श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट ---|--- लोभादिविषयासक्तो नरकाच्च निवर्तते।<br>मम लिङ्गानि पुण्यानि पूजयति सदात्र यः॥ ५ | यहाँपर जो सदा मेरे पुण्यप्रद लिङ्गकी पूजा करता है, वह लोभ आदि विषयोंमें आसक्त होनेपर भी नरकसे छूट जाता है॥ ५॥ तेषां मध्ये तु तत्रैव लिङ्गं वै पश्चिमामुखम्।<br>श्रीकण्ठनाम विख्यातं कपिलेश्वरदक्षिणे॥ ६<br>तस्मिन् पाशुपतः सिद्धः ऋतुध्वज इति स्मृतः।<br>मम चैव प्रसादेन योगैश्वर्यमवाप्नुयात्॥ ७ | उनके मध्यमें वहींपर कपिलेश्वरके दक्षिणमें श्रीकण्ठ नामसे विख्यात पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, उसमें पाशुपत ऋतुध्वज सिद्ध हुए हैं—ऐसा कहा गया है, और उन्होंने मेरी कृपासे योगैश्वर्य प्राप्त किया था॥ ६-७॥ तस्यैव चाग्रतो भद्रे लिङ्गं पूर्वमुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु जाबालः सिद्धिं परमिकां गतः॥ ८ | हे भद्रे! उसीके आगे पूर्वकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें [ऋषि] जाबाल परम सिद्धिको प्राप्त हुए॥ ८॥ अपरं चैव लिङ्गं तु तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>ओङ्कारेश्वरनामानं देवाना मपि दुर्लभम्॥ ९<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो मुनिः कालिकवृक्षिकः।<br>सर्वेषामेव सिद्धानामुत्तमोत्तमसंस्थितः॥ १० | उसके दक्षिणमें देवताओंके लिये भी दुर्लभ ओंकारेश्वर नामक दूसरा लिङ्ग स्थित है, वहाँ मुनि कालिकवृक्षिक परम सिद्धिको प्राप्त हुए और सभी सिद्धोंमें श्रेष्ठतम हो गये॥ ९-१०॥ तस्यैव दक्षिणे भद्रे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु संसिद्धो गार्ग्यश्च सुमहातपाः॥ ११ | हे भद्रे! उसीके दक्षिणमें पश्चिमकी ओर मुखवाला [एक] लिङ्ग स्थित है, उस लिङ्गमें परम तपस्वी गार्ग्य सिद्ध हुए हैं॥ ११॥ पञ्चायतनमेतं ते मया च कथितं शुभे।<br>न कस्यचिन्मयाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम्॥ १२ | हे शुभे! मैंने तुमसे इस पंचायतनका वर्णन किया, मैंने इस अत्यन्त अद्भुत रहस्यको किसीको भी नहीं बताया है॥ १२॥ पञ्चब्रह्मेति विख्यातमेतदद्यापि सुन्दरि।<br>एतस्मात्कारणाद्देवि पञ्चायतनमुच्यते॥ १३ | हे सुन्दरि! यह आज भी पंचब्रह्म नामसे विख्यात है, हे देवि! इसी कारणसे इसे पंचायतन कहा जाता है॥ १३॥ चतुराश्रमिणां पुण्यं यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं सकलं प्रोक्तं पञ्चायतनदर्शनात्॥ १४ | चारों आश्रमियोंके लिये जो भी पुण्यफल कहा गया है, वह समस्त फल पंचायतनका दर्शन करनेमात्रसे बताया गया है॥ १४॥ इदं पाशुपतं श्रेष्ठं मदीयव्रतचारिणाम्।<br>योगिनां मोक्षलिप्सूनां संसारभयनाशनम्॥ १५ | मेरा व्रत करनेवालोंके लिये यह श्रेष्ठ पाशुपतव्रत है और मोक्षकी इच्छावाले योगियोंके लिये संसारभयका नाश करनेवाला है॥ १५॥ नराणामल्पबुद्धीनां पापोपहतचेतसाम्।<br>भेषजं परमं प्रोक्तं पञ्चायतनमुत्तमम्॥ १६ | यह उत्तम पंचायतन अल्प बुद्धिवाले तथा पापसे नष्ट चित्तवाले मनुष्योंके लिये महान् औषध कहा गया है। तस्माद्यत्नं सदा कुर्यात्पञ्चायतनदर्शने।<br>पञ्चायतनसामीप्ये कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ १७ | अतः पंचायतनके दर्शनका सदा प्रयत्न करना चाहिये। हे सुन्दरि! पंचायतनके समीपमें एक कूप स्थित है, उस तस्मिन् कूप उपस्पृश्य दीक्षाफलमवाप्नुयात्।<br>तस्मिन् दक्षिणदिग्भागे रुद्रवासः प्रकीर्तितः॥ १८ | कूपमें मार्जन-स्नान करके मनुष्य [शिव-] दीक्षाका फल
अध्याय ६ ] श्रीकण्ठ, ओंकारेश्वर और बृहस्पतीश्वर आदि लिङ्गोंकी महिमाका वर्णन ७८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्राप्त करता है। उसके दक्षिण दिशाभागमें रुद्रवास कहा गया है॥ १६-१८॥ | |
| रुद्रस्योत्तरपार्श्वे तु पञ्चायतनदक्षिणे।<br>तत्र कुण्डं महत् प्रोक्तं महापातकनाशनम्॥ १९<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा अभीष्टं फलमाप्नुयात्।<br>चतुर्दश्यां यदा योग आर्द्रानक्षत्रसंयुतः॥ २०<br>तदा पुण्यतमः कालस्तस्मिन् स्नाने महाफलम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रुद्रं च भामिनि॥ २१<br>यत्र तत्र मृतो देवि रुद्रलोकं तु गच्छति। | वहॉँपर रुद्रके उत्तरभागमें तथा पंचायतनके दक्षिणमें महापापोंका नाश करनेवाला एक विशाल कुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य अभीष्ट फल प्राप्त करता है। जब चतुर्दशी तिथिमें आर्द्रा नक्षत्रसे संयुक्त योग हो, तब पुण्यतम काल होता है, उस समय उस [कुण्ड]-में स्नान करनेसे महान् फल होता है। हे भामिनि! हे देवि! उस तीर्थमें स्नान करके तथा रुद्रका दर्शन करके जहाँ कहीं भी मनुष्य मरता है, [तत्काल] रुद्रलोकको जाता है॥ १९-२१ १/२॥ |
| पूर्वामुखस्थितश्चाहं तस्मिँल्लिङ्गे महेश्वरि॥ २२<br>रुद्राणां कोटिजप्येन यत्फलं प्रतिपद्यते।<br>तत्फलं लभते भद्रे तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ २३ | हे महेश्वरि! मैं उस लिङ्गमें पूर्वकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ। हे भद्रे! करोड़ों रुद्रोंका जप करनेसे जो फल होता है, वह फल उस लिङ्गके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है॥ २२-२३॥ |
| रुद्रस्य च समीपे तु ऋषिभिः स्थापितानि च।<br>लिङ्गानि मम सुश्रोणि सर्वकामफलानि च॥ २४<br>रुद्रस्य नैर्ऋते भागे महालयमिति स्मृतम्।<br>दर्शनाच्च पदं तस्य महाभाग्यस्य सुन्दरि॥ २५ | हे सुश्रोणि! रुद्रके समीपमें समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाले [अनेक] लिङ्ग ऋषियोंके द्वारा स्थापित किये गये हैं। रुद्रके नैर्ऋत्य दिशामें महालय बताया गया है, हे सुन्दरि! उसके दर्शनसे महाभाग्यका पद प्राप्त होता है॥ २४-२५॥ |
| तत्र स्थाने शुभे रम्ये स्वयं तिष्ठति पार्वती।<br>तस्यैव चाग्रतो देवि कूपस्तिष्ठति निर्मलम्॥ २६<br>पितरस्तत्र तिष्ठन्ति ये दिव्या ये च मानुषाः।<br>तस्मिन् कूप उपस्पृश्य जलं सङ्गृह्य भामिनि॥ २७ | उस शुभ तथा रम्य स्थानपर स्वयं पार्वती विराजमान हैं। हे देवि! उसीके आगे निर्मल कूप स्थित है। जो दिव्य तथा मानुष पितर हैं, वे वहाँ रहते हैं। हे भामिनि! हे देवि! मेरे लोककी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि उस कूपमें स्नान करके जल लेकर वहाँ पिण्डदान करे॥ २६-२७ १/२॥ |
| पिण्डस्तत्र प्रदातव्यो मम देवि पदस्पृहः।<br>श्राद्धं तत्र प्रकुर्वीत अन्नाद्येनोदकेन च॥ २८<br>पिण्डः कूपे तु तत्रैव प्रेक्षप्तव्यः शुभानने।<br>एवं कृत्वा तु यस्तस्मिंस्तीर्थे रुद्रमहाालये॥ २९<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोकं स गच्छति।<br>तत्र वैतरणी नाम दीर्घिका पश्चिमामुखी॥ ३०<br>तस्यां स्नात्वा वरारोहे नरकं न च पश्यति। | हे शुभानने! अन्न आदिसे तथा उस जलसे श्राद्ध करना चाहिये और वहींपर कूपमें पिण्डको छोड़ देना चाहिये। जो उस रुद्रमहालय तीर्थमें इस प्रकारसे [श्राद्ध] करता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकको जाता है। वहाँपर पश्चिमकी ओर मुखवाली वैतरणी नामक दीर्घिका (बावली) है, हे वरारोहे! उसमें स्नान करके मनुष्यको नरक नहीं देखना पड़ता है॥ २८-३० १/२॥ |
| खण्डस्फुटितसंस्कारं यस्तत्र कुरुते शुभे॥ ३१<br>रुद्रलोकोऽक्षयस्तस्य सर्वकालं यशस्विनि।<br>महाालयस्योत्तरेण लिङ्गानि सुमहन्ति च॥ ३२ | हे शुभे! हे यशस्विनि! जो वहाँपर खण्डस्फुटित-संस्कार करता है, उसे सदाके लिये अक्षय रुद्रलोक प्राप्त होता है। महालयके उत्तरमें अति महान् लिङ्ग विद्यमान |
७- कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ७८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| देवैः सर्वैर्महाभागैः स्थापितानि शुभार्थिभिः। | हैं, जो मंगलकी कामनावाले सभी महाभाग्यशाली देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये हैं॥ ३१-३२१/२॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे रुद्रकुण्डस्य भामिनि॥ ३३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं शुभ्रं देवाचार्य प्रतिष्ठितम्।<br>बृहस्पतीश्वरं नाम सर्वदुःखविनाशनम्॥ ३४ | हे भामिनि! वहाँ रुद्रकुण्डके पश्चिम दिशाभागमें एक शुभ्र लिङ्ग स्थित है, सभी दुःखोंका नाश करनेवाला बृहस्पतीश्वर नामक वह लिङ्ग देवताओंके आचार्य (बृहस्पति)-के द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३३-३४॥ |
| पितृभिः स्थापितं लिङ्गं तटे कूपस्य दक्षिणे।<br>तेन पूजितमात्रेण पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः॥ ३५ | कूपके दक्षिण तटपर पितरोंके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है, उसके पूजनमात्रसे पितर तृप्त हो जाते हैं॥ ३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
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| अन्यदायतनं श्रेष्ठं कालिपुर्य्यां सुरेश्वरि।<br>दक्षिणेन स्थितं देवं रुद्रवासस्य सुन्दरि॥ १<br><br>कामेश्वरमिति ख्यातं सर्वकामफलप्रदम्। | —हे सुरेश्वरि! हे सुन्दरि! कालिपुरीमें रुद्रवासके दक्षिणमें दूसरा श्रेष्ठ आयतन भी स्थित है, कामेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १ १/२ ॥ |
| तप्तं तत्र तपस्तीव्रं कामदेवेन वै पुरा॥ २<br><br>कुण्डं तदुद्भवं देवि पद्मोत्पलसमन्वितम्।<br>कुण्डस्यैव तटे रम्ये उत्तमे वरवर्णिनि॥ ३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं दिव्यं पश्चिमाभिमुखं प्रिये।<br>गन्धधूपनमस्कारैर्मुखवाद्यैश्च सर्वशः॥ ४<br><br>यो मामर्चयते तत्र तस्य तुष्याम्यहं सदा।<br>तुष्टे तु मयि देवेशि सर्वान् कामाँल्लभेत सः॥ ५ | पूर्वकालमें वहाँ कामदेवने घोर तपस्या की थी, इससे हे देवि! कमलोंसे युक्त एक कुण्ड वहाँ उत्पन्न हो गया। हे वरवर्णिनि! हे प्रिये! वहाँ कुण्डके ही रम्य तथा उत्तम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला दिव्य लिङ्ग स्थित है। वहाँपर जो [व्यक्ति] गन्ध, धूप, नमस्कार तथा मुखवादनके द्वारा विधिवत् मेरा अर्चन करता है, उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ, हे देवेशि! मेरे प्रसन्न हो जानेपर वह सभी इच्छित फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ २—५॥ |
