भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

अध्याय ७ ] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रहस्य आपको बता दिया॥ ६४-६५॥
तस्य विष्णुध्रुवस्यैव पश्चिमाया दिशः स्थितम्।<br>स्थापितं मम लिङ्गं तु दधीचेन महर्षिणा॥ ६६<br><br>दधीचेश्वरनामानं ख्यातं सर्वसुरासुरैः।<br>तं दृष्ट्वा मनुजो देवि ऐश्वरं लोकमाप्नुयात्॥ ६७उसी विष्णुध्रुवके पश्चिम दिशामें महर्षि दधीचिके द्वारा स्थापित किया गया मेरा लिङ्ग स्थित है। वह लिङ्ग सभी देवताओं तथा असुरोंके द्वारा दधीचेश्वर नामसे कहा गया है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य ईश्वरका लोक प्राप्त करता है॥ ६६-६७॥
दक्षिणे तु तदा तत्र गायत्र्या स्थापितं पुरा।<br>गायत्र्या दक्षिणे चैव सावित्र्या स्थापितं पुनः॥ ६८<br><br>एतौ पश्चान्मुखौ लिङ्गौ मम देवि प्रियौ सदा।<br>अस्य चैव तु पूर्वेण लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ ६९उसके दक्षिणमें पूर्वकालमें गायत्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है और गायत्रीके दक्षिणमें सावित्रीके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग स्थित है। हे देवि! ये दोनों लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाले हैं तथा मेरे सर्वदा प्रिय हैं। इसके पूर्वमें पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है॥ ६८-६९॥
मत्स्योदरीतटे रम्ये स्थितं सत्पतयेश्वरम्।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि उत्तमां सिद्धिमवाप्नुयात्॥ ७०यह सत्पतयेश्वर नामक लिङ्ग मत्स्योदरीके रम्य तटपर स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य उत्तम सिद्धि प्राप्त करता है॥ ७०॥
लक्ष्मीलिङ्गस्य देवेन लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>उग्रेश्वरे महत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ७१<br><br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि भवेज्जातिस्मरो नरः।<br>तस्यैव दक्षिणे देवि महत्कुण्डं व्यवस्थितम्॥ ७२लक्ष्मीलिङ्गके पास देवताके द्वारा पश्चिमकी ओर मुखवाला उग्रेश्वर नामक महापुण्यप्रद तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला लिङ्ग स्थित है, हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी स्मृतिवाला) हो जाता है॥ ७१ १/२॥
स्नात्वा कनखले यद्वत्पुण्यमुक्तं यशस्विनि।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा फलमाप्नोति तत्समम्॥ ७३हे देवि! उसीके दक्षिणमें एक विशाल कुण्ड स्थित है, हे यशस्विनि! कनखलमें स्नान करनेसे जो पुण्य कहा गया है, मनुष्य उस कुण्डमें स्नान करके उसके समान फल प्राप्त कर लेता है॥ ७२-७३॥
दधीचेशात्पश्चिमतो नाम्ना तु धनदेश्वरम्।<br>यत्र देवि तपस्तप्तं धनदेन महात्मना॥ ७४<br><br>तत्र कुण्डं महादेवि धनदेशस्य धीमतः।<br>तत्र स्नात्वा नरो देवि धनदेशं च पश्यति॥ ७५<br><br>तस्य तुष्टः कुबेरस्तु देवत्वं सम्प्रयच्छति।<br>अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि सुरासुरैः॥ ७६हे देवि! दधीचेश्वरके पश्चिममें धनदेश्वर नामक लिङ्ग है, जहाँ महात्मा धनदने तपस्या की थी। हे महादेवि! वहाँपर बुद्धिमान् धनदेश्वरका कुण्ड स्थित है, हे देवि! जो मनुष्य उसमें स्नान करके धनदेश्वरका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर कुबेर उसे देवत्व प्रदान करते हैं॥ ७४-७५ १/२॥
तानि दृष्ट्वातिपुण्यानि स्वर्गलोकं व्रजेन्नरः।<br>धनदेशात् पश्चिमतो नाम्ना तु करवीरकम्॥ ७७<br><br>तेन दृष्टेन देवेशि सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>पुण्यानि तत्र लिङ्गानि स्थितानि परमेश्वरि॥ ७८[हे देवि!] वहाँपर देवताओं तथा असुरोंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उन महापुण्यप्रद लिङ्गोंका दर्शन करके मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। हे देवेशि! धनदेश्वरके पश्चिममें करवीरक नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। हे परमेश्वरि! वहाँ [अन्य] पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित हैं॥ ७६-७८॥
तस्य वायव्यकोणे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>मारीचेश्वरनामानं सर्वपातकनाशनम्॥ ७९उस [करवीरक]-के वायव्यकोणमें पश्चिमकी