श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ७८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| करनेवाला है॥ ४९-५० १/२॥ | |
| शाण्डिल्येश्वरनामानं स्थितं तत्रैव सुन्दरि।<br>मुखलिङ्गं तु तं भद्रे पश्चिमाभिमुखं स्थितम्॥ ५२ | मार्कण्डेयके पूर्व समीपमें ही शाण्डिलेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। हे सुन्दरि! वहींपर मुखलिङ्ग स्थित है। हे भद्रे! वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुख किये हुए स्थित है॥ ५१-५२॥ |
| तं दृष्ट्वा मानवो देवि पशुपाशैः प्रमुच्यते।<br>अस्यैव दक्षिणे पार्श्वे नाम्ना भद्रेश्वरं स्मृतम्॥ ५३<br>तत्र पश्चान्मुखं लिङ्गं स्थापितं च ब्रह्मर्षिभिः।<br>तेन दृष्टेन सुश्रोणि ब्राह्मण्यं लभते नरः॥ ५४<br>अन्यच्चैव महादेवि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः। | हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है। इसीके दक्षिण भागमें भद्रेश्वर नामक लिङ्ग कहा गया है, पश्चिमकी ओर मुखवाला वह लिङ्ग ब्रह्मर्षियोंके द्वारा स्थापित किया गया है। हे सुश्रोणि! उसके दर्शनसे मनुष्य ब्राह्मण्य प्राप्त करता है। हे महादेवि! अब मैं क्रमसे अन्य लिङ्गोंका वर्णन करूँगा॥ ५३-५४ १/२॥ |
| यो वै पूर्वं मया तुभ्यं कपालीशः प्रवर्तितः॥ ५५<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे लिङ्गानि कथयाम्यहम्।<br>तत्र देवी स्वयं देवी श्रीर्वै तिष्ठति सर्वदा॥ ५६ | मैंने पूर्वमें आपसे जिस कपालीशके विषयमें बताया था, उसके दक्षिण दिशाभागमें स्थित लिङ्गोंको मैं बता रहा हूँ। हे देवि! वहाँपर स्वयं भगवती श्री सर्वदा विराजमान हैं॥ ५५-५६॥ |
| श्रीकुण्डमिति विख्यातं तत्र कुण्डे वरानने।<br>तस्मिन् कुण्डेश्वरी देवी वरदा सर्वदेहिनाम्॥ ५७ | हे वरानने! वहाँ श्रीकुण्ड बताया गया है, उस कुण्डमें सभी प्राणियोंको वर देनेवाली कुण्डेश्वरी देवी विराजमान हैं॥ ५७॥ |
| तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवीं महाश्रियम्।<br>श्रिया न रहितः सो वै यत्र तत्राभिजायते॥ ५८ | उस कुण्डमें स्नान करके तथा देवी महालक्ष्मीका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी रहता है, लक्ष्मीसे विहीन नहीं होता है॥ ५८॥ |
| श्रियश्चोत्तरपार्श्वे तु कपालीशस्य दक्षिणे।<br>तत्र लिङ्गं महाभागे महालक्ष्म्या प्रतिष्ठितम्॥ ५९ | हे महाभागे! उस श्रीके उत्तरभागमें तथा कपालीशके दक्षिणमें महालक्ष्मीके द्वारा लिङ्ग स्थापित किया गया है॥ ५९॥ |
| पूर्वाभिमुखोऽहं तस्मिन् कुण्डस्यैव तु दक्षिणे।<br>स्नात्वा कुण्डे तु वै देवि तल्लिङ्गं ह्यर्चयिष्यति॥ ६०<br>नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफलं शृणु।<br>चामरासक्तहस्ताभिः स्त्रीभिः परिवृतः सदा॥ ६१<br>तिष्ठते सुविमानस्थो यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>इह लोके यदा याति लक्ष्मीवान् रूपसंयुतः॥ ६२<br>धनधान्यसमायुक्तः कुले महति जायते।<br>स्वर्गलोकस्य तद्द्वारं रहस्यं देवनिर्मितम्॥ ६३ | मैं कुण्डके दक्षिणमें पूर्वाभिमुख होकर स्थित हूँ। हे देवि! उस कुण्डमें स्नान करके यदि कोई पुरुष या स्त्री उस लिङ्गका अर्चन करेगा, तो उसके पुण्यफलको सुनो, वह प्रलयपर्यन्त हाथोंमें चँवर धारण की हुई स्त्रियोंसे सदा घिरा हुआ रहकर उत्तम विमानमें स्थित रहता है और जब इस लोकमें जन्म लेता है, तब लक्ष्मीवान्, रूपवान् तथा धनधान्यसे युक्त होकर महान् कुलमें उत्पन्न होता है। वह [कुण्ड] स्वर्गलोकका देवनिर्मित रहस्यमय द्वार है॥ ६०-६३॥ |
| यदा मत्स्योदरीं यान्ति देवलोकादिवौकसः।<br>तदा तेनैव मार्गेण स्त्रीभिः परिवृतः सुखम्॥ ६४<br>तेन सा प्रोच्यते देवि महाश्रीर्वरवर्णिनि।<br>एतत्तुभ्यं मया देवि रहस्यं परिकीर्तितम्॥ ६५ | जब देवतालोग देवलोकसे मत्स्योदरीमें जाते हैं, तब उसी मार्गसे वह मनुष्य स्त्रियोंसे घिरा हुआ सुखपूर्वक प्रवेश करता है। हे देवि! हे वरवर्णिनि! इसीलिये वे महाश्री कही जाती हैं। हे देवि! मैंने यह |