| ततः प्रभृति वै तस्मिन्नन्येऽपि सुरपुङ्गवाः।<br>आराधयन्तो मां तस्मिंस्तीर्थं वक्तुं महातपाः॥ ६ | उसी समयसे दूसरे श्रेष्ठ देवता भी उस लिङ्गमें मेरी आराधना करते हुए वहाँ निवास करते हैं, महान् तपस्वी भी उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ६॥ |
| यस्य यस्य यदा कामस्तत्र तं तं ददाम्यहम्।<br>ददामि सर्वकामांश्च धर्मं मोक्षं तथैव च॥ ७ | जिस किसीकी भी जो कामना होती है, मैं उस कामनाको पूर्ण करता हूँ। मैं सभी कामनाओं, धर्म तथा मोक्षको प्रदान करता हूँ॥ ७॥ |
| अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्मादन्येऽपि ये केचित्तीर्थे तस्मिन् जनाः स्थिताः।<br>आराधयन्ते देवेशं कामेशं चैव सर्वदा॥ ८ | अतः अन्य जो कोई भी लोग उस तीर्थमें रहते हैं, वे देवेश कामेश्वरकी सदा आराधना करते हैं॥ ८॥ |
| यो यस्य मनसः कामः तं तमाप्नोति निश्चितम्।<br>कामेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ ९<br>तत्र स्नात्वा वरारोहे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे त्रयोदश्यां तु मानवाः॥ १०<br>स्नानं ये च प्रकुर्वन्ति ते कामसदृशा नराः। | उस समय जिसकी जो भी कामना होती है, वह [व्यक्ति] उस-उस कामनाको निश्चित रूपसे प्राप्त करता है। हे वरवर्णिनि! कामेश्वरके समीपमें दक्षिणमें जो कुण्ड है, हे वरारोहे! चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको उसमें स्नान करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। जो मनुष्य उसमें स्नान करते हैं, वे कामदेवके समान हो जाते हैं॥ ९-१०१/२॥ |
| कामेश्वरं सदा लिङ्गं योऽर्चयतीह मानवः॥ ११<br>लभेद्विद्याधरं लोकमेवमेव न संशयः। | जो मनुष्य यहाँपर कामेश्वरलिङ्गकी सदा पूजा करता है, वह विद्याधरलोक प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १११/२॥ |
| कामेश्वरस्य पूर्वेण नाम्ना पञ्चालकेश्वरम्॥ १२<br>धनदस्य तु पुत्रेण पूजितोऽहं सुरेश्वरि।<br>क्षेत्रं मम प्रियं ज्ञात्वा तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १३<br>आराधयति मां नित्यं मम पूजारतः सदा।<br>पञ्चालेश्वरनामाहं तस्मिन् देशे व्यवस्थितः॥ १४<br>नराणां धनदानं तु करिष्यामि यशस्विनि। | कामेश्वरके पूर्वमें पंचालकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे सुरेश्वरि! मैं वहाँ धनद (कुबेर)-के पुत्रके द्वारा पूजित हूँ। मेरा प्रिय क्षेत्र जानकर वह उस देशमें स्थित रहकर प्रतिदिन मेरी आराधना करता है और सदा मेरी पूजामें संलग्न रहता है। हे यशस्विनि! मैं उस स्थानमें पंचालश्वर नामसे स्थित हूँ और मनुष्योंको धनका दान करता हूँ॥ १२-१४१/२॥ |
| तत्र पूर्वमुखं देवि मुखलिङ्गं तु तिष्ठति॥ १५<br>पञ्चकेशवरनामाहं तत्र देवि प्रतिष्ठितः।<br>कूपस्तस्यैव चाग्रे तु पावनः सर्वदेहिनाम्॥ १६ | हे देवि! वहाँ पूर्वकी ओर मुखवाला मुखलिङ्ग विराजमान है, हे देवि! मैं वहाँ पंचकेश्वर नामसे स्थित हूँ। उसीके आगे सभी देहधारियोंको पवित्र करनेवाला एक कूप स्थित है॥ १५-१६॥ |
| तस्मिन् स्थाने स्थिता देवि अघोरेशेति नामतः।<br>मानवानां हितार्थाय स्वयं तत्र व्यवस्थिता॥ १७<br>नव लिङ्गानि गुह्यानि स्थापितानि तु किन्नरैः।<br>पञ्चकेशवरपूर्वेण दिवाकरनिशाकरौ॥ १८ | हे देवि! उस स्थानपर अघोरेशा—इस नामसे भगवती स्थित हैं, वे मनुष्योंके कल्याणके लिये वहाँ स्वयं विराजमान हैं। वहाँ किन्नरोंके द्वारा नौ गुह्य लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। पंचकेश्वरके पूर्वमें सूर्य-चन्द्रलिङ्ग स्थित हैं॥ १७-१८॥ |
| लिङ्गानि तानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।<br>दक्षिणेन तु तस्यैव अन्धकेशेति नामतः॥ १९<br>तत्र लिङ्गं महत्पुण्यमन्धकेन प्रतिष्ठितम्।<br>मम चैव प्रसादेन गतोऽसौ परमां गतिम्॥ २० | वे लिङ्ग पुण्यप्रद तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। वहाँपर उसीके दक्षिणमें अन्धकेश—इस नामवाला महापुण्यप्रद लिङ्ग है, यह अन्धकके द्वारा स्थापित किया गया है, मेरी कृपासे वह [अन्धक] वहाँ परम गतिको प्राप्त हुआ था॥ १९-२०॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि।<br>नाम्ना देवेश्वरं लिङ्गं कामकुण्डस्य दक्षिणे॥ २१<br>अहमेव सदा भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः।<br>भीष्मेश्वरं तु तत्रैव सिद्धेश्वरमतः परम्॥ २२ | हे सुन्दरि! उस देवके पश्चिम दिशाभागमें तथा कामकुण्डके दक्षिणमें देवेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! मैं ही उस स्थानपर सदा विराजमान हूँ। वहींपर भीष्मेश्वर तथा सिद्धेश्वर स्थित हैं॥ २१-२२॥ |
| गङ्गेश्वरं तु तत्रैव यमुनेश्वरमेव च।<br>मण्डलेश्वरं तु तत्रैव उर्वशीलिङ्गमुत्तमम्॥ २३ | वहींपर गंगेश्वर तथा यमुनेश्वर हैं। वहींपर |
| ७८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मण्डलेश्वर तथा उत्तम उर्वशीलिङ्ग विद्यमान हैं॥ २३ ॥ | |
| अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः ।<br>तानि दृष्ट्वा तु मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २४ | [हे देवि!] वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २४॥ |
| मण्डलेश्वरसामीप्ये मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>शान्तेन स्थापितं लिङ्गं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २५ | मण्डलेश्वरके समीपमें मुखलिङ्ग स्थित है, सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग 'शान्त' के द्वारा स्थापित किया गया है॥ २५॥ |
| वायव्ये तु दिशाभागे द्रोणेश्वरसमीपतः ।<br>वालखिल्येश्वरं नाम सुखदं सर्वदेहिनाम् ॥ २६ | वायव्य दिशाभागमें द्रोणेश्वरके समीप वालखिल्येश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी प्राणियोंको सुख देनेवाला है॥ २६॥ |
| तच्च पश्चान्मुखं लिङ्गं कामकुण्डस्य पश्चिमे ।<br>वालखिल्येश्वरं दृष्ट्वा सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७<br><br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>वाल्मीकेश्वरनामानं तं च दृष्ट्वा न शोचति ॥ २८ | कामकुण्डके पश्चिममें स्थित वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, वालखिल्येश्वरका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। हे भद्रे! उसीके आगे वाल्मीकेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है, उसका दर्शन करके मनुष्य शोकयुक्त नहीं होता है॥ २७-२८॥ |
| तस्यैव कामकुण्डस्य पुरा संस्थापितं तटे ।<br>लिङ्गं तत्र महापुण्यं च्यवनेन प्रतिष्ठितम् ॥ २९<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण ज्ञानवान् जायते नरः । | उसी कामकुण्डके तटपर पूर्वकालमें [महर्षि] च्यवनके द्वारा स्थापित किया गया महापुण्यप्रद लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है॥ २९ १/२॥ |
| वालखिल्येश्वरस्यैव दक्षिणे वरवर्णिनि ॥ ३०<br><br>नाम्ना वातेश्वरं देवं सर्वपातकनाशनम् ।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वायुलोकं च गच्छति ॥ ३१ | हे वरवर्णिनि! वालखिल्येश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वातेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वायुलोकको जाता है॥ ३०-३१॥ |
| अग्नीश्वरं तु तत्रैव भरतेशं तथैव च ।<br>वरुणेशं तथा चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३२<br><br>एतान् दृष्ट्वा महादेवि यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ।<br>अन्यदायतनं पुण्यं सनकेन प्रतिष्ठितम् ॥ ३३<br><br>सनकेश्वरनामानं सर्वसिद्धामरार्चितम् ।<br>तेन दृष्टेन देवेशि राजसूयफलं लभेत् ॥ ३४ | वहींपर अग्नीश्वर, भरतेश तथा सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला वरुणेश—ये लिङ्ग स्थित हैं, हे महादेवि! इनका दर्शन करके मनुष्य अभीष्ट गति प्राप्त करता है। वहाँ दूसरा पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित है, जो [महामुनि] सनकके द्वारा स्थापित किया गया है, सनकेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंके द्वारा पूजित है। हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ३२-३४॥ |
| धर्मेश्वरं तु तत्रैव दक्षिणे वरवर्णिनि ।<br>नाम्ना धर्मेश्वरं देवं सर्वकामफलप्रदम् ॥ ३५ | हे वरवर्णिनि! वहींपर दक्षिण दिशामें धर्मेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह धर्मेश्वरलिङ्ग सभी वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है। |
| अन्यत्तत्रैव लिङ्गं तु ऋषिभिः स्थापितं पुरा ।<br>सनकेश्वरस्योत्तरतो नाम्ना गरुडकेश्वरम् ॥ ३६<br><br>सिद्धिकामेन सुश्रोणि स्थापितं गरुडेन तु ।<br>गरुडेश्वरस्य पुरतः स्थापितं ब्रह्मसूनुना ॥ ३७ | वहींपर पूर्वकालमें ऋषियोंके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग भी स्थित है। हे सुश्रोणि! सनकेश्वरके उत्तरमें गरुडकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो सिद्धिकी इच्छावाले गरुडके द्वारा |
| अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८५ |
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| स्थापित किया गया है॥ ३५-३६१/२॥ | |
| भक्त्या सनत्कुमारेण स्थापितोऽहं वरानने।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३८ | गरुडेश्वरके सामने एक लिङ्ग स्थित है, हे वरानने! ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारने भक्तिपूर्वक [वहाँ] मुझे स्थापित किया था, हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३७-३८॥ |
| तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे सनन्देन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्यते सिद्धिरुत्तमा॥ ३९ | उसीके उत्तरभागमें [मुनि] सनन्दके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है॥ ३९॥ |
| तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे स्थापितं ह्यासुरिश्वरम्।<br>तथैव पञ्चशिखिना स्थापितं च महात्मना॥ ४० | उसीके दक्षिण भागमें आसुरीश्वर लिङ्ग स्थापित है, वह महात्मा पंचशिखिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ४०॥ |
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>शनैश्चरेण तत्रैव मुखलिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ४१<br><br>शनैश्चरेश्वरं नाम सर्वलोकनमसकृतम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ४२ | वहींपर उसके दक्षिणभागमें समीपमें ही शनैश्चरके द्वारा स्थापित किया गया मुखलिङ्ग स्थित है, वह शनैश्चरेश्वर नामक लिङ्ग सभी लोकोंद्वारा नमस्कृत है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रोगोंसे पीड़ित नहीं होता है॥ ४१-४२॥ |
| अन्यच्चैव महापुण्यं काशीपुर्यां महाशये।<br>मार्कण्डेयस्तु विख्यातो मम चैव सदा प्रियः॥ ४३ | हे महाशये! काशीपुरीमें अन्य महापुण्यप्रद लिङ्ग भी है, वह मार्कण्डेय नामसे विख्यात है और सर्वदा मेरा प्रिय है॥ ४३॥ |
| तस्य लिङ्गस्य चाग्रे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मार्कण्डेयह्रदो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ ४४<br><br>मार्कण्डेयह्रदे स्नात्वा किं भूयः परिशोचति।<br>स्नानं दानं जपो होमः श्राद्धं च पितृतर्पणम्॥ ४५<br><br>तत्सर्वमक्षयं तत्र भवतीति न संशयः।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव चतुर्मुखम्॥ ४६<br><br>रुद्रलोकः सदा तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः। | हे यशस्विनि! उस लिङ्गके आगे पश्चिममें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मार्कण्डेयह्रद (कुण्ड) है, मार्कण्डेयह्रदमें स्नान करके मनुष्य किसी प्रकारके शोकसे सन्तप्त नहीं रहता है। वहाँ किया गया स्नान, दान, जप, होम, श्राद्ध तथा पितृतर्पण—सब कुछ अक्षय होता है, इसमें सन्देह नहीं है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा चतुर्मुखका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले रुद्रलोकको जाता है॥ ४४-४६१/२॥ |
| मार्कण्डेश्वरसामीप्ये उत्तरेण यशस्विनि॥ ४७<br><br>कूपो वै तिष्ठते तत्र सर्वतीर्थवरोऽनघे।<br>कूपस्य चोत्तरेणैव कुण्डमध्ये यशस्विनि॥ ४८<br><br>कुण्डेश्वरमिति ख्यातं सर्वसिद्धैस्तु वन्दितम्। | हे यशस्विनि! हे अनघे! मार्कण्डेश्वरके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एक कूप विद्यमान है। हे यशस्विनि! कूपके उत्तरमें ही कुण्डके मध्यमें सभी सिद्धोंसे वन्दित कुण्डेश्वर—इस नामसे विख्यात लिङ्ग स्थित है॥ ४७-४८१/२॥ |
| दीक्षां पाशुपतीं तीर्त्वा द्वादशाक्षरेण यत्फलम्॥ ४९<br><br>तत्फलं लभते देवि ब्राह्मणस्तु न संशयः।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५०<br><br>स्कन्देन स्थापितं देवि ब्रह्मलोकगतिप्रदम्।<br>मार्कण्डेयस्य पूर्वेण नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ५१ | हे देवि! द्वादशाक्षरके द्वारा पाशुपत दीक्षा प्राप्त करके ब्राह्मण जो फल पाता है, उस फलको उसके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। कुण्डके पश्चिम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह [लिङ्ग] स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है, वह ब्रह्मलोककी गति प्रदान |
| ७८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| करनेवाला है॥ ४९-५० १/२॥ | |
| शाण्डिल्येश्वरनामानं स्थितं तत्रैव सुन्दरि।<br>मुखलिङ्गं तु तं भद्रे पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ ५२ | मार्कण्डेयके पूर्व समीपमें ही शाण्डिलेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे सुन्दरि! वहींपर मुखलिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित है॥ ५१-५२॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि पशुपाशैः प्रमुच्यते।<br>अस्यैव दक्षिणे पार्श्वे नाम्ना भद्रेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>तत्र पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थापितं च ब्रह्मर्षिभिः।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ब्राह्मण्यं लभते नरः॥ ५४<br>अन्यच्चैव महादेवि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः। | हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है। इसीके दक्षिण भागमें भद्रेश्वर नामक लिङ्ग कहा गया है, पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग ब्रह्मर्षियोंके द्वारा स्थापित किया गया है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य ब्राह्मण्य प्राप्त करता है। हे महादेवि! अब मैं क्रमसे अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा॥ ५३-५४ १/२॥ |
| यो वै पूर्वं मया तुभ्यं कपालीशः प्रवर्तितः॥ ५५<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गानि कथयाम्यहम्।<br>तत्र देवी स्वयं देवी श्रीर्वै तिष्ठति सर्वदा॥ ५६ | मैंने पूर्वमें आपसे जिस कपालीशके विषयमें बताया था, उसके दक्षिण दिशाभागमें स्थित लिङ्गोंको मैं बता रहा हूँ। हे देवि! वहाँपर स्वयं भगवती श्री सर्वदा विराजमान हैं॥ ५५-५६॥ |
| श्रीकुण्डमिति विख्यातं तत्र कुण्डे वरानने।<br>तस्मिन् कुण्डेश्वरी देवी वरदा सर्वदेहिनाम्॥ ५७ | हे वरानने! वहाँ श्रीकुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें सभी प्राणियोंको वर देनेवाली कुण्डेश्वरी देवी विराजमान हैं॥ ५७॥ |
| तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवीं महाश्रियम्।<br>श्रिया न रहितः सो वै यत्र तत्राभिजायते॥ ५८ | उस कुण्डमें स्नान करके तथा देवी महालक्ष्मीका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहता है, लक्ष्मीसे विहीन नहीं होता है॥ ५८॥ |
| श्रियश्चोत्तरपार्श्वे तु कपालीशस्य दक्षिणे।<br>तत्र लिङ्गं महाभागे महालक्ष्म्या प्रतिष्ठितम्॥ ५९ | हे महाभागे! उस श्रीके उत्तरभागमें तथा कपालीशके दक्षिणमें महालक्ष्मीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ५९॥ |
| पूर्वाभिमुखोऽहं तस्मिन् कुण्डस्यैव तु दक्षिणे।<br>स्नात्वा कुण्डे तु वै देवि तल्लिङ्गं ह्यर्चयिष्यति॥ ६०<br>नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफलं शृणु।<br>चामरासक्तहस्ताभिः स्त्रीभिः परिवृतः सदा॥ ६१<br>तिष्ठते सुविमानस्थो यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>इह लोके यदा याति लक्ष्मीवान् रूपसंयुतः॥ ६२<br>धनधान्यसमायुक्तः कुले महति जायते।<br>स्वर्गलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं देवनिर्मितम्॥ ६३ | मैं कुण्डके दक्षिणमें पूर्वाभिमुख होकर स्थित हूँ। हे देवि! उस कुण्डमें स्नान करके यदि कोई पुरुष या स्त्री उस लिङ्गका अर्चन करेगा, तो उसके पुण्यफलको सुनो, वह प्रलयपर्यन्त हाथोंमें चँवर धारण की हुई स्त्रियोंसे सदा घिरा हुआ रहकर उत्तम विमानमें स्थित रहता है और जब इस लोकमें जन्म लेता है, तब लक्ष्मीवान्, रूपवान् तथा धनधान्यसे युक्त होकर महान् कुलमें उत्पन्न होता है। वह [कुण्ड] स्वर्गलोकका देवनिर्मित रहस्यमय द्वार है॥ ६०-६३॥ |
| यदा मत्स्योदरीं यान्ति देवलोकादिवौकसः।<br>तदा तेनैव मार्गेण स्त्रीभिः परिवृतः सुखम्॥ ६४<br>तेन सा प्रोच्यते देवि महाश्रीर्वरवर्णिनि।<br>एतत्तुभ्यं मया देवि रहस्यं परिकीर्तितम्॥ ६५ | जब देवतालोग देवलोकसे मत्स्योदरीमें जाते हैं, तब उसी मार्गसे वह मनुष्य स्त्रियोंसे घिरा हुआ सुखपूर्वक प्रवेश करता है। हे देवि! हे वरवर्णिनि! इसीलिये वे महाश्री कही जाती हैं। हे देवि! मैंने यह |
अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन । ७८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रहस्य आपको बता दिया॥ ६४-६५॥ | |
| तस्य विष्णुध्रुवस्यैव पश्चिमाया दिशः स्थितम्।<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु दधीचेन महर्षिणा॥ ६६<br><br>दधीचेश्वरनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि ऐश्वरं लोकमाप्नुयात्॥ ६७ | उसी विष्णुध्रुवके पश्चिम दिशामें महर्षि दधीचिके द्वारा स्थापित किया गया मेरा लिङ्ग स्थित है। वह लिङ्ग सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा दधीचेश्वर नामसे कहा गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईश्वरका लोक प्राप्त करता है॥ ६६-६७॥ |
| दक्षिणे तु तदा तत्र गायत्र्या स्थापितं पुरा।<br>गायत्र्या दक्षिणे चैव सावित्र्या स्थापितं पुनः॥ ६८<br><br>एतौ पश्चान्मुखौ लिङ्गौ मम देवि प्रियौ सदा।<br>अस्य चैव तु पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ६९ | उसके दक्षिणमें पूर्वकालमें गायत्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है और गायत्रीके दक्षिणमें सावित्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है। हे देवि! ये दोनों लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाले हैं तथा मेरे सर्वदा प्रिय हैं। इसके पूर्वमें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ६८-६९॥ |
| मत्स्योदरीतटे रम्ये स्थितं सत्पतयेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि उत्तमां सिद्धिमवाप्नुयात्॥ ७० | यह सत्पतयेश्वर नामक लिङ्ग मत्स्योदरीके रम्य तटपर स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम सिद्धि प्राप्त करता है॥ ७०॥ |
| लक्ष्मीलिङ्गस्य देवेन लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>उग्रेश्वरे महत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ७१<br><br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि भवेज्जातिस्मरो नरः।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि महत्कुण्डं व्यवस्थितम्॥ ७२ | लक्ष्मीलिङ्गके पास देवताके द्वारा पश्चिमकी ओर मुखवाला उग्रेश्वर नामक महापुण्यप्रद तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला लिङ्ग स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी स्मृतिवाला) हो जाता है॥ ७१ १/२॥ |
