भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 786
७८४श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मण्डलेश्वर तथा उत्तम उर्वशीलिङ्ग विद्यमान हैं॥ २३ ॥
अन्यानि तत्र लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः ।<br>तानि दृष्ट्वा तु मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २४[हे देवि!] वहाँपर महात्माओंके द्वारा अन्य लिङ्ग भी स्थापित किये गये हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २४॥
मण्डलेश्वरसामीप्ये मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>शान्तेन स्थापितं लिङ्गं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २५मण्डलेश्वरके समीपमें मुखलिङ्ग स्थित है, सभी पापोंका नाश करनेवाला वह शुभ लिङ्ग 'शान्त' के द्वारा स्थापित किया गया है॥ २५॥
वायव्ये तु दिशाभागे द्रोणेश्वरसमीपतः ।<br>वालखिल्येश्वरं नाम सुखदं सर्वदेहिनाम् ॥ २६वायव्य दिशाभागमें द्रोणेश्वरके समीप वालखिल्येश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह सभी प्राणियोंको सुख देनेवाला है॥ २६॥
तच्च पश्चान्मुखं लिङ्गं कामकुण्डस्य पश्चिमे ।<br>वालखिल्येश्वरं दृष्ट्वा सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७<br><br>तस्यैव चाग्रतो भद्रे मुखलिङ्गं च तिष्ठति ।<br>वाल्मीकेश्वरनामानं तं च दृष्ट्वा न शोचति ॥ २८कामकुण्डके पश्चिममें स्थित वह लिङ्ग पश्चिमकी ओर मुखवाला है, वालखिल्येश्वरका दर्शन करके मनुष्य सभी यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। हे भद्रे! उसीके आगे वाल्मीकेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है, उसका दर्शन करके मनुष्य शोकयुक्त नहीं होता है॥ २७-२८॥
तस्यैव कामकुण्डस्य पुरा संस्थापितं तटे ।<br>लिङ्गं तत्र महापुण्यं च्यवनेन प्रतिष्ठितम् ॥ २९<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण ज्ञानवान् जायते नरः ।उसी कामकुण्डके तटपर पूर्वकालमें [महर्षि] च्यवनके द्वारा स्थापित किया गया महापुण्यप्रद लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है॥ २९ १/२॥
वालखिल्येश्वरस्यैव दक्षिणे वरवर्णिनि ॥ ३०<br><br>नाम्ना वातेश्वरं देवं सर्वपातकनाशनम् ।<br>तं दृष्ट्वा मानवो देवि वायुलोकं च गच्छति ॥ ३१हे वरवर्णिनि! वालखिल्येश्वरके दक्षिणमें सभी पापोंका नाश करनेवाला वातेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य वायुलोकको जाता है॥ ३०-३१॥
अग्नीश्वरं तु तत्रैव भरतेशं तथैव च ।<br>वरुणेशं तथा चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३२<br><br>एतान् दृष्ट्वा महादेवि यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ।<br>अन्यदायतनं पुण्यं सनकेन प्रतिष्ठितम् ॥ ३३<br><br>सनकेश्वरनामानं सर्वसिद्धामरार्चितम् ।<br>तेन दृष्टेन देवेशि राजसूयफलं लभेत् ॥ ३४वहींपर अग्नीश्वर, भरतेश तथा सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला वरुणेश—ये लिङ्ग स्थित हैं, हे महादेवि! इनका दर्शन करके मनुष्य अभीष्ट गति प्राप्त करता है। वहाँ दूसरा पुण्यप्रद लिङ्ग भी स्थित है, जो [महामुनि] सनकके द्वारा स्थापित किया गया है, सनकेश्वर नामक वह लिङ्ग सभी सिद्धों तथा देवताओंके द्वारा पूजित है। हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ ३२-३४॥
धर्मेश्वरं तु तत्रैव दक्षिणे वरवर्णिनि ।<br>नाम्ना धर्मेश्वरं देवं सर्वकामफलप्रदम् ॥ ३५हे वरवर्णिनि! वहींपर दक्षिण दिशामें धर्मेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, वह धर्मेश्वरलिङ्ग सभी वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है।
अन्यत्तत्रैव लिङ्गं तु ऋषिभिः स्थापितं पुरा ।<br>सनकेश्वरस्योत्तरतो नाम्ना गरुडकेश्वरम् ॥ ३६<br><br>सिद्धिकामेन सुश्रोणि स्थापितं गरुडेन तु ।<br>गरुडेश्वरस्य पुरतः स्थापितं ब्रह्मसूनुना ॥ ३७वहींपर पूर्वकालमें ऋषियोंके द्वारा स्थापित किया गया अन्य लिङ्ग भी स्थित है। हे सुश्रोणि! सनकेश्वरके उत्तरमें गरुडकेश्वर नामक लिङ्ग है, जो सिद्धिकी इच्छावाले गरुडके द्वारा
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