भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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७८८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ओर मुखवाला मारीचेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी पापोंका नाश करनेवाला है॥ ७९ ॥
तस्य चैवाग्रतो देवि स्थापितं कुण्डमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या भ्राजते भास्करो यथा॥ ८०हे देवि! उसके आगे एक उत्तम कुण्ड स्थापित किया गया है, उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सूर्यके समान दीप्तिमान् हो जाता है॥ ८०॥
मारीचेशात्पश्चिमतो लिङ्गमिन्द्रेश्वरं महत्।<br>पश्चिमाभिमुखं देवि कुण्डस्य तटसंस्थितम्॥ ८१मारीचेश्वरके पश्चिममें इन्द्रेश्वर नामक महान् लिङ्ग है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके तटपर स्थित है॥ ८१॥
इन्द्रेश्वराद्दक्षिणतो वापी कर्कोटकस्य च।<br>तत्र वीरजले स्नात्वा दृष्ट्वा कर्कोटकेश्वरम्॥ ८२<br>नागानां चाधिपत्यं तु जायते नात्र संशयः।<br>कर्कोट्काद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ८३इन्द्रेश्वरके दक्षिणमें कर्कोटककी वापी है, उस वीरजलमें स्नान करके तथा कर्कोटकेश्वरका दर्शन करके [मनुष्यको] नागोंका आधिपत्य प्राप्त हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं है॥ ८२१/२॥
दृगिचण्डेश्वरं नाम ब्रह्महत्यापहारकम्।<br>तत्र पाशुपतः सिद्धः कौथुमिर्नाम नामतः॥ ८४<br>ज्ञानं पाशुपतं प्राप्य रुद्रलोकमितो गतः।<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्योत्तरतः स्थितम्॥ ८५कर्कोटकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला दृगिचण्डेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वहाँपर पाशुपत कौथुमि नामवाले ऋषि सिद्धिको प्राप्त हुए और पाशुपत ज्ञान प्राप्त करके यहाँसे रुद्रलोकको गये॥ ८३-८४१/२॥
तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृगिचण्डेश्वरस्य तु।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति त्यक्त्वा संसारसागरम्॥ ८६<br>तस्य पूर्वेण देवेशि दीर्घिकायास्तटे शुभे।<br>अग्नीश्वरं तु नामानं सर्वपापक्षयङ्करम्॥ ८७पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग कुण्डके उत्तरमें स्थित है, वहाँपर दृगिचण्डेश्वरके कुण्डमें स्नान करके मनुष्य संसारसागरका त्यागकर रुद्रलोक प्राप्त करता है॥ ८५-८६॥
तं दृष्ट्वा मानवो देवि अग्निलोकं तु गच्छति।<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे नाम्ना ह्याम्नातकेश्वरम्॥ ८८हे देवेशि! उसके पूर्वमें कुण्डके उत्तम तटपर सभी पापोंका नाश करनेवाला अग्नीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य अग्निलोकको जाता है॥ ८७१/२॥
तं दृष्ट्वा मनुजो भद्रे रुद्रस्यानुचरो भवेत्।<br>एकलिङ्गं तु तद्विद्यात् सूक्ष्मं च वरवर्णिनि॥ ८९उसीके पूर्व दिशाभागमें आम्नातकेश्वर नामक लिङ्ग है, हे भद्रे! उसका दर्शन करके मनुष्य रुद्रका अनुचर हो जाता है। हे वरवर्णिनि! उसे सूक्ष्म एकलिङ्ग जानना चाहिये॥ ८८-८९॥
तस्यैवाम्नातकेशस्य दक्षिणे नातिदूरतः।<br>कुण्डं तदुद्भवं दिव्यं सुरलोकप्रदायकम्॥ ९०उसी आम्नातकेश्वरके दक्षिण समीपमें ही देवलोककी प्राप्ति करानेवाला दिव्य कुण्ड स्थित है॥ ९०॥
उर्वशीश्वरनामानं स्थितं पश्चान्मुखं भुवि।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि गणत्वं लभते ध्रुवम्॥ ९१वहाँ पश्चिमकी ओर मुखवाला उर्वशीश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य निश्चित रूपसे गणत्व प्राप्त करता है॥ ९१॥
कुण्डस्य नैर्ऋते भागे नातिदूरे कथञ्चन।<br>उर्वशीशसमीपे तु तालकर्णेश्वरं स्मृतम्॥ ९२<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि चण्डस्यैति सलोकताम्।<br>तस्यैव तु समीपे तु लिङ्गानि स्थापितानि च॥ ९३कुण्डके नैर्ऋत्यभागमें समीपमें ही उर्वशीश्वरके पासमें तालकर्णेश्वरलिङ्ग बताया गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य चण्डका सालोक्य प्राप्त करता है॥ ९२१/२॥