| स्नात्वा कनखले यद्वत्पुण्यमुक्तं यशस्विनि।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा फलमाप्नोति तत्समम्॥ ७३ | हे देवि! उसीके दक्षिणमें एक विशाल कुण्ड स्थित है, हे यशस्विनि! कनखलमें स्नान करनेसे जो पुण्य कहा गया है, मनुष्य उस कुण्डमें स्नान करके उसके समान फल प्राप्त कर लेता है॥ ७२-७३॥ |
| दधीचेशात्पश्चिमतो नाम्ना तु धनदेश्वरम्।<br>यत्र देवि तपस्तप्तं धनदेन महात्मना॥ ७४<br><br>तत्र कुण्डं महादेवि धनदेशस्य धीमतः।<br>तत्र स्नात्वा नरो देवि धनदेशं च पश्यति॥ ७५<br><br>तस्य तुष्टः कुबेरस्तु देवत्वं सम्प्रयच्छति।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि सुरासुरैः॥ ७६ | हे देवि! दधीचेश्वरके पश्चिममें धनदेश्वर नामक लिङ्ग है, जहाँ महात्मा धनदने तपस्या की थी। हे महादेवि! वहाँपर बुद्धिमान् धनदेश्वरका कुण्ड स्थित है, हे देवि! जो मनुष्य उसमें स्नान करके धनदेश्वरका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर कुबेर उसे देवत्व प्रदान करते हैं॥ ७४-७५ १/२॥ |
| तानि दृष्ट्वातिपुण्यानि स्वर्गलोकं व्रजेन्नरः।<br>धनदेशात् पश्चिमतो नाम्ना तु करवीरकम्॥ ७७<br><br>तेन दृष्टेन देवेशि सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>पुण्यानि तत्र लिङ्गानि स्थितानि परमेश्वरि॥ ७८ | [हे देवि!] वहाँपर देवताओं तथा असुरोंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उन महापुण्यप्रद लिङ्गोंका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। हे देवेशि! धनदेश्वरके पश्चिममें करवीरक नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। हे परमेश्वरि! वहाँ [अन्य] पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित हैं॥ ७६-७८॥ |
| तस्य वायव्यकोणे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>मारीचेश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम्॥ ७९ | उस [करवीरक]-के वायव्यकोणमें पश्चिमकी |
| ७८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओर मुखवाला मारीचेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ७९ ॥ | |
| तस्य चैवाग्रतो देवि स्थापितं कुण्डमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या भ्राजते भास्करो यथा॥ ८० | हे देवि! उसके आगे एक उत्तम कुण्ड स्थापित किया गया है, उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सूर्यके समान दीप्तिमान् हो जाता है॥ ८०॥ |
| मारीचेशात्पश्चिमतो लिङ्गमिन्द्रेश्वरं महत्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य तटसंस्थितम्॥ ८१ | मारीचेश्वरके पश्चिममें इन्द्रेश्वर नामक महान् लिङ्ग है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके तटपर स्थित है॥ ८१॥ |
| इन्द्रेश्वराद्दक्षिणतो वापी कर्कोटकस्य च।<br>तत्र वीरजले स्नात्वा दृष्ट्वा कर्कोटकेश्वरम्॥ ८२<br>नागानां चाधिपत्यं तु जायते नात्र संशयः।<br>कर्कोट्काद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८३ | इन्द्रेश्वरके दक्षिणमें कर्कोटककी वापी है, उस वीरजलमें स्नान करके तथा कर्कोटकेश्वरका दर्शन करके [मनुष्यको] नागोंका आधिपत्य प्राप्त हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं है॥ ८२१/२॥ |
| दृगिचण्डेश्वरं नाम ब्रह्महत्यापहारकम्।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धः कौथुमिर्नाम नामतः॥ ८४<br>ज्ञानं पाशुपतं प्राप्य रुद्रलोकमितो गतः।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्योत्तरतः स्थितम्॥ ८५ | कर्कोटकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला दृगिचण्डेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वहाँपर पाशुपत कौथुमि नामवाले ऋषि सिद्धिको प्राप्त हुए और पाशुपत ज्ञान प्राप्त करके यहाँसे रुद्रलोकको गये॥ ८३-८४१/२॥ |
| तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृगिचण्डेश्वरस्य तु।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ ८६<br>तस्य पूर्वेण देवेशि दीर्घिकायास्तटे शुभे।<br>अग्नीश्वरं तु नामानं सर्वपापक्षयङ्करम्॥ ८७ | पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके उत्तरमें स्थित है, वहाँपर दृगिचण्डेश्वरके कुण्डमें स्नान करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ ८५-८६॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि अग्निलोकं तु गच्छति।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे नाम्ना ह्याम्नातकेश्वरम्॥ ८८ | हे देवेशि! उसके पूर्वमें कुण्डके उत्तम तटपर सभी पापोंका नाश करनेवाला अग्नीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अग्निलोकको जाता है॥ ८७१/२॥ |
| तं दृष्ट्वा मनुजो भद्रे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>एकलिङ्गं तु तद्विद्यात् सूक्ष्मं च वरवर्णिनि॥ ८९ | उसीके पूर्व दिशाभागमें आम्नातकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। हे वरवर्णिनि! उसे सूक्ष्म एकलिङ्ग जानना चाहिये॥ ८८-८९॥ |
| तस्यैवाम्नातकेशस्य दक्षिणे नातिदूरतः।<br>कुण्डं तदुद्भवं दिव्यं सुरलोकप्रदायकम्॥ ९० | उसी आम्नातकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही देवलोककी प्राप्ति करानेवाला दिव्य कुण्ड स्थित है॥ ९०॥ |
| उर्वशीश्वरनामानं स्थितं पश्चान्मुखं भुवि।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि गणत्वं लभते ध्रुवम्॥ ९१ | वहाँ पश्चिमकी ओर मुखवाला उर्वशीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गणत्व प्राप्त करता है॥ ९१॥ |
| कुण्डस्य नैर्ऋते भागे नातिदूरे कथञ्चन।<br>उर्वशीशसमीपे तु तालकर्णेश्वरं स्मृतम्॥ ९२<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि चण्डस्यैति सलोकताम्।<br>तस्यैव तु समीपे तु लिङ्गानि स्थापितानि च॥ ९३ | कुण्डके नैर्ऋत्यभागमें समीपमें ही उर्वशीश्वरके पासमें तालकर्णेश्वरलिङ्ग बताया गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य चण्डका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ९२१/२॥ |
| अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन | ७८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गणैस्तु मम धर्मज्ञैः श्रेष्ठानि सुमहन्ति च।<br>तस्य पूर्वेण कूपस्तु तिष्ठते सुमहान् प्रिये॥ ९४<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृश्य पूतो भवति मानवः।<br>चण्डेश्वरस्य पूर्वं तु स्थितं चित्रेश्वरं शुभम्॥ ९५ | [हे देवि!] उसीके समीपमें मेरे धर्मज्ञ गणोंके द्वारा श्रेष्ठ तथा अति महान् लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। हे प्रिये! उसके पूर्वमें एक अति महान् कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ ९३-९४ १/२॥<br>चण्डेश्वरके पूर्वमें शुभ चित्रेश्वरलिङ्ग स्थित है, |
| तेन दृष्टेन देवेशि चित्रस्य समतां व्रजेत्।<br>चित्रेश्वरसमीपे तु स्थितं कालेश्वरं महत्॥ ९६<br>तेन दृष्टेन देवेशि कालं वञ्चति मानवः॥ ९७ | हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य चित्रकी समता प्राप्त करता है। चित्रेश्वरके समीपमें महान् कालेश्वरलिङ्ग स्थित है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य कालको भी वंचित कर देता है॥ ९५-९७॥ |
| देव्युवाच<br>कथं कालेश्वरो देवः केन वा वञ्चितः प्रभुः।<br>कस्मिन् स्थाने तु कः सिद्धस्तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर॥ ९८ | देवी बोलीं—हे सुरेश्वर! प्रभु कालेश्वरदेव किस प्रकार तथा किसके द्वारा वंचित किये गये और किस स्थानपर कौन सिद्ध हुआ? इसे मुझे बताइये॥ ९८॥ |
| ईश्वर उवाच<br>तस्मिन् स्थाने पुरा भद्रे पिङ्गाक्षो नाम वै मुनिः।<br>ज्ञानस्य वक्ता पञ्चार्थे लोके पाशुपतः स्थितः॥ ९९ | ईश्वर बोले—हे भद्रे! पूर्वकालमें उस स्थानमें पंचभूतात्मक लोकमें ज्ञानके वक्ता पशुपतिभक्त पिंगाक्ष नामक मुनि रहते थे॥ ९९॥ |
| तेन चैव पुरा भद्रे लिङ्गेऽस्मिन् स प्रसादितः।<br>ततो लिङ्गप्रभावेण कालं वञ्चितवान् मुनिः॥ १०० | हे भद्रे! उन्होंने ही पूर्वकालमें इस लिङ्गमें शिवको प्रसन्न किया था, इसीलिये उन मुनिने लिङ्गके प्रभावसे कालको वंचित किया॥ १००॥ |
| नान्ततो दृश्यते काल ईश्वररासक्तचेतसः।<br>तत्र स्थित्वा तु सुमहत्कालं यः कालयेत्प्रजाः॥ १०१<br>न तस्य क्रमितुं शक्तः कालो वै घोररूपिणः। | ईश्वरमें आसक्त चित्तवालेको अन्ततक काल दृष्टिगत नहीं होता है। [हे देवि!] वहाँ सन्तानसहित रहकर जो दीर्घकालतक समय व्यतीत करता है, घोररूपी काल उसपर आक्रमण करनेमें समर्थ नहीं होता है॥ १०१ १/२॥ |
| ततः प्रभृति येऽन्येऽपि तस्मिन्नायतने स्थिताः॥ १०२<br>तेषां नाक्रमते कालः वर्षलक्षायुतैरपि।<br>अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि रहस्यं वरवर्णिनि॥ १०३ | उसी समयसे जो अन्य लोग भी उस आयतनमें स्थित रहते हैं, लाखों वर्षोंमें भी काल उनपर आक्रमण नहीं कर सकता है। हे वरवर्णिनि! मैं आपको दूसरा रहस्य भी बताऊँगा॥ १०२-१०३॥ |
| तस्य देवस्य चाग्रे तु कूपस्तिष्ठति वै श्रुतः।<br>तत्र कालोदकं नाम उदकं देवि तिष्ठति॥ १०४<br>तस्यैव प्राशनाद्देवि पूतो भवति मानवः।<br>यैस्तु तत्रोदकं पीतं नरैः स्त्रीभिश्च कर्मभिः॥ १०५<br>स्वयं देवेन शर्वेण त्रिशूलाङ्केन चाङ्कितः।<br>न तेषां परिवर्तों वै कल्पकोटिशतैरपि॥ १०६ | उस लिङ्गके आगे एक प्रसिद्ध कूप स्थित है, हे देवि! वहाँपर कालोदक नामक उदक स्थित है, हे देवि! उसके प्राशन (पान)-से मनुष्य पवित्र हो जाता है। जिन पुरुषों तथा स्त्रियोंने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे उस जलका पान कर लिया, उन्हें मानो स्वयं भगवान् शिवने त्रिशूलांकसे अंकित कर दिया, सैकड़ों-करोड़ कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। उसका पान करके मनुष्य भवबन्धनसे होनेवाले भयसे मुक्त हो जाते हैं॥ १०४-१०६ १/२॥ |
| यत्पीत्वा भवबन्धोत्थभयं मुञ्चन्ति मानवाः।<br>एतद्देवि रहस्यं तु कालोदकमुदाहृतम्॥ १०७ | हे देवि! मैंने इस रहस्यमय कालोदकका वर्णन |
