४<br><br>वामदेवस्तु सावर्णिर्घोरः कपिलस्तथा।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धा नन्दीशस्य प्रभावतः॥ १५ | उत्तम लिङ्ग स्थित है। इस लिङ्गमें स्वयं साक्षात् शिव व्यवस्थित हैं, हे सुव्रते! मैं ओंकारमूर्ति धारण करके वहाँ स्थित हूँ। हे यशस्विनि! उस लिङ्गमें चार मुनि सिद्ध हुए हैं। वामदेव, सावर्णि, अघोर तथा कपिल उस लिङ्गमें नन्दीशके प्रभावसे सिद्ध हुए॥ १३-१५॥ |
| तस्य देवस्य चाधस्ताद्गुहा सिद्धैस्तु वन्दिता।<br>श्रीमुखी नाम सा ज्ञेया योगसिद्धैस्तु सेविता॥ १६ | उन प्रभुके नीचे सिद्धोंद्वारा वन्दित एक गुहा है, योगसिद्धोंके द्वारा सेवित उस गुहाको श्रीमुखी नामवाली जानना चाहिये॥ १६॥ |
| तत्र पाशुपताः श्रेष्ठा मम लिङ्गार्चने रताः।<br>तेषां चैव निवासार्थं सा गुहा निर्मिता मया॥ १७ | वहाँ श्रेष्ठ पाशुपत [भक्त] मेरे लिङ्गार्चनमें संलग्न रहते हैं, मैंने उन्हींके निवासके लिये उस गुहाका निर्माण किया है॥ १७॥ |
| तस्य द्वारे तु सुश्रोणि सिद्ध अघोरो महामुनिः।<br>अनेनैव शरीरेण रुद्रत्वं गतवान् मुनिः॥ १८ | हे सुश्रोणि! उसके द्वारपर महामुनि अघोर सिद्ध हुए हैं, वे मुनि इसी शरीरसे रुद्रत्वको प्राप्त हुए॥ १८॥ |
| तत्र गत्वा त्रिरात्रं तु क्षपयेदेकमानसः।<br>नरो वा यदि वा नारी संसारं न विशेत् पुनः॥ १९ | वहाँ जाकर कोई पुरुष अथवा स्त्री यदि एकाग्रचित्त होकर [उपवासपूर्वक] तीन रात व्यतीत करे, तो वह पुनः संसारमें प्रवेश नहीं करता है॥ १९॥ |
| अघोरेश्वरदेवस्य चोत्तरे कूपमुत्तमम्।<br>तस्योपस्पर्शनाद्देवि वाजपेयं च विन्दति॥ २० | अघोरेश्वरदेवके उत्तरमें एक उत्तम कूप स्थित है, हे देवि! उसमें स्नान करनेसे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है॥ २०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
छठा अध्याय
श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं वक्ष्ये वाराणस्यां सुरेश्वरि।<br>यत्र साक्षात्स्वयं भद्रे रममाणं तु सर्वदा॥ १ | हे सुरेश्वरि! हे भद्रे! अब मैं वाराणसीमें स्थित अन्य आयतनका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्वदा साक्षात् स्वयं मैं विहार करता हूँ॥ १॥ |
| मत्स्योदरीतटे रम्ये सुरसिद्धनमस्कृते।<br>रोचते मे सदा वासस्तस्मिन्नायतने शुभे॥ २ | मत्स्योदरीके मनोहर तटपर देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा नमस्कृत उस शुभ आयतनमें सदा निवास करना मुझे अच्छा लगता है॥ २॥ |
| स्थानानामेव सर्वेषामतिरम्यं मम प्रियम्।<br>यत्र पाशुपता देवि मम लिङ्गार्चने रताः॥ ३<br><br>मम पुत्रास्तु ते सर्वे ब्रह्मचर्येण संयुताः।<br>शान्ता दान्ता जितक्रोधा सिद्धास्तत्र न संशयः॥ ४ | हे देवि! वह सभी स्थानोंसे अधिक रम्य तथा मुझे [अत्यन्त] प्रिय है, जहाँ पशुपतिके भक्त मेरे लिङ्गार्चनमें रत रहते हैं। वहाँ ब्रह्मचर्यसे युक्त, शान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधपर विजय प्राप्त किये हुए वे मेरे सभी पुत्र सिद्ध हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३-४॥ |