भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७] कामेश्वर, भीष्मेश्वर, बालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन७८५
स्थापित किया गया है॥ ३५-३६१/२॥
भक्त्या सनत्कुमारेण स्थापितोऽहं वरानने।<br>तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः॥ ३८गरुडेश्वरके सामने एक लिङ्ग स्थित है, हे वरानने! ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारने भक्तिपूर्वक [वहाँ] मुझे स्थापित किया था, हे देवेशि! उस [लिङ्ग]-के दर्शनसे मनुष्य ज्ञानसम्पन्न हो जाता है॥ ३७-३८॥
तस्यैव चोत्तरे पार्श्वे सनन्देन प्रतिष्ठितम्।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्यते सिद्धिरुत्तमा॥ ३९उसीके उत्तरभागमें [मुनि] सनन्दके द्वारा स्थापित किया गया लिङ्ग है, उसके दर्शनमात्रसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है॥ ३९॥
तस्यैव दक्षिणे पार्श्वे स्थापितं ह्यासुरिश्वरम्।<br>तथैव पञ्चशिखिना स्थापितं च महात्मना॥ ४०उसीके दक्षिण भागमें आसुरीश्वर लिङ्ग स्थापित है, वह महात्मा पंचशिखिके द्वारा स्थापित किया गया है॥ ४०॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>शनैश्चरेण तत्रैव मुखलिङ्गं प्रतिष्ठितम्॥ ४१<br><br>शनैश्चरेश्वरं नाम सर्वलोकनमसकृतम्।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि रोगैर्नैवाभिभूयते॥ ४२वहींपर उसके दक्षिणभागमें समीपमें ही शनैश्चरके द्वारा स्थापित किया गया मुखलिङ्ग स्थित है, वह शनैश्चरेश्वर नामक लिङ्ग सभी लोकोंद्वारा नमस्कृत है। हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य रोगोंसे पीड़ित नहीं होता है॥ ४१-४२॥
अन्यच्चैव महापुण्यं काशीपुर्यां महाशये।<br>मार्कण्डेयस्तु विख्यातो मम चैव सदा प्रियः॥ ४३हे महाशये! काशीपुरीमें अन्य महापुण्यप्रद लिङ्ग भी है, वह मार्कण्डेय नामसे विख्यात है और सर्वदा मेरा प्रिय है॥ ४३॥
तस्य लिङ्गस्य चाग्रे तु पश्चिमेन यशस्विनि।<br>मार्कण्डेयह्रदो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ ४४<br><br>मार्कण्डेयह्रदे स्नात्वा किं भूयः परिशोचति।<br>स्नानं दानं जपो होमः श्राद्धं च पितृतर्पणम्॥ ४५<br><br>तत्सर्वमक्षयं तत्र भवतीति न संशयः।<br>तस्मिन् कुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चैव चतुर्मुखम्॥ ४६<br><br>रुद्रलोकः सदा तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः।हे यशस्विनि! उस लिङ्गके आगे पश्चिममें तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मार्कण्डेयह्रद (कुण्ड) है, मार्कण्डेयह्रदमें स्नान करके मनुष्य किसी प्रकारके शोकसे सन्तप्त नहीं रहता है। वहाँ किया गया स्नान, दान, जप, होम, श्राद्ध तथा पितृतर्पण—सब कुछ अक्षय होता है, इसमें सन्देह नहीं है। उस कुण्डमें स्नान करके तथा चतुर्मुखका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले रुद्रलोकको जाता है॥ ४४-४६१/२॥
मार्कण्डेश्वरसामीप्ये उत्तरेण यशस्विनि॥ ४७<br><br>कूपो वै तिष्ठते तत्र सर्वतीर्थवरोऽनघे।<br>कूपस्य चोत्तरेणैव कुण्डमध्ये यशस्विनि॥ ४८<br><br>कुण्डेश्वरमिति ख्यातं सर्वसिद्धैस्तु वन्दितम्।हे यशस्विनि! हे अनघे! मार्कण्डेश्वरके समीपमें उत्तर दिशामें वहाँ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एक कूप विद्यमान है। हे यशस्विनि! कूपके उत्तरमें ही कुण्डके मध्यमें सभी सिद्धोंसे वन्दित कुण्डेश्वर—इस नामसे विख्यात लिङ्ग स्थित है॥ ४७-४८१/२॥
दीक्षां पाशुपतीं तीर्त्वा द्वादशाक्षरेण यत्फलम्॥ ४९<br><br>तत्फलं लभते देवि ब्राह्मणस्तु न संशयः।<br>कुण्डस्य पश्चिमे तीरे लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ ५०<br><br>स्कन्देन स्थापितं देवि ब्रह्मलोकगतिप्रदम्।<br>मार्कण्डेयस्य पूर्वेण नातिदूरे व्यवस्थितम्॥ ५१हे देवि! द्वादशाक्षरके द्वारा पाशुपत दीक्षा प्राप्त करके ब्राह्मण जो फल पाता है, उस फलको उसके दर्शनमात्रसे प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। कुण्डके पश्चिम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह [लिङ्ग] स्कन्दके द्वारा स्थापित किया गया है, वह ब्रह्मलोककी गति प्रदान