| ७९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| दर्शनात्तस्य देवस्य महापातकिनोऽपि ये।<br>तेऽपि भोगान् समश्नन्ति न तेषां क्रमते भवः॥ १०८ | कर दिया। [हे देवि!] जो महापातकी हैं, वे भी उस देवके दर्शनसे सुखोंको प्राप्त करते हैं और संसार उनपर आक्रमण नहीं करता है॥ १०७-१०८॥ | | तल्लिङ्गं सर्वलिङ्गानामुत्तमं परिकीर्तितम्।<br>दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य रुद्रत्वं याति मानवः॥ १०९ | वह लिङ्ग सभी लिङ्गोंमें श्रेष्ठ कहा गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य रुद्रत्व प्राप्त करता है॥ १०९॥ | | तत्र वापि हि यद्दत्तं दानं रुद्ररतात्मनाम्।<br>तद्वै महाफलं तेषां यच्छते भावितात्मनाम्॥ ११० | वहाँपर जो भी दान किया जाता है, वह उन भक्तिमय चित्तवालों तथा रुद्रमें रत मनवालोंको महाफल प्रदान करता है॥ ११०॥ | | खण्डस्फुटितसंस्कारं तत्र कुर्वन्ति ये नराः।<br>रुद्रलोकं समासाद्य मोदन्ते सुखिनः सदा॥ १११ | जो मनुष्य वहाँपर खण्डस्फुटित संस्कार करते हैं, वे रुद्रलोक प्राप्त करके सदा आनन्दित तथा सुखी रहते हैं॥ १११॥ | | सिद्धलिङ्गाश्रमं भग्नं दृष्ट्वा राज्ञे निवेदयेत्।<br>स्वतो वा परतो वापि ये कुर्वन्ति यथा तथा॥ ११२ | जो सिद्धलिङ्गाश्रमको भग्न देखकर [उसके उद्धारके लिये] राजासे निवेदन करता है और जो लोग स्वयं अथवा दूसरोंके माध्यमसे इसे व्यवस्थित करते हैं, वे मनुष्य सुखोंके भागी होते हैं और अन्तमें मोक्षके भाजन होते हैं॥ ११२१/२॥ | | ते भोगानां नराः पात्रमन्ते मोक्षस्य भाजनाः।<br>मोक्षप्रदायिनं लिङ्गं यत्कार्यार्थस्य लिप्सया॥ ११३<br><br>राजप्रतिग्रहासक्ताः कृतघ्नान् पूजयन्ति ये।<br>ते रुद्रशापनिर्दग्धाः पतन्ति नरके ध्रुवम्॥ ११४ | राजप्रतिग्रहमें निरत जो लोग अपने स्वार्थकी अभिलाषासे मोक्ष प्रदान करनेवाले लिङ्गका पूजन-सत्कार आदि नहीं करते हैं, अपितु कृतघ्नोंका सम्मान करते हैं, वे रुद्रके शापसे दग्ध होकर निश्चित रूपसे नरकमें पड़ते हैं॥ ११३-११४॥ | | ये पुनः सिद्धलिङ्गानां प्रासादानां स्वशक्तितः।<br>कुर्वन्ति पूजां सत्कारं ते मुक्ता नात्र संशयः॥ ११५ | जो लोग अपने सामर्थ्यके अनुसार सिद्धलिङ्गोंके प्रासादोंका पूजन तथा सत्कार करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ११५॥ | | कालेश्वरे तु यो देवि नरः कारयते पुरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ११६ | हे देवि! जो मनुष्य कालेश्वरमें पुरका निर्माण कराता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंसहित रुद्रलोकमें दीर्घकालतक वास करता है॥ ११६॥ | | तत्र पूजा जपो होमः कालेशे क्रियते हि यत्।<br>तत्र दीपप्रदानेन ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः॥ ११७<br><br>प्राप्नोति धूपदानेन तत्स्थानं रुद्रसेवितम्।<br>जागरं ये प्रकुर्वन्ति कालेशस्यैव चाग्रतः॥ ११८ | वहाँ कालेश्वरमें जो भी पूजन, जप, होम किया जाता है, वह फलदायक होता है। वहाँ दीपदान करनेसे मनुष्य ज्ञानचक्षु हो जाता है और धूपदानसे रुद्रसेवित स्थान प्राप्त करता है॥ ११७१/२॥ | | ते मृता वृषभारूढाः शूलहस्तास्त्रिलोचनाः।<br>भूत्वा रुद्रसमा भद्रे रुद्रलोकं तु ते गताः॥ ११९ | जो लोग कालेश्वरके समक्ष [रात्रि] जागरण करते हैं, हे भद्रे! वे मरनेपर वृषभपर आरूढ होकर हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए तीन नेत्रोंसे युक्त हो रुद्रतुल्य होकर रुद्रलोकको जाते हैं॥ ११८-११९॥ | | बहुनात्र किमुक्तेन कालेशे देवि यत्कृतम्।<br>तत्सर्वमक्षयं देवि पुनर्जन्मनि जन्मनि॥ १२० | हे देवि! अधिक कहनेसे क्या लाभ, हे देवि! कालेश्वरमें जो भी किया जाता है, वह सब कुछ जन्म-जन्ममें अक्षय होता है॥ १२०॥ |
अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन ७९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतत्ते सर्वमाख्यातं भूयो विस्तरतो मया।<br>न कस्यचिदिहाख्यातं गोपनीयं प्रयत्नतः॥ १२१ | मैंने यह सब विस्तारसे आपसे कह दिया, मैंने इसे किसीको भी नहीं बताया था, आपको इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये॥ १२१॥ |
| कालेश्वरस्य देवस्य शिवस्यायतनं शुभम्।<br>कालेश्वरसमीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि॥ १२२<br>मृत्युना स्थापितं लिङ्गं सर्वरोगविनाशनम्।<br>कूपस्य चोत्तरे भागे महालिङ्गानि सुव्रते॥ १२३ | यह कालेश्वर देव शिवका आयतन [अत्यन्त] शुभ है। हे वरवर्णिनि! कालेश्वरके समीप दक्षिण दिशामें मृत्युके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग विद्यमान है, वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला है॥ १२२१/२॥ |
| एकं दक्षेश्वरं नाम द्वितीयं कश्यपेश्वरम्।<br>पश्चान्मुखं तु यल्लिङ्गं तद्दक्षेश्वरसंज्ञकम्॥ १२४ | हे सुव्रते! कूपके उत्तरभागमें [अनेक] महालिङ्ग स्थित हैं। उनमें एक दक्षेश्वर तथा दूसरा कश्यपेश्वर नामक लिङ्ग है। जो पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग है, वह दक्षेश्वर नामवाला है॥ १२३-१२४॥ |
| दक्षेश्वरस्य पूर्वेण महाकालस्तु तिष्ठति।<br>कुण्डे स्नानं नरः कृत्वा महाकालं तु योऽर्चयेत्॥ १२५<br>अर्चितं तेन सुश्रोणि जगदेतच्चराचरम्।<br>दक्षिणस्यां दिशि तथा तस्य कुण्डस्य वै तटे॥ १२६ | दक्षेश्वरके पूर्वमें महाकाल स्थित हैं। हे सुश्रोणि! जो मनुष्य कुण्डमें स्नान करके महाकालका अर्चन करता है, उसने मानो इस चराचर जगत्का पूजन कर लिया॥ १२५१/२॥ |
| स्थापितं देवलिङ्गं तु अन्तकेन महात्मना।<br>महत्फलमवाप्नोति तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्॥ १२७ | उसके दक्षिण दिशामें तथा कुण्डके तटपर ही महात्मा अन्तकके द्वारा देवलिङ्ग स्थापित किया गया है, उस लिङ्गके दर्शनसे मनुष्य महान् फल प्राप्त करता है॥ १२६-१२७॥ |
| अन्तकेश्वरसामीप्ये लिङ्गं वै दक्षिणे स्थितम्।<br>शक्रेश्वरेति नामानं स्थापितं शक्रहस्तिना॥ १२८ | अन्तकेश्वरके समीप दक्षिणमें शक्रेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह शक्रहस्तीके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२८॥ |
| तस्यैव दक्षिणे भागे मातलीश्वरमुत्तमम्।<br>संस्थापितं मातलिना सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ १२९ | उसीके दक्षिण भागमें उत्तम मातलीश्वर [नामक] लिङ्ग है, सभी प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला वह लिङ्ग मातलिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १२९॥ |
| देवस्य चाग्रतः कुण्डे तत्र तीर्थं वरानने।<br>हस्तिपालेश्वरस्याग्रे कुण्डे तिष्ठति भामिनि॥ १३०<br>तप्तं यत्र पुरा भद्रे अन्तकेनान्तकारिणा।<br>हस्तीश्वरस्य पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ १३१<br>विजयेश्वरनामानं सुरसिद्धैस्तु पूजितम्।<br>महाकालस्य कुण्डं तु उत्तरे वरवर्णिनि॥ १३२ | हे वरानने! वहाँपर देवके आगे कुण्डमें एक तीर्थ विद्यमान है, हे भामिनि! हस्तिपालेश्वरके आगे कुण्डमें वह स्थित है, जहाँ हे भद्रे! अन्त (मृत्यु) करनेवाले अन्तकके द्वारा पूर्वकालमें तप किया गया था। हस्तीश्वरके पूर्वमें देवताओं तथा सिद्धोंद्वारा पूजित विजयेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। हे वरवर्णिनि! उत्तरमें महाकालका कुण्ड है॥ १३०-१३२॥ |
| बलिनाराधितश्चाहं तस्मिन् स्थाने तु पार्वति।<br>बलिकुण्डं तु विख्यातं वाराणस्यां मम प्रियम्॥ १३३<br>तस्य कुण्डस्य पूर्वेण लिङ्गं स्थापितवान् बलिः॥ १३४ | हे पार्वति! बलिने उस स्थानमें मेरी आराधना की थी। वाराणसीमें मेरा प्रिय बलिकुण्ड विख्यात है, उस कुण्डके पूर्वमें बलिने मेरे लिङ्गकी स्थापना की थी॥ १३३-१३४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनावर्णन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
८- कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन
| ७९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
आठवाँ अध्याय
कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन
| विद्याविघ्नेश्वरा रुद्राः शिवा ये च प्रकीर्तिताः।<br>कृत्तिवासेश्वरो यत्र तत्र सर्वे व्यवस्थिताः॥ १ | [ ईश्वर बोले— ] जो विद्याविघ्नेश्वर रुद्र शिव कहे गये हैं, वे सब जहाँ कृत्तिवासेश्वर हैं, वहाँ स्थित हैं॥ १॥ | | तस्मिन् स्थाने महादैत्यो हस्ती भूत्वा ममान्तिकम्।<br>तस्य कृत्तिं विदार्याशु करिणं स्वञ्जनप्रभम्॥ २<br>वासं तु कृतवान् पूर्वं कृत्तिवासस्ततो ह्यहम्।<br>अविमुक्ते स्थितश्चाहं तस्मिन् स्थाने महामुने॥ ३ | उस स्थानमें एक महादैत्य हाथी बनकर मेरे पास आया था, तब मैंने अंजनकी प्रभावाले उस हाथीको शीघ्र ही विदीर्ण करके उसके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर लिया, तबसे मैं कृत्तिवास नामवाला हो गया और हे महामुने! मैं उस अविमुक्त स्थानमें स्थित हूँ॥ २-३॥ | | लिङ्गं दारुवने गुह्यमृषिसङ्घैस्तु पूजितम्।<br>पश्चिमाभिमुखश्चाहं तस्मिन्नायतने स्थितः॥ ४ | दारुवनमें ऋषियोंद्वारा पूजित एक गुह्य लिङ्ग है, मैं उस आयतनमें पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ॥ ४॥ | | अन्तकेश्वरलिङ्गं तु मम चाग्रे स्थितं शुभम्।<br>उत्तरे मम लिङ्गं तु स्थापितं शक्रहस्तिना॥ ५ | मेरे सामने शुभ अन्तकेश्वरलिङ्ग स्थित है। मेरे उत्तरमें शक्रहस्तीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ५॥ | | मातलीश्वरलिङ्गं तु दक्षिणेन स्थितं मम।<br>मम पूर्वेण कूपस्तु नानासिद्धिसमन्वितः॥ ६<br>अणिमाद्यास्तथाष्टौ च सिद्धयस्तत्र संस्थिताः॥ ७ | मातलीश्वरलिङ्ग मेरे दक्षिणमें स्थित है। मेरे पूर्वमें विविध सिद्धियोंसे युक्त एक कूप विराजमान है, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ वहाँ विद्यमान हैं॥ ६-७॥ | | ये ते पाशुपतास्तत्र मध्यमेश्वरसंस्थिताः।<br>तेषामनुग्रहार्थं च कृत्तिवासाः स्थितः पुरा॥ ८ | जो भी पाशुपत हैं, वे वहाँ मध्यमेश्वरमें रहते हैं, उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये मैं कृत्तिवासरूपमें वहाँ स्थित हूँ॥ ८॥ | | रुद्राणां तु शरीरं तु मध्यमेश्वरमीश्वरम्।<br>कृत्तिवासाः शिवः प्राहुरेतद्गुह्यतरं मम॥ ९ | भगवान् मध्यमेश्वर रुद्रोंके शरीर हैं। कृत्तिवास ही शिव हैं। इसे मेरा परम गुह्य लिङ्ग कहा गया है॥ ९॥ | | अन्ये च बहवः सिद्धा ऋषयस्तत्र संस्थिताः।<br>उपासन्ति च मां नित्यं मद्भावगतमानसाः॥ १० | अन्य बहुत-से सिद्ध ऋषि वहाँ रहते हैं और मेरी भक्तिसे युक्त चित्तवाले होकर नित्य मेरी उपासना करते हैं॥ १०॥ | | वाराणस्यां प्रमुच्यन्ते ये जनास्तत्र संस्थिताः।<br>कृमिकीटाः प्रमुच्यन्ते महापातकिनश्च ये॥ ११<br>स्मरणाद्विप्र लिङ्गस्य पापं वै भस्मसाद्भवेत्॥ १२ | जो लोग वाराणसीमें वहाँ रहते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। कृमि-कीट तथा [अन्य] जो महापातकी हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं। हे विप्र! लिङ्गके स्मरणसे पाप भस्मसात् हो जाता है॥ ११-१२॥ | | कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं ये यजन्ति शुभान्विताः।<br>ते रुद्रस्य शरीरे तु प्रविष्टा अपुनर्भवाः॥ १३<br>अनेनैव शरीरेण प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्।<br>बहूनि तत्र तीर्थानि संख्या कर्तुं न शक्यते॥ १४ | कल्याणकी कामनावाले जो लोग कृत्तिवासेश्वर-लिङ्गकी पूजा करते हैं, वे रुद्रके शरीरमें प्रविष्ट हो जाते हैं और पुनर्जन्मरहित हो जाते हैं, वे इसी शरीरसे उत्तम निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं॥ १३ १/२॥ |
अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दशकोटिसहस्त्राणि तीर्थान्यत्रैव वै मुने।<br>कृत्तिवासेश्वरो यत्र तत्र सर्वे व्यवस्थिताः॥ १५<br>तस्मिँल्लिङ्गे तु सान्निध्यं त्रिकालं नात्र संशयः।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणामप्रकाशयं कृतं मया॥ १६<br>यत्र तीर्थान्यनेकानि कृतानि बहुभिर्द्विजैः।<br>पुलस्त्याद्यैर्महाभागैर्लोमशाद्यैर्महात्मभिः।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं न जानन्ति सुरासुराः॥ १७ | वहाँ अनेक तीर्थ हैं, उनकी संख्या नहीं बतायी जा सकती है, हे मुने! वहींपर दस हजार करोड़ तीर्थ हैं। जहाँ कृत्तिवासेश्वरलिङ्ग है, वहाँ वे सभी [तीर्थ] विद्यमान हैं॥ १४-१५॥<br><br>उस लिङ्गमें त्रिकाल उनका सान्निध्य रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा सुरेन्द्रसे भी इसे प्रकाशित नहीं किया॥ १६॥<br><br>जहाँ बहुत-से द्विजोंने तथा पुलस्त्य, लोमश आदि भाग्यशाली महात्माओंके द्वारा अनेक तीर्थ निर्मित किये गये हैं, उस कृत्तिवासेश्वरलिङ्गको देवता तथा असुर भी नहीं जानते हैं॥ १७॥ |
| भृगुरुवाच<br>कृते त्रेताद्वापरे च कलौ च परमेश्वरम्।<br>महागुह्यातिगुह्यं च संसारार्णवतारकम्॥ १८<br>केन कार्येण देवेश त्वयेदं न प्रकाशितम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गमविमुक्ते तु संस्थितम्॥ १९ | भृगु बोले—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें यह परम ऐश्वर्यसम्पन्न और गुह्य-से-गुह्य लिङ्ग संसारसागरसे पार करनेवाला है, हे देवेश! आपने अविमुक्त [क्षेत्र]-में स्थित इस कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको किस कारणसे प्रकाशित नहीं किया?॥ १८-१९॥ |
| ईश्वर उवाच<br>दशकोटिसहस्त्राणि आगच्छन्ति दिने दिने।<br>धर्मक्रियाविनिर्मुक्ताः सत्यशौचविवर्जिताः॥ २०<br>देवद्विजगुरून्नित्यं निन्दन्तो भक्तिवर्जिताः।<br>मायामोहसमायुक्ता दम्भमोहसमन्विताः॥ २१<br>शूद्रान्ननिरता विप्रा विह्वला रतिलालसाः।<br>कृत्तिवासेश्वरं प्राप्य ते सर्वे विगतज्वराः॥ २२<br>संसारभयनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>सुखेन मोक्षमायान्ति यथा सुकृतिनस्तथा॥ २३<br>दिव्यैर्विमानैरारूढाः किङ्किणीरवकान्वितैः।<br>देवानां भुवनं लभ्यं ते यान्ति परमं पदम्॥ २४<br>जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षो लभ्येत वा न वा।<br>एकेन जन्मना तत्र कृत्तिवासे तु लभ्यते॥ २५ | ईश्वर बोले—दस हजार करोड़ तीर्थ यहाँ प्रतिदिन आते हैं, धर्मक्रियासे विहीन, सत्य-शौचसे रहित, देवताओं, द्विजों तथा गुरुओंकी सदा निन्दा करनेवाले, भक्तिहीन, मायामोहसे युक्त, दम्भ-मोहसे समन्वित, शूद्रोंके अन्नका सेवन करनेवाले, विह्वल तथा रतिकी लालसावाले सभी विप्र कृत्तिवासेश्वरमें आकर सन्तापरहित हो जाते हैं॥ २०-२२॥<br><br>संसारके भयसे मुक्त तथा सभी पापोंसे रहित होकर वे पुण्यात्माओंकी भाँति सुखपूर्वक मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ २३॥<br><br>सुन्दर किंकिणियोंकी ध्वनिसे समन्वित दिव्य विमानोंमें बैठकर वे देवताओंके लिये सुलभ परम पद प्राप्त करते हैं। हजारों जन्मोंमें मोक्ष मिले अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवासमें एक ही जन्ममें [मोक्ष] प्राप्त हो जाता है॥ २४-२५॥ |
| पूर्वजन्मकृतं पापं तस्य लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>तत्र सिद्धेश्वरं नाम मुखलिङ्गं तु संस्थितम्॥ २६<br>अन्तकेश्वरदेवस्य स्थितं चैवोत्तेरेण तु।<br>आलयं सर्वसिद्धानां तत्स्थानं परमं महत्॥ २७<br>अव्ययं शाश्वतं दिव्यं विरजं ब्रह्मणालयम्।<br>शक्तिमूर्तिस्थितं शांतं शिवं परमकारणम्॥ २८<br>अव्यक्तं शाश्वतं सूक्ष्मं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं महत्॥ २९ | उस लिङ्गके दर्शनसे पूर्वजन्ममें किया गया पाप नष्ट हो जाता है। वहाँ सिद्धेश्वर नामक मुखलिङ्ग भी स्थित है, वह अन्तकेश्वरदेवके उत्तरमें है। वह स्थान सभी सिद्धोंका आलय, अति महान्, अव्यय, शाश्वत, दिव्य, विशुद्ध, ब्रह्माका आलय, शक्ति-मूर्तिस्थित, शान्त, कल्याणमय, परमकारणस्वरूप, अव्यक्त, सनातन, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मसे भी परम सूक्ष्म है॥ २६-२९॥ |
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|---|
| ७९४ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ईश्वर उवाच<br>एतद्दारुवनस्थानं कलौ देवस्य गीयते।<br>परात्परं तु यज्ज्ञानं मोक्षमार्गप्रदायकम्॥ ३०<br>प्राप्यते द्विजशार्दूल कृत्तिवासे न संशयः।<br>कृते तु त्र्यम्बकं प्रोक्तं त्रेतायां कृत्तिवाससम्॥ ३१ | **ईश्वर बोले—**यह दारुवन स्थान कलियुगमें शिवका स्थान कहा जाता है। हे द्विजश्रेष्ठ! जो मोक्षमार्ग देनेवाला परात्पर ज्ञान है, वह कृत्तिवासमें प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें [शिवका नाम] त्र्यम्बक तथा त्रेतामें कृत्तिवास कहा गया है॥ ३०-३१॥ |
| माहेश्वरं तु देवस्य द्वापरे नाम गीयते।<br>हस्तिपालेश्वरं नाम कलौ सिद्धैस्तु गीयते॥ ३२ | द्वापरमें शिवका नाम माहेश्वर कहा जाता है। कलियुगमें सिद्धोंके द्वारा शिवका नाम हस्तिपालेश्वर कहा जाता है॥ ३२॥ |
| दण्डिरूपधरेणैव देवदेवेन शम्भुना।<br>द्विजेष्वनुग्रहश्चात्र तत्र स्थाने कृतः पुरा॥ ३३<br>युगे युगे तु तत्त्वज्ञा ब्राह्मणाः शान्तचेतसः।<br>उपासते च मां नित्यं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ३४ | पूर्वकालमें देवदेव शम्भुने दण्डीका रूप धारण करके उस स्थानपर द्विजोंपर अनुग्रह किया था। शान्त चित्तवाले तत्त्वज्ञ ब्राह्मण प्रत्येक युगमें [वहाँ] नित्य मेरी उपासना करते हैं और शतरुद्रिय मन्त्रका जप करते हैं॥ ३३-३४॥ |
| आदेहपतनाद्विप्रास्तस्मिन् क्षेत्र उपासकाः।<br>जपन्ति रुद्राध्यायं ते स शिवः कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>तेषां देवः सदा तुष्टो दिव्यान् लोकान् प्रयच्छति।<br>ये ते जप्ता मया रुद्राः शङ्कुकर्णालये पुरा॥ ३६<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवासे न संशयः।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां सा तेषां वसतिः स्मृता॥ ३७ | वे उपासक विप्र देहके पतनपर्यन्त (मृत्युकालतक) उस क्षेत्रमें रुद्राध्यायका जप करते हैं, वे कृत्तिवासेश्वर भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न होकर उन्हें सदा दिव्य लोक प्रदान करते हैं। मैंने पूर्वकालमें शंकुकर्णालयमें जिन रुद्रोंका जप किया था, वे अविमुक्त [क्षेत्र] कृत्तिवासमें स्थित हैं, इसमें संशय नहीं है। जो सांख्ययोगोंका द्वार है, वह उन सबका निवासस्थान कहा गया है॥ ३५–३७॥ |
| श्यामास्तु पुरुषा रौद्रा विद्युता हरिपिङ्गलाः।<br>अशरीराः शरीरा ये ते च सृष्टा मया पुरा॥ ३८<br>नीलकण्ठाः श्वेतमुखा बिम्बोष्ठाश्च कपर्दिनः।<br>हरित्केशाः शृङ्गिणश्च लम्बोष्ठास्तिग्महेतयः॥ ३९<br>असंख्याः परिसंख्यातास्तान्यन्ये च सहस्रशः।<br>तेऽविमुक्ते तु तिष्ठन्ति कृत्तिवाससमीपतः॥ ४० | मैंने पूर्वकालमें श्याम, रौद्र, वैद्युत, हरिपिंगल, अशरीरी, शरीरी, नीलकण्ठ, श्वेतमुख, बिम्बोष्ठ, कपर्दी, हरित्केश, शृंगी, लम्बोष्ठ, तिग्महेति नामवाले जिन असंख्य तथा अन्य हजारों पुरुषोंकी सृष्टि की थी, वे कृत्तिवासके समीप अविमुक्तमें रहते हैं॥ ३८—४०॥ |
| रुद्राणां तु शिवो ज्ञेयं कृत्तिवासेश्वरं परम्।<br>तेन तैः प्रेरिता यान्ति दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ ४१ | श्रेष्ठ कृत्तिवासेश्वरको रुद्रोंका शिव जानना चाहिये, अतः उन [रुद्रों]-के द्वारा प्रेरित किये गये भक्त पुण्यरहित आत्मावालोंके द्वारा दुष्प्राप्य लोकको जाते हैं॥ ४१॥ |
| अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्।<br>अविमुक्ते तु वस्तव्यं जप्तव्यं शतरुद्रियम्॥ ४२<br>कृत्तिवासेश्वरो देवो द्रष्टव्यश्च पुनः पुनः। | [इसलिये] अनेक पापोंसे युक्त इस मानवशरीरको नश्वर समझकर अविमुक्तमें वास करना चाहिये, शतरुद्रियमन्त्रका जप करना चाहिये और बार-बार कृत्तिवासेश्वरदेवका दर्शन करना चाहिये॥ ४२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| यदिच्छेत्तारकं ज्ञानं शाश्वतं चामृतप्रदम्॥ ४३<br>एतत्सर्वं प्रकर्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ४४ | यदि कोई शाश्वत तथा अमृत प्रदान करनेवाले तारक ज्ञानकी इच्छा करता हो और यदि मेरे लोककी इच्छा करता हो, तो उसे यह सब करना चाहिये॥ ४३-४४॥ |
