श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ---|--- लोभादिविषयासक्तो नरकाच्च निवर्तते।<br>मम लिङ्गानि पुण्यानि पूजयति सदात्र यः॥ ५ | यहाँपर जो सदा मेरे पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करता है, वह लोभ आदि विषयोंमें आसक्त होनेपर भी नरकसे छूट जाता है॥ ५॥ तेषां मध्ये तु तत्रैव लिङ्गं वै पश्चिमामुखम्।<br>श्रीकण्ठनाम विख्यातं कपिलेश्वरदक्षिणे॥ ६<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्धः ऋतुध्वज इति स्मृतः।<br>मम चैव प्रसादेन योगैश्वर्यमवाप्नुयात्॥ ७ | उनके मध्यमें वहींपर कपिलेश्वरके दक्षिणमें श्रीकण्ठ नामसे विख्यात पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसमें पाशुपत ऋतुध्वज सिद्ध हुए हैं—ऐसा कहा गया है, और उन्होंने मेरी कृपासे योगैश्वर्य प्राप्त किया था॥ ६-७॥ तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पूर्वमुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु जाबालः सिद्धिं परमिकां गतः॥ ८ | हे भद्रे! उसीके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें [ऋषि] जाबाल परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ८॥ अपरं चैव लिङ्गं तु तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवाना मपि दुर्लभम्॥ ९<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो मुनिः कालिकवृक्षिकः।<br>सर्वेषामेव सिद्धानामुत्तमोत्तमसंस्थितः॥ १० | उसके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ ओंकारेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है, वहाँ मुनि कालिकवृक्षिक परम सिद्धिको प्राप्त हुए और सभी सिद्धोंमें श्रेष्ठतम हो गये॥ ९-१०॥ तस्यैव दक्षिणे भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो गार्ग्यश्च सुमहातपाः॥ ११ | हे भद्रे! उसीके दक्षिणमें पश्चिमकी ओर मुखवाला [एक] लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें परम तपस्वी गार्ग्य सिद्ध हुए हैं॥ ११॥ पञ्चायतनमेतं ते मया च कथितं शुभे।<br>न कस्यचिन्मयाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम्॥ १२ | हे शुभे! मैंने तुमसे इस पंचायतनका वर्णन किया, मैंने इस अत्यन्त अद्भुत रहस्यको किसीको भी नहीं बताया है॥ १२॥ पञ्चब्रह्मेति विख्यातमेतदद्यापि सुन्दरि।<br>एतस्मात्कारणाद्देवि पञ्चायतनमुच्यते॥ १३ | हे सुन्दरि! यह आज भी पंचब्रह्म नामसे विख्यात है, हे देवि! इसी कारणसे इसे पंचायतन कहा जाता है॥ १३॥ चतुराश्रमिणां पुण्यं यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं सकलं प्रोक्तं पञ्चायतनदर्शनात्॥ १४ | चारों आश्रमियोंके लिये जो भी पुण्यफल कहा गया है, वह समस्त फल पंचायतनका दर्शन करनेमात्रसे बताया गया है॥ १४॥ इदं पाशुपतं श्रेष्ठं मदीयव्रतचारिणाम्।<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां संसारभयनाशनम्॥ १५ | मेरा व्रत करनेवालोंके लिये यह श्रेष्ठ पाशुपतव्रत है और मोक्षकी इच्छावाले योगियोंके लिये संसारभयका नाश करनेवाला है॥ १५॥ नराणामल्पबुद्धीनां पापोपहतचेतसाम्।<br>भेषजं परमं प्रोक्तं पञ्चायतनमुत्तमम्॥ १६ | यह उत्तम पंचायतन अल्प बुद्धिवाले तथा पापसे नष्ट चित्तवाले मनुष्योंके लिये महान् औषध कहा गया है। तस्माद्यत्नं सदा कुर्यात्पञ्चायतनदर्शने।<br>पञ्चायतनसामीप्ये कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ १७ | अतः पंचायतनके दर्शनका सदा प्रयत्न करना चाहिये। हे सुन्दरि! पंचायतनके समीपमें एक कूप स्थित है, उस तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दीक्षाफलमवाप्नुयात्।<br>तस्मिन् दक्षिणदिग्भागे रुद्रवासः प्रकीर्तितः॥ १८ | कूपमें मार्जन-स्नान करके मनुष्य [शिव-] दीक्षाका फल