| गजवक्त्रः स्वयम्भूतस्तिष्ठत्यत्र विनायकः।<br>कूष्माण्डराजशम्भुश्च जयन्तश्च मदोत्कटः॥ ४५ | यहाँपर स्वयम्भू गजानन, विनायक, कूष्माण्डराज- |
| अध्याय ८ ] | कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन | ७९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शम्भु, जयन्त तथा मदोत्कट स्थित हैं॥४५॥ | |
| सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद्विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालः चित्रघण्टो महेश्वरः॥४६<br>दृगिचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणा रुद्रेश्वरस्य वै॥४७<br>रक्षन्ति सततं सर्वे अविमुक्तं हि मे गृहम्। | यहाँ कुछ सिंह-व्याघ्रके समान मुखवाले, विकट, टेढ़े तथा बौने [गण] भी विद्यमान हैं। यहाँ नन्दी, महाकाल, चित्रघण्ट, महेश्वर, दृगिचण्डेश्वर, घण्टाकर्ण, महाबल—ये सब तथा रुद्रेश्वरके अन्य बहुत-से गण मेरे अविमुक्त गृहकी निरन्तर रक्षा करते हैं॥४६-४७½॥ |
| अयनं तूत्तरं ज्ञेयं दृगिचण्डेश्वरं मम॥४८<br>दक्षिणं शङ्कुकर्णं तु ओङ्कारं विषुवं मम।<br>दशकोट्यस्तु तीर्थानां संविशन्त्यथ पर्वणि॥४९ | दृगिचण्डेश्वरको मेरा उत्तर अयन, शंकुकर्णको दक्षिण अयन और ओंकारको मेरा विषुव जानना चाहिये। दस करोड़ तीर्थ पर्वके अवसरपर यहाँ प्रवेश करते हैं॥४८-४९॥ |
| रहस्यं विप्रमन्त्राणां गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>यच्च पाशुपतं प्रोक्तं पदं सम्यङ्निषेवितम्॥५०<br>पूजनात्तदवाप्नोति षण्मासाभ्यन्तरेण तु।<br>ममैव प्रीतिरतुला तस्मिन्नायतने सदा॥५१ | विप्र-मन्त्रोंके रहस्यको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। भलीभाँति निषेवित जो पाशुपतपद कहा गया है, वह इसके पूजनसे छः महीनोंके भीतर ही प्राप्त हो जाता है। उस आयतनमें मेरी अतुलनीय प्रीति सर्वदा रहती है॥५०-५१॥ |
| अन्ये च बहवस्तत्र सिद्धलिङ्गाश्च सुव्रते।<br>सर्वेषामेव स्थानानां तत्स्थानं तु ममाधिकम्।<br>ज्ञात्वा कलियुगं घोरमप्रकाश्यं कृतं मया॥५२ | हे सुव्रते! वहाँपर अन्य बहुत-से सिद्ध लिङ्ग स्थित हैं। वह स्थान मेरे सभी स्थानोंसे बढ़कर है। कलियुगको भयानक जानकर मैंने इसे प्रकाशित नहीं किया॥५२॥ |
| न सा गतिः प्राप्यते यज्ञदानै-<br>स्तीर्थाभिषेकैर्न तपोभिरुग्रैः।<br>अन्यैश्च धर्मैर्विविधैः शुभैर्वा<br>या कृत्तिवासे तु जितेन्द्रियैश्च॥५३ | जो गति जितेन्द्रिय लोग कृत्तिवासमें प्राप्त करते हैं, वह गति यज्ञों, दानों, तीर्थों, अभिषेकों, घोर तपों तथा अन्य विविध शुभ धर्मोंके द्वारा भी लोग नहीं प्राप्त कर सकते हैं॥५३॥ |
| दर्शनाद्देवदेवस्य ब्रह्महापि प्रमुच्यते।<br>स्पर्शने पूजने चैव सर्वयज्ञफलं लभेत्॥५४ | देवदेवके दर्शनसे ब्राह्मणका वध करनेवाला भी [पापसे] मुक्त हो जाता है, [देवदेवका] स्पर्श तथा पूजन करनेसे व्यक्ति सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥५४॥ |
| श्रद्धया परया देवं येऽर्चयन्ति सनातनम्।<br>फाल्गुनस्य चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहिताः॥५५<br>पुष्पैः फलैस्तथान्यैश्च भक्ष्यैरुच्चावचैस्तथा।<br>क्षीरेण मधुना चैव तोयेन सह सर्पिषा॥५६<br>तर्पयन्ति परं लिङ्गमर्चयन्ति देवं शुभम्।<br>हुडुङ्कारनमस्कारैः नृत्यगीतैस्तथैव च॥५७<br>मुखवाद्यैरनेकैश्च स्तोत्रमन्त्रैस्तथैव च।<br>उपोष्य रजनीमेकां भक्त्या परमया हरम्॥५८<br>ते यान्ति परमं स्थानं सदाशिवमनामयम्। | जो लोग फाल्गुनमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर परम श्रद्धाके साथ सनातन देवका अर्चन करते हैं; पुष्पों, फलों, अनेकविध भक्ष्य पदार्थों, दुग्ध, मधु, जल तथा घृतसे शुभ लिङ्गदेवको तृप्त करते हैं और एक रात उपवास करके महान् भक्तिसे हुडुङ्कार, नमस्कार, नृत्य, गीत, मुखवाद्य तथा विविध स्तोत्र-मन्त्रोंसे शिवको तृप्त करते हैं, वे सदाशिवके अनामय परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥५५-५८½॥ |
| भूता हि चैत्रमासस्य अर्चयेत्परमेश्वरम्॥५९<br>स वित्तेशपुरं प्राप्य क्रीडयेत् यक्षराडिव।<br>वैशाखस्य चतुर्दश्यां योऽर्चयेत्प्रयतः शिवम्॥६० | जो मनुष्य चैत्रमासकी चतुर्दशीको परमेश्वरका अर्चन करता है, वह कुबेरलोक प्राप्त करके यक्षराजकी |
| ७९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| वैशाखं लोकमासाद्य तस्यैवानुचरो भवेत्।<br>ज्येष्ठे मासि चतुर्दश्यां योऽर्चयेच्छ्रद्धया हरम्॥ ६१ | भाँति क्रीड़ा करता है॥ ५९ १/२ ॥<br>जो वैशाखमासकी चतुर्दशीके दिन संयत होकर शिवकी पूजा करता है, वह स्कन्दलोक प्राप्त करके उन्हींका अनुचर हो जाता है। जो ज्येष्ठमासमें चतुर्दशी तिथिको श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करता है, वह चन्द्र-तारोंकी स्थिति-पर्यन्त अग्निलोकमें वास करता है॥ ६०-६१ १/२ ॥ | | सोऽग्निलोकमवाप्नोति यावदाचन्द्रतारकम्।<br>चतुर्दश्यां शुचौ मासि योऽर्चयेत्तु सुरेश्वरम्॥ ६२<br><br>सूर्यस्य लोके सुसुखी क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>श्रावणस्य चतुर्दश्यां कामलिङ्गं समर्चितम्॥ ६३ | जो आषाढ़ महीनेमें चतुर्दशी तिथिको सुरेश्वरका अर्चन करता है, वह सूर्यलोकमें इच्छित समयतक सुखी रहते हुए क्रीडा करता है। जो श्रावणमासकी चतुर्दशी तिथिको कामलिङ्गका अर्चन करता है, वह वरुणलोकको जाता है और वहाँ अप्सराओंके साथ क्रीडा करता है॥ ६२-६३ १/२ ॥ | | स याति वारुणं लोकं क्रीडते चाप्सरैः सह।<br>मासि भाद्रपदे युक्तमर्चयित्वा तु शङ्करम्॥ ६४<br><br>पुष्पैः फलैश्च विविधै रुद्रस्यैति सलोकताम्।<br>पितृपक्षे चतुर्दश्यां पूजयित्वा महेश्वरम्॥ ६५ | भाद्रपदमासमें भक्तिपूर्वक विविध पुष्पों तथा फलोंके द्वारा शंकरकी पूजा करके मनुष्य रुद्रका सालोक्य प्राप्त करता है। [आश्विनमासमें] पितृपक्षमें चतुर्दशी तिथिको महेश्वरका पूजन करके मनुष्य पितरोंका लोक प्राप्त करता है और पूजित होकर उनके साथ क्रीडा करता है॥ ६४-६५ १/२ ॥ | | प्राप्यते पितृलोकं तु क्रीडते पूजितस्तु तैः।<br>प्रबोधमासे देवेशमर्चयित्वा महेश्वरम्॥ ६६<br><br>स चन्द्रलोकमाप्नोति क्रीडते यावदीप्सितम्।<br>बहुले मार्गशीर्षस्य अर्चयित्वा पिनाकिनम्॥ ६७ | प्रबोध (कार्तिक)-मासमें देवेश महेश्वरकी पूजा करके वह चन्द्रलोक प्राप्त करता है और इच्छित समयतक वहाँ विहार करता है। मार्गशीर्षमासकी चतुर्दशी तिथिको पिनाकधारी शिवका अर्चन करके मनुष्य विष्णुलोक प्राप्त करता है और अक्षयकालतक वहाँ क्रीडा करता है॥ ६६-६७ १/२ ॥ | | विष्णुलोकमवाप्नोति क्रीडते कालमक्षयम्।<br>अर्चयित्वा तथा पुष्ये स्थाणुं तुष्टेन चेतसा॥ ६८<br><br>प्राप्नोति नैर्ऋतं स्थानं तेन वै सह मोदते।<br>माघे समर्च्चयित्वा वै पुष्पमूलफलैः शुभैः॥ ६९ | पौष महीनेमें प्रसन्न मनसे स्थाणु (शिव)-की पूजा करके मनुष्य निर्ऋतितलोक प्राप्त करता है और उनके साथ आनन्द करता है। माघमासमें शुभ पुष्प-मूल-फलोंके द्वारा शिवकी पूजा करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर शिवलोक प्राप्त करता है॥ ६८-६९ १/२ ॥ | | प्राप्नोति शिवलोकं तु त्यक्त्वा संसारसागरम्।<br>कृत्तिवासेश्वरं देवमर्चयेत्तु प्रयत्नतः॥ ७०<br><br>अविमुक्ते च वस्तव्यं यदिच्छेन्मामकं पदम्॥ ७१ | यदि कोई मेरा लोक चाहता हो, तो उसे प्रयत्नपूर्वक कृत्तिवासेश्वरदेवकी पूजा करनी चाहिये और अविमुक्त [क्षेत्र]-में वास करना चाहिये॥ ७०-७१ ॥ | | गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि<br>धन्याविमुक्ते तु नरा वसन्ति।<br>स्वर्गापवर्गस्य पदस्य लिङ्गं<br>ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः॥ ७२ | सिद्धलोग यह गीत गाते हैं कि जो मनुष्य अविमुक्तमें वास करते हैं और स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले कृत्तिवासेश्वरलिङ्गकी शरण ग्रहण करते हैं, वे धन्य हैं॥ ७२ ॥ | | ईश्वर उवाच<br>अन्यदायतनं पुण्यं काशिपुर्यां वरानने।<br>धन्वन्तरिः पुरा जातः काशिराजगृहे शुभे॥ ७३ | ईश्वर बोले—हे वरानने! काशीपुरीमें अन्य |
अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९७
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुण्यप्रद आयतन भी हैं। पूर्वकालमें काशिराजके शुभ गृहमें धन्वन्तरि उत्पन्न हुए थे॥ ७३॥ | |
| तेन भद्रे तथा काले अहमाराधितः शुभे।<br>भृङ्गीशेश्वरनामानं लिङ्गं तत्र स्थितं मम॥ ७४<br><br>पश्चान्मुखः स्थितश्चाहं कूपस्तु मम चाग्रतः।<br>तिष्ठन्त्योषधयस्तत्र सर्वा ह्यमृतसम्भवाः॥ ७५ | हे भद्रे! उन्होंने शुभ कालमें मेरी आराधना की थी। वहाँपर मेरा भृंगीशेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। मैं वहाँ पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित हूँ और मेरे सामने एक कूप है। वहाँ अमृतसे उत्पन्न सभी औषधियाँ विद्यमान हैं॥ ७४-७५॥ |
| क्षिप्तास्तस्मिन् पुरा काले वैद्यराजेन सुन्दरि।<br>तेन तत्प्रोच्यते स्थानं वैद्यनाथं महेश्वरि॥ ७६ | हे सुन्दरि! पूर्वकालमें वैद्यराजके द्वारा औषधियाँ उस कूपमें डाली गयी थीं, इसीलिये हे महेश्वरि! उस स्थानको वैद्यनाथ कहा जाता है॥ ७६॥ |
| तस्मिन् कूपे तु ये देवि पानीयं पिबते नरः।<br>व्याधिभिः सम्प्रमुच्यन्ते वैद्यनाथप्रभावतः॥ ७७ | हे देवि! जो मनुष्य उस कूपका जल पीते हैं, वे वैद्यनाथके प्रभावसे व्याधियोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ७७॥ |
| कूपस्य चोत्तरे भागे हरिकेश्वरसंज्ञकम्।<br>रोगैश्चापि प्रमुच्यन्ते हरिकेश्वरदर्शनात्॥ ७८ | [उस] कूपके उत्तरभागमें हरिकेश्वर नामक लिङ्ग है, हरिकेश्वरके भी दर्शनसे मनुष्य रोगोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ७८॥ |
| तुङ्गेशस्य समीपे तु दक्षिणे वरवर्णिनि।<br>शैवं तडागमाख्यातं शिवेनाधिष्ठितं शुभम्॥ ७९ | हे वरवर्णिनि! दक्षिण दिशामें तुंगेश्वरके समीप शिवके द्वारा अधिष्ठित एक उत्तम शैव तडाग बताया गया है॥ ७९॥ |
| पश्चिमे तु तटे रम्ये स्थितोऽहं तत्र सुव्रते।<br>पश्चिमाभिमुखो भद्रे तस्मिन् स्थाने व्यवस्थितः॥ ८०<br><br>शिवेश्वर इति ख्यातो भक्तानां वरदायकः।<br>शिवेश्वराद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८१<br><br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं स्थापितं जमदग्निना।<br>जमदग्निलिङ्गात्पश्चिमतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८२ | हे सुव्रते! वहाँ रम्य पश्चिमी तटपर मैं स्थित हूँ। हे भद्रे! भक्तोंको वर प्रदान करनेवाला मैं उस स्थानमें पश्चिमाभिमुख होकर स्थित हूँ और शिवेश्वर—इस नामसे विख्यात हूँ। शिवेश्वरके दक्षिणमें [महर्षि] जमदग्निके द्वारा स्थापित एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है। जमदग्निलिङ्गके पश्चिममें देवताओं तथा असुरोंसे नमस्कृत भैरवेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग स्थित है॥ ८०-८२ १/२॥ |
| भैरवेश्वरविख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्।<br>तत्र दुर्गा स्थिता भद्रे ममापि हि भयङ्करा॥ ८३<br><br>नृत्यमाना तु सा देवी लिङ्गस्यैव समीपतः।<br>भैरवेशं तु तं दृष्ट्वा संसारे न पतेत्पुनः॥ ८४ | हे भद्रे! वहाँ मेरे लिङ्गके ही समीपमें नृत्य करती हुई वे भयंकर देवी दुर्गा स्थित हैं। उन भैरवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं आता है॥ ८३-८४॥ |
| तस्यैव भैरवेशस्य कूपस्तिष्ठति चोत्तरे।<br>तस्योपस्पर्शनं कृत्वा सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ ८५ | उन्हीं भैरवेश्वरके उत्तरमें एक कूप स्थित है, उसमें स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ ८५॥ |
| कूपस्य पश्चिमे भागे लिङ्गं तिष्ठति भामिनि।<br>शुकेश्वरमिति ख्यातं स्थापितं व्याससूनुना॥ ८६<br><br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वैराग्यमपि विन्दति।<br>तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे तडागं यत्र तिष्ठति॥ ८७ | हे भामिनि! कूपके पश्चिम भागमें व्यासपुत्रके द्वारा स्थापित शुकेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वैराग्य भी प्राप्त कर लेता है॥ ८६ १/२॥ |
| ७९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नात्वा वरारोहे कृतकृत्यो भवेन्नरः।<br>नैर्ऋते तु दिशाभागे शुकेशस्य तु सुन्दरि॥ ८८ | हे वरारोहे! वहाँ उसके उत्तरभागमें एक तडाग स्थित है, जहाँ स्नान करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥ ८७ १/२॥ |
| स्थापितं मुखलिङ्गं तु व्यासेनापि महर्षिणा।<br>व्यासेश्वरं तु विख्यातमृषिभिश्चैस्तु वन्दितम्॥ ८९ | हे सुन्दरि! शुकेश्वरके नैर्ऋत दिशाभागमें महर्षि व्यासके द्वारा मुखलिङ्ग स्थापित किया गया है, व्यासेश्वर नामसे विख्यात वह [लिङ्ग] ऋषियोंके द्वारा वन्दित है॥ ८८-८९॥ |
| व्यासकुण्डे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा सुरान् पितॄन्।<br>अक्षयाँल्लभते लोकान् यत्र तत्राभिकाङ्क्षितान्॥ ९० | वहाँ व्यासकुण्डमें स्नान करके तथा देवताओं और पितरोंका अर्चन करके मनुष्य अभीष्ट अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है॥ ९०॥ |
| व्यासतीर्थसमीपे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>घण्टाकर्णह्रदं नाम सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ ९१<br><br>स्नानं कृत्वा ह्रदे तस्मिन् व्यासस्यैव तु दर्शनात्।<br>यत्र तत्र मृतो वापि वाराणस्यां मृतो भवेत्॥ ९२<br><br>तत्र देवि तनुं त्यक्त्वा लभेदगाणेश्वरीं गतिम्।<br>घण्टाकर्णसमीपे तु उत्तरेण यशस्विनि॥ ९३ | हे यशस्विनि! व्यासतीर्थके समीप पश्चिममें समस्त सुख प्रदान करनेवाला घण्टाकर्ण नामक ह्रद विद्यमान है। उस ह्रदमें स्नान करके तथा व्यासका दर्शन करके मनुष्य जहाँ कहीं भी मरता है, वह मानो वाराणसीमें मृत्यु प्राप्त करता है। हे देवि! वहाँपर शरीरका त्याग करके मनुष्य गाणेश्वरीगति प्राप्त करता है॥ ९१-९२ १/२॥ |
| पुण्यमप्सरसां ख्यातं पञ्चचूडाविनिर्मितम्।<br>पञ्चचूडाह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा चैव तमेश्वरम्॥ ९४<br><br>स्वर्गलोकं नरो याति पञ्चचूडाप्रियः सदा।<br>तस्य चोत्तरदेशे तु अशोकवनसंस्थितम्॥ ९५ | हे यशस्विनि! घण्टाकर्णके समीप उत्तरदिशामें पंचचूड़ाके द्वारा निर्मित अप्सराओंका पुण्यप्रद ह्रद बताया गया है, पंचचूड़ाह्रदमें स्नान करके तथा उन ईश्वरका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गलोक जाता है और सर्वदा पंचचूड़ाका प्रिय बना रहता है॥ ९३-९४ १/२॥ |
| अशोकवनमध्यस्थं तत्र कुण्डं शुभोदकम्।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा विलोकश्चैव जायते॥ ९६ | उसके उत्तरभागमें अशोकवन स्थित है, वहाँपर अशोकवनके मध्यमें पवित्र जलवाला कुण्ड स्थित है। उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य [वहाँपर विद्यमान] विलोकतीर्थस्वरूप हो जाता है॥ ९५-९६॥ |
| विलोकाच्चोत्तरे भागे नाम्ना मन्दाकिनी शुभा।<br>स्वर्गलोके तु सा पुण्या किं पुनर्मानुषे शुभे॥ ९७<br><br>यत्र वै देवदेवस्य सान्निध्यं देवि सर्वदा।<br>लिङ्गं तत्र स्वयं भूतं क्षेत्रमध्ये तु सुन्दरि॥ ९८ | विलोकके उत्तरभागमें शुभ मन्दाकिनी विद्यमान है। हे देवि! स्वर्गलोकमें स्थित वह पुण्यमयी [मन्दाकिनी] नदी यदि इस शुभ मनुष्यलोकमें है, तो फिर कहना ही क्या, जहाँ सर्वदा देवदेव [शिवका] सान्निध्य रहता है। हे सुन्दरि! वहाँ क्षेत्रके मध्यमें लिङ्ग स्वयं आविर्भूत हुआ है॥ ९७-९८॥ |
| ईश्वर उवाच<br>मन्दाकिनीजले स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम्।<br>एकविंशकुलोपेतो रुद्रलोके वसेच्चिरम्॥ ९९ | ईश्वर बोले— मन्दाकिनीके जलमें स्नान करके मध्यमेश्वरका दर्शनकर मनुष्य [अपने] इक्कीस कुलोंसहित दीर्घकालतक रुद्रलोकमें वास करता है॥ ९९॥ |
| एतत्किल सदा प्राहुः पितरः सपितामहाः।<br>योऽपि चास्मत्कुले जातो मन्दाकिन्या जलोद्गतः॥ १०० | पितामहोंसहित पितृगणोंने यह सर्वदा कहा है कि |
अध्याय ८ ] कृत्तिवासेश्वर तथा उसके समीपस्थ लिङ्गोंका वर्णन ७९९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भोजयेच्च यतो विप्रान् यतीन् पाशुपतान् बुधः।<br>स्नानं दानं तपो होमः स्वाध्यायं पितृतर्पणम्॥ १०१<br><br>पिण्डनिर्वापणं चैव सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>क्षेत्रस्य चास्य सङ्क्षेपान्मया ते कथितं स्फुटम्॥ १०२ | हमारे कुलमें उत्पन्न जो कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति मन्दाकिनीके जलमें स्नान करके पाशुपत विप्रों तथा यतियोंको भोजन कराता है, उसका स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, पिण्डनिर्वापण—यह सब अक्षय हो जाता है॥ १००-१०११/२॥<br><br>मैंने इस क्षेत्रका माहात्म्य आपसे संक्षेपमें बता दिया। |
| दक्षिणं भूमिभागं तु मध्यमेशस्य यद्भवेत्।<br>तत्र पूर्वामुखं लिङ्गं विश्वेदेवैः प्रतिष्ठितम्॥ १०३<br><br>पश्चान्मुखं तु देवेशं वीरभद्रप्रतिष्ठितम्।<br>पश्चान्मुखेन दृष्टेन वीरभद्रसलोकताम्॥ १०४ | मध्यमेश्वरके दक्षिणमें जो भूमिभाग है, वहाँ विश्वेदेवोंके द्वारा स्थापित एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग है और वीरभद्रके द्वारा स्थापित पश्चिमाभिमुख लिङ्ग भी है, उस पश्चिमाभिमुख देवेशके दर्शनसे मनुष्य वीरभद्रका सालोक्य प्राप्त करता है॥ १०२-१०४॥ |
| तयोस्तु दक्षिणे देवि भद्रकालीह्रदं स्मृतम्।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे शौनकेन प्रतिष्ठितम्॥ १०५<br><br>मतङ्गेश्वरनामानं लिङ्गं तत्रैव तिष्ठति।<br>पूर्वामुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ १०६ | हे देवि! उन दोनोंके दक्षिणमें भद्रकालीह्रद बताया गया है। वहींपर उस कुण्डके पश्चिमी तटपर शौनकके द्वारा एक लिङ्ग स्थापित किया गया है। मतंगेश्वर नामक लिङ्ग भी वहींपर स्थित है, पूर्वकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला है॥ १०५-१०६॥ |
| मतङ्गेश्वरकोणे तु वायव्ये तु यशस्विनि।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि नरैस्तत्र महात्मभिः॥ १०७<br><br>तस्यैव दक्षिणे भागे जयन्तेन प्रतिष्ठितम्।<br>देवराजस्य पुत्रेण आत्मनो जयमिच्छता॥ १०८ | हे यशस्विनि! वहाँ मतंगेश्वरके वायव्यकोणमें महात्मा पुरुषोंके द्वारा [अनेक] लिङ्ग स्थापित किये गये हैं। उसीके दक्षिणभागमें अपनी विजयकी कामना करनेवाले देवराजपुत्र जयन्तके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १०७-१०८॥ |
| ब्रह्मतारेश्वरं चैवं तस्मिन् स्थाने सुरेश्वरि।<br>पितृभिः याज्ञवल्क्येन तत्र लिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ १०९ | हे सुरेश्वरि! उस स्थानमें ब्रह्मतारेश्वर [लिङ्ग] विद्यमान है, वह लिङ्ग पितरों तथा याज्ञवल्क्यके द्वारा स्थापित किया गया है॥ १०९॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धिकूटः प्रकीर्तितः।<br>सिद्धाः पाशुपतास्तत्र मम लिङ्गार्चने रताः॥ ११० | उसके दक्षिण दिशाभागमें सिद्धिकूट बताया गया है, वहाँपर सिद्धपाशुपत मेरे लिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं॥ ११०॥ |
| तेषां वै तत्र कूतोऽयं सिद्धकूटः स सिध्यते।<br>तत्र ध्यानरताः केचिज्जपं कुर्वन्ति चापरे॥ १११<br><br>स्वाध्यायमन्ये कुर्वन्ति तपः कुर्वन्ति चापरे।<br>आकाशशयनं केचित्केचिद्भावं समाश्रिताः॥ ११२<br><br>अधोमुखास्तथैवान्ये धूमपेयास्तथापरे।<br>प्रदक्षिणामन्ये कुर्वन्ति काष्ठमौनं तथापरे॥ ११३<br><br>कुर्वन्ति पुष्पाहरणं गडूकानां तथा परे।<br>तैः सर्वैः स्थापितं लिङ्गमर्चापूजनतत्परैः॥ ११४ | वहाँ उनका जो कूट है, वह सिद्धकूट कहा जाता है। वहाँपर कुछ लोग ध्यानपरायण रहते हैं, दूसरे लोग जप करते हैं, अन्य लोग स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग तप करते हैं, कुछ लोग आकाशशयन करते हैं, कुछ लोग भक्तिभावमें लीन रहते हैं, कुछ लोग अधोमुख होकर स्थित रहते हैं, कुछ लोग धूम ग्रहण करते हुए तपमें रत रहते हैं, कुछ लोग प्रदक्षिणा करते रहते हैं, कुछ लोग काष्ठकी भाँति मौन रहते हैं और कुछ लोग गडूकेके पुष्पोंको एकत्र करनेमें संलग्न रहते हैं। अर्चन-पूजनमें तत्पर उन सभीके द्वारा वहाँ लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ १११-११४